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64/84 महादेव : श्री पशुपतीश्वर महादेव मंदिर

कौमारे यौवने बाल्ये बाद्र्धक्येयदुपार्जितम्।
तत्पापविलयंयातिदृष्ट्वापशुपति शिवम्।।

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(अर्थात- पशुपति लिंग का दर्शन करने से कौमार, यौवन, बाल्य तथा वाद्र्धक्य में कृत समस्त पातक विलीन हो जाता है।)

नगर के उत्तरी भाग में पीपली नाका से जूना सोमवारिया मार्ग से बाएंं मुड़कर मुस्लिम बहुल क्षेत्र जानसापुरा में खुले क्षेत्र में यह अतिप्राचीन मंदिर स्थित है। प्रस्तर की चौखट से बना तथा भीतर लोहे के द्वार से सुरक्षित इसका उत्तरामुखी साढ़े चार फीट ऊंचा प्रवेश द्वार है। करीब 65 वर्गफीट आकार के फर्श व दीवारों पर टाइल्स लगे गर्भगृह में 2फीट चौड़ी काले प्रस्तर की प्राचीन जलाधारी के मध्य 6 इंच ऊंचा लिंग प्रतिष्ठित है जिसके आसपास न नाग है,

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न त्रिशूल, न डमरू। गर्भगृह के दीवारों के ताख में बांये से सरस्वती देवी, सामने कार्तिकस्वामी की काले पाषण में उत्कीर्ण सुन्दर प्राचीन तथा दायें गणेश व पार्वती की संगमरमर की मूर्तियां प्रतिष्ठित हैं। जलाधारी के जल निकासी का कोई मार्ग नहीं है। प्रवेश द्वार के सामेन पीपल वृक्ष के चबूतरे पर असख्य प्राचीन खण्डित मूर्तियों का ढेर पड़ा है।

लिंग माहात्म्य की कथा-

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धर्मयपराण राजा पशुपाल एक बार समुद्र दर्शनार्थ गए तो वहां 5 बली पुरूष व एक स्त्री के राजा के भय से संज्ञाहीन होने पर उसे बंदी बना लिया। राजा को चेन आया तथा उसने सभी को आहत कर दिया, व सभी दस्यु राजा की देह में लीन हो गये। देवर्षि नारद के वहां आने पर राजा ने सब वृत्तान्त कह सुनाया तथा नारद से उन दसों पुरुषों व नारी के सम्बंध में जानना चाहा। नारद ने कहा ये दसों इन्द्रियां है तथा नारी मन है।

पशुपाल ने नारद से जानना चाहा कि शिव द्वारा पशु बनाये गये विधाता आदि देवताओं ने पशुभाव से कैसेे मुक्ति पाई। ईश्वर ने कहा कि पशभाव से मुक्ति हेतु तुम मेरे साथ महाकालवन चलो तथा मैं वहां तुम्हारी मुक्ति के लिये पशुपतिश्वर लिंग हो जाऊंगा। तदनंतर उन देवगण ने इस लिंग का दर्शन कर पशुभाव से निवृत्त पाई। राजा ने भी दर्शन कर परमगति पाई।

फलश्रुति-

इस लिंग के दर्शन से कर्मविपाक से पशुभाव को प्राप्त सभी पितर मुक्त हो जाएंगे तथा मनुष्य के समस्त पातक नष्ट हो जाएंगे।

लेखक – रमेश दीक्षित

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