सूर्योदय अनुसार समय का निर्धारण करने की कवायद

दुनिया के समय को सही करने पर जोर

अक्षरविश्व न्यूज. उज्जैन प्रदेश सरकार उज्जैन से महाकाल मीन टाइम स्थापित करने की तैयारी में जुट गई हैं। समय निर्धारण के लिए ग्लोबल रेफरेंस के रूप में इस्तेमाल की जाने वाली प्राइम मेरिडियन को इंग्लैंड के ग्रीनविच से उज्जैन लाने के लिए सरकार काम करेगी। भारतीय मानक समय को अपनाकर रात को समय बदलने की परंपरा को खत्म करने की कवायद शासन स्तर पर शुरू हो चुकी है।
प्रदेश सरकार की मंशा यह सिद्ध करना है कि उज्जैन ही प्राइम मेरिडियन है। इसके लिए दुनिया के समय को सही करने पर जोर दिया जाएगा। तारामंडल को डोंगला वेधशाला से जोडऩे की योजना है। डोंगला वेधशाला में भी तारमंडल बनकर तैयार हो रहा है। दोनों तारामंडल और जीवाजी वेधशाला को जोड़कर महाकाल मीन टाइम की योजना को आगे बढ़ाया जा सकता है।
डोंगला वेधशाला के प्रकल्प अधिकारी घनश्याम रत्नानी ने बताया महाकाल मीन टाइम की स्थापना ही हमारा लक्ष्य है। उज्जैन पुराने समय में कालगणना का केंद्र रहा है। यहां से गुजरने वाली शून्य रेखा को पुन: मानकर सूर्योदय के आधार पर तिथि आदि की गणना की जा सकती है। 19वीं शताब्दी में भारतीय शहरों में विक्रमादित्य के समय से चले आ रहे स्थानीय समय को सूर्य के मुताबिक तय किया जाता था। ब्रटिश काल में भारत में सब कुछ बदल गया। अंतर्राष्ट्रीय कांग्रेस को स्टैंडर्ड टाइम बदलने का अधिकार है। सूर्योदय के आधार पर होने वाली गणना ही सही होती है।
यह हैं प्राचीन आधार…
भारत के मध्य में स्थित होने के कारण उज्जैन को नाभिप्रदेश अथवा मणिपुर चक्र भी माना गया है।
प्राचीन सूर्य सिद्धांत, ब्रह्मस्फुट सिद्धांत, आर्यभट्ट, भास्कराचार्य आदि ने उज्जयिनी के मध्यमोदय को ही स्वीकारा था।
गणित और ज्योतिष के विद्वान वराहमिहिर का जन्म उज्जैन जिले के कायथा ग्राम में लगभग शक् संवत 427 में हुआ था
प्राचीन भारत के वे एकमात्र ऐसे विद्वान थे जिन्होंने ज्योतिष की समस्त विधाओं पर लेखन कर ग्रंथों की रचना की थी।
स्कंदपुराण के अनुसार ‘कालचक्र प्रवर्तकों महाकाल: प्रतायन:।Ó इस प्रकार महाकालेश्वर को कालगणना का प्रवर्तक भी माना गया है।
प्राचीन भारत की समय गणना का केंद्रबिंदु होने के कारण ही काल के आराध्य महाकाल हैं, जो भारत के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक है।
वराहपुराण में उज्जैन को शरीर का नाभि देश और महाकालेश्वर को अधिष्ठाता कहा गया है।
भारत में विक्रमादित्य के शासनकाल में संपूर्ण भारत का समय उज्जैन से तय होता था।
यह समय सूर्योदय से लेकर अगले दिन के सूर्योदय तक एक दिन-रात पर आधारित था।
ग्रीक, फारसी, अरबी और रोमन लोगों ने भारतीय कालगणना से प्रेरणा लेकर ही अपने अपने यहां के समय को जानने के लिए अपने तरीके की वेधशालाएं बनाई थीं।
रोमन कैलेंडर भी भारत के विक्रमादित्य कैलेंडर से ही प्रेरित था।
प्राइम मेरिडियन और इतिहास
प्राइम मेरिडियन सार्वभौमिक रूप से निर्धारित शून्य देशांतर है।
एक काल्पनिक उत्तर/दक्षिण रेखा जो दुनिया को दो भागों में विभाजित करती है।
यह रेखा उत्तरी ध्रुव से शुरू होती है, ग्रीनविच, इंग्लैंड में रॉयल वेधशाला से होकर गुजरती है और दक्षिणी ध्रुव पर समाप्त होती है।
ग्रीनविच लाइन की स्थापना 1884 में वाशिंगटन डीसी में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय मेरिडियन सम्मेलन में की गई थी।
सम्मेलन के समय, प्रत्येक देश की अपनी देशांतर रेखा थी जिसे वे मेरिडियन मानते थे।
काफी बहस के बाद, इंग्लैंड के ग्रीनविच में रॉयल वेधशाला से गुजरने वाली मध्याह्न रेखा को चुना गया।
1999 में रात के आकाश में प्राइम मेरिडियन के स्थान को चिह्नित करने के लिए वेधशाला में एक लेजर स्थापित किया गया था।
ग्रीनविच मीन टाइम (जीएमटी), एक ऐसी इकाई जिससे दुनिया के समय का आकलन किया जाता है।
19वीं सदी के दौरान इंग्लैंड के हर शहर का अपना समय होता था। कोई राष्ट्रीय मानक नहीं था, जिससे कई तरह की परेशानियाँ आती थीं।
1850 के बाद इंग्लैंड स्थित छोटे बड़े शहरों की सार्वजनिक घडिय़ों को जीएमटी के आधार पर तय किया गया और 1880 तक इसे पूरी तरह स्वीकृति मिल गई।
द शेफर्ड़ गेट क्लॉक दुनिया की पहली ऐसी घड़ी थी जिसने पहली बार जीएमटी को सार्वजनिक रूप से दिखाया था।
अंग्रेज़ों के शासनकाल में भारत के दो टाइम ज़ोन हुआ करता थे। पहला कोलकाता के आधार पर और दूसरा मुंबई के आधार पर।
अंग्रेजों के जाने के बाद आईएसटी (इंडियन स्टैंडर्ड टाइम) बना। यानी एक देश का एक ही मानक समय।









