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अमावस्या पर पितरों का तर्पण क्यों किया जाता है?

हर अमावस्या का दिन पितरों को समर्पित होता है। इसका ख़ास कारण इस दिन की ऊर्जा होती है। अमावस्या तिथि पितरों को समर्पित है क्योंकि यह आत्मा, मन और ऊर्जा का संगम दिन है। असल में, अमावस्या के दिन सूर्य और चंद्रमा एक ही राशि में रहते हैं। सूर्य आत्मा का प्रतीक है और चंद्रमा मन का। जब दोनों का संगम होता है, तो यह तिथि आत्मा और मन के मेल का सूचक मानी जाती है।

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यही कारण है कि यह तिथि पितरों को अर्पण करने के लिए सबसे शुभ और उपयुक्त मानी गई है। अमावस्या की रात को चंद्रमा दिखाई नहीं देता, जिससे तामसिक ऊर्जा बढ़ती है। श्राद्ध और तर्पण से इस तमस को सात्विक ऊर्जा में रूपांतरित किया जाता है। इसके अलावा, इस दिन पितृ लोक के लिए किए गए मंत्र-जाप और तर्पण का प्रभाव अधिक माना जाता है।

तर्पण का महत्व

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माना जाता है कि अमावस्या के स्वामी पितर देव होते हैं. इस चलते अमावस्या पर पितरों का तर्पण और पितर देव की पूजा महत्वपूर्ण मानी जाती है. इसके अतिरिक्त, पौराणिक कथाओं के अनुसार, पितरों की एक मानस कन्या थी जिसने कठोर तपस्या की थी. इस कन्या की तपस्या का वरदान देने सभी पितर कृष्ण पक्ष की पंचदशी तिथि पर आए थे. वरदान में कन्या ने अमावसु नामक पितर से विवाह का प्रस्ताव रखा लेकिन अमावसु ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया. माना जाता है कि अमावसु के नाम पर ही इसी दिन से अमावस्या मनाई जाने लगी और पितर तर्पण के लिए इस दिन को शुभ कहा गया.

तर्पण में हम पितरों को मंत्रों के साथ पानी और तिल की पेशकश करते हैं तर्पण जो उन्हें बहुत पसंद है और वह शीघ्रता से प्रसन्न हो जाते है ।
महाभारत,आदि पर्व, 74.39 मे लिखा है।

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बेटा पिता को पुत नाम के नरक से बचाता है,इसलिए उसे स्वयंभु भगवान ने पुत्र नाम रखा था।

हमारे पूर्वजों की मौत के बाद हमें उनकी आगे की यात्रा के बारे में कुछ भी पता नहीं होता है, वे कहाँ, किस रूप में है, उन्होंने जन्म लिया है या नहीं, जन्म लिए है तो कहाँ किसी को कुछ भी पता नहीं होता है, लेकिन यह हमारा कर्तव्य है की हम उन्हें जीवित भी खुश रखें और उनकी मृत्यु के बाद भी।

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