Popup Image
Advertisement

बच्चों की परवरिश में भूलकर भी न करें ये 5 गलतियां, वरना बाद में होगा पछतावा

हर मां-बाप चाहते हैं कि उनका बच्चा जिंदगी में आगे बढ़े, खुश रहे और खुद पर भरोसा रखे। इसके लिए वे दिन-रात मेहनत भी करते हैं। लेकिन कई बार बिना जाने-समझे की गई छोटी-छोटी बातें बच्चे के व्यवहार और मानसिक विकास पर गहरा निशान छोड़ जाती हैं। आज के दौर में जहां मोबाइल, सोशल मीडिया और पढ़ाई का बोझ बच्चों की दुनिया को तेजी से बदल रहा है, वहां सिर्फ अनुशासन काफी नहीं — बच्चे की भावनाओं को समझना भी उतना ही जरूरी हो गया है।

Advertisement

दूसरे बच्चों से तुलना

“देखो वो कितना अच्छा पढ़ता है” या “तुम उसके जैसे क्यों नहीं बन सकते” — ये जुमले घर-घर में सुनाई देते हैं। शुरुआत में यह बात मामूली लगती है लेकिन बार-बार की जाने वाली तुलना बच्चे के आत्मविश्वास की जड़ें खोखली कर देती है। कई शोधों में सामने आया है कि ऐसे बच्चे धीरे-धीरे खुद को कमतर समझने लगते हैं और उनमें तनाव बढ़ता जाता है। हर बच्चे की अपनी क्षमता और सीखने का अपना तरीका होता है — उसे उसकी खुद की पहचान के साथ आगे बढ़ने देना कहीं ज्यादा जरूरी है।

बच्चों की बातें अनसुनी करना

व्यस्त दिनचर्या में अक्सर बच्चा कुछ कहना चाहता है — स्कूल की बात, दोस्तों की बात, या बस अपने मन की कोई उलझन — लेकिन उसे पूरा ध्यान नहीं मिलता। धीरे-धीरे वह अपनी बातें दिल में ही दबाने लगता है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि जिन बच्चों को घर में खुलकर बोलने का माहौल मिलता है वे मानसिक रूप से कहीं ज्यादा मजबूत होते हैं। छोटी-छोटी बातें ध्यान से सुनना भी बच्चे और माता-पिता के बीच के रिश्ते को मजबूत करता है।

Advertisement

मोबाइल को आसान रास्ता बना लेना

बच्चा रो रहा है तो फोन दे दो, खाना नहीं खा रहा तो स्क्रीन चला दो — यह आजकल आम हो चुका है। लेकिन लगातार स्क्रीन के सामने बैठे रहने से बच्चे की शारीरिक गतिविधि घटती है, नींद पर असर पड़ता है और ध्यान लगाने की क्षमता कमजोर होती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि मोबाइल की जगह आउटडोर खेल, किताबें और परिवार के साथ बिताया वक्त बच्चे के लिए कहीं ज्यादा फायदेमंद है।

सिर्फ नंबरों की दौड़

अच्छे नंबर लाओ, क्लास में टॉप करो — यह दबाव कई बच्चों की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। पढ़ाई जरूरी है लेकिन हर वक्त प्रेशर में रहने वाले बच्चे अंदर से थके हुए और डरे हुए होते हैं। कुछ बच्चे तो अपनी असली रुचियों को इसी डर में दबा देते हैं। विशेषज्ञों की राय है कि पढ़ाई के साथ खेल, आराम और रचनात्मक काम भी बच्चे के लिए उतने ही जरूरी हैं। संतुलित परवरिश ही बच्चे को मानसिक और भावनात्मक रूप से मजबूत बनाती है।

Advertisement

Related Articles

📢 पूरी खबर पढ़ने के लिए

बेहतर अनुभव के लिए ऐप का उपयोग करें

ऐप में पढ़ें
ऐप खोलें
ब्राउज़र में जारी रखें