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9-12 साल के बच्चों की परवरिश के लिए अपनाएं ये 5 जरूरी नियम

9 से 12 साल की उम्र बच्चों के लिए एक बड़े बदलाव का दौर होता है। जो बच्चा कल तक हर छोटी-बड़ी बात आपसे बांटता था वही अचानक चुप्पी साध लेता है और अपनी दुनिया में खो जाता है। यह बदलाव सिर्फ बाहर से नहीं बल्कि शरीर, मन, भावनाओं और समाज से जुड़े हर पहलू पर एक साथ आता है। इस उम्र में बच्चों में आजादी की भूख जागती है और वे यह भी जांचना चाहते हैं कि मां-बाप की बनाई लक्ष्मण रेखा को वे कहां तक लांघ सकते हैं। ऐसे नाजुक दौर में माता-पिता की भूमिका और भी अहम हो जाती है। कुछ जरूरी बातें जो इस वक्त आपके काम आ सकती हैं।

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उनकी बढ़ती आजादी को दुश्मन मत समझिए

इस उम्र में बच्चों का माता-पिता से थोड़ा कटना और दोस्तों की तरफ ज्यादा झुकना बिल्कुल सामान्य है। लेकिन कई माता-पिता इसे खुद को नकारा जाना समझ बैठते हैं और फिर शुरू हो जाती है लगातार पूछताछ। यही पूछताछ बच्चे को और दूर धकेल देती है। जो मां-बाप हर बात जानने की जिद रखते हैं वे अनजाने में बच्चे से अपनी दूरी खुद बढ़ा लेते हैं। बच्चे को थोड़ी सांस लेने की जगह दीजिए यही आपके रिश्ते को लंबे समय तक मजबूत रखेगा।

हफ्ते में एक बार सिर्फ उनके लिए वक्त निकालिए

इस उम्र के बच्चे खुलकर बोलने में हिचकिचाते हैं इसलिए जरूरी है कि आप खुद उनके करीब जाएं। हफ्ते में एक या दो बार ऐसा वक्त निकालें जब आप सिर्फ और सिर्फ उनके साथ हों, फोन बंद हो और कोई दूसरा काम न हो। यह क्वालिटी टाइम सिर्फ रिश्ता मजबूत नहीं करता बल्कि बच्चे को यह भी सिखाता है कि बातचीत कैसे की जाती है जो आगे चलकर उनके जीवन में बेहद काम आता है। अक्सर हम इसे इसलिए टाल देते हैं क्योंकि बच्चा खुद कहता है कि उसे जरूरत नहीं लेकिन यह उसकी असली भावना नहीं होती।

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हर बात पर राय देने की आदत छोड़िए

इस उम्र में बच्चे आपको बहुत गौर से देखते हैं खासकर तब जब आप दूसरों के बारे में बात करते हैं। किसी लड़की के कपड़ों पर टिप्पणी हो या किसी बच्चे के व्यवहार पर आलोचना, आपके बच्चे यह सब सुन और समझ रहे होते हैं। इससे उनके मन में यह बात बैठ जाती है कि आप कठोर और निर्णय करने वाले इंसान हैं और फिर वे अपनी बातें आपसे छुपाने लगते हैं। इसके बजाय बच्चों की पसंद को तवज्जो दें और उनके फैसलों को थोड़ा सम्मान दें।

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