‘द पिरामिड स्कीम’ में कितना है दम? जानें फिल्म ने कहां किया प्रभावित और कहां रह गई कमजोर

अपने आसपास ऐसी कई चीजें होती हैं जिनसे जिंदगी में कभी न कभी सामना जरूर होता है। इनमें से एक है मल्टी लेवल मार्केटिंग यानी MLM। यहां काम करने वाले आम लोगों के सपने और उन्हें पूरा करने की जद्दोजहद की कहानी ही वेब सीरीज ‘द पिरामिड स्कीम’ की बुनियाद है।
कहानी
एक आम इंसान के लिए बड़े सपने देखने की हिम्मत करना भी अपने आप में एक बड़ी बात होती है। जब उसे सपने पूरे करने का कोई रास्ता दिखता है तो वह बिना सोचे उस पर चल पड़ता है। परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति की वजह से समाज में कोई इज्जत न रखने वाला गोल्डी चौहान एक दिन अचानक पिरामिड स्कीम वाली कंपनी जंबो लाइफ से टकरा जाता है। कंपनी उसे बड़े-बड़े सपने दिखाती है और गोल्डी जी-जान से मेहनत करता है। लेकिन आखिर में उसे पता चलता है कि कंपनी खुद एक बड़ा फ्रॉड है। अब वह अपने पैसे कैसे वापस पाएगा और यह जाल कहां-कहां तक फैला है यह जानने के लिए पूरी सीरीज देखनी होगी।
अभिनय
सीरीज में सभी किरदारों का अभिनय अच्छा है। मुख्य किरदार की शुरुआत स्क्रिप्ट के अनुसार जानबूझकर धीमी रखी गई है लेकिन एपिसोड दर एपिसोड उनका किरदार बड़ा होता गया और अभिनय भी निखरता गया। शेखर सुमन सीरीज में हैं लेकिन उनका किरदार छोटा है और स्क्रीन टाइम भी कम, जिसकी वजह से उनका जादू पूरी सीरीज में नहीं दिख पाया। लेकिन रणवीर शौरी ने कमाल का काम किया है और पूरी सीरीज में आप उन पर से नजरें नहीं हटा पाते। इसके अलावा आशीष राघव, स्मिता बंसल, अंजन श्रीवास्तव और अखिलेंद्र मिश्रा जैसे सभी सहयोगी कलाकार आपको सीरीज से बांधे रखते हैं। इस सीरीज के जरिए फिल्म निर्माता रूमी जाफरी की बेटी अल्फिया जाफरी ने अपने एक्टिंग करियर की शुरुआत की है और वह दर्शकों पर अच्छा प्रभाव छोड़ने में सफल रही हैं।
सीरीज देखने में क्या है मुनाफा?
TVF यानी द वायरल फीवर हमेशा से समाज के आम मुद्दों पर कहानियां बुनता है। पंचायत और गुल्लक जैसी सीरीज से जुड़े उनके दर्शक इस बार भी नेटवर्क मार्केटिंग के सच को उजागर करती इस कहानी से खुद को जुड़ा हुआ महसूस करेंगे। अगर आपके परिवार में कोई इस तरह के किसी बिजनेस से जुड़ा है या जुड़ना चाहता है तो उसे सबसे पहले यह सीरीज दिखाएं। अभिनय, किरदार और कहानी तीनों ही काफी हद तक असली लगते हैं और कहीं कोई ओवर ड्रामा नहीं है।
सीरीज देखने पर क्या है घाटा?
सीरीज के शुरुआती तीन एपिसोड बेहद धीमे हैं जिन्हें थोड़ी स्पीड दी जा सकती थी ताकि दर्शक शुरुआत में ही बोर न हों। असली कहानी का मजा चौथे एपिसोड से मिलना शुरू होता है और तभी आप खुद को कहानी से जुड़ा हुआ महसूस करते हैं। आखिरी एपिसोड में कहानी इतनी तेज रफ्तार पकड़ती है कि एक साथ इतना कुछ हो जाता है जो ठीक से हजम नहीं होता। कुल मिलाकर यह सीरीज ऐसी लगती है जैसे खाने में कहीं नमक ज्यादा हो और कहीं कम।








