प्यार और दीवानगी में क्या है फर्क? जानें कब रिश्ते की चाहत बन जाती है ‘ऑब्सेसिव लव डिसऑर्डर’

“प्यार अंधा होता है” यह बात अक्सर फिल्मों और वास्तविक जीवन दोनों में सुनने को मिलती है। किसी के प्यार में पड़ने पर उसके बारे में लगातार सोचना, उसके संदेश का इंतजार करना और उसकी छोटी-छोटी बातों से खुश हो जाना सामान्य माना जाता है। हालांकि कई बार यही भावनाएं धीरे-धीरे एक ऐसी स्थिति में बदल जाती हैं, जहां प्यार और जुनून के बीच की सीमा धुंधली होने लगती है। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, इन दोनों के बीच का अंतर समझना बेहद जरूरी है, क्योंकि हर गहरा लगाव स्वस्थ रिश्ते की निशानी नहीं होता।
प्यार और ऑब्सेशन में क्या है फर्क?
रिश्ते की शुरुआत में प्यार और दीवानगी का एहसास काफी हद तक एक जैसा लग सकता है। दोनों ही स्थितियों में व्यक्ति अपने पार्टनर के करीब रहना चाहता है और उसके साथ ज्यादा समय बिताने की इच्छा रखता है। लेकिन सच्चे प्यार की नींव भरोसे, सम्मान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर टिकी होती है। एक स्वस्थ रिश्ता व्यक्ति को आत्मविश्वास और भावनात्मक सुरक्षा देता है।
इसके विपरीत, जब प्यार ऑब्सेशन यानी जुनूनी लगाव का रूप लेने लगता है, तो व्यक्ति अपने साथी को एक स्वतंत्र इंसान की बजाय अपने नियंत्रण में रहने वाली चीज की तरह देखने लगता है। ऐसे रिश्तों में शक, असुरक्षा और अत्यधिक अधिकार जताने की प्रवृत्ति बढ़ने लगती है, जिससे दोनों लोगों के बीच तनाव पैदा हो सकता है।
क्या है ऑब्सेसिव लव डिसऑर्डर?
मनोविज्ञान में इस तरह की अत्यधिक भावनात्मक निर्भरता और नियंत्रण की इच्छा को ‘ऑब्सेसिव लव डिसऑर्डर’ (Obsessive Love Disorder – OLD) से जोड़ा जाता है। यह एक गंभीर मानसिक स्थिति मानी जाती है, जिसमें व्यक्ति अपने पार्टनर को लेकर जरूरत से ज्यादा असुरक्षित महसूस करता है और उसकी हर गतिविधि पर नजर रखना चाहता है।
इस स्थिति में व्यक्ति यह जानने की कोशिश करता रहता है कि उसका पार्टनर किससे बात कर रहा है, कहां जा रहा है और किसके साथ समय बिता रहा है। कई मामलों में सोशल मीडिया अकाउंट्स और निजी जानकारियों पर नियंत्रण पाने की कोशिश भी देखी जाती है। यदि पार्टनर निजी स्पेस या स्वतंत्रता की मांग करता है, तो जुनूनी व्यक्ति गुस्सा, अवसाद या आक्रामक व्यवहार का शिकार हो सकता है।
मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ सकता है गंभीर असर
विशेषज्ञों का मानना है कि प्यार तब तक स्वस्थ माना जाता है, जब तक उसमें दोनों लोगों की भावनाओं, सीमाओं और स्वतंत्रता का सम्मान किया जाए। लेकिन जब रिश्ता नियंत्रण, संदेह और अत्यधिक निर्भरता में बदलने लगे, तो यह मानसिक स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। इसलिए रिश्तों में भावनात्मक संतुलन बनाए रखना और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहद महत्वपूर्ण है।









