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ज्यादा अंगूठियां पहनने के पीछे छिपा है राज, साइकोलॉजी ने बताई वजह

अक्सर हमारे आसपास ऐसे लोग दिखते हैं, जिनकी लगभग हर उंगली में अंगूठियां (Rings) चमकती हैं। कोई सोने-चांदी का मेल पहनता है, तो कोई रंग-बिरंगे रत्नों से हाथ सजाता है। पहली नज़र में यह दिखावा या ध्यान खींचने (Attention Seeking) का तरीका लग सकता है। मगर इस मामले में इंसानी मनोविज्ञान कुछ और ही दिलचस्प कहानी बयां करता है।

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विशेषज्ञों के अनुसार, हमारे गहने सिर्फ सजने-संवरने के लिए नहीं होते, बल्कि हमारी पहचान बयां करते हैं। फैशन और माइंडसेट का यह कनेक्शन बेहद गहरा होता है। हाथों की उंगलियों में सजी इन अंगूठियों के पीछे हाथों में अंगूठियां पहनने का मनोविज्ञान काम करता है। आइए जानते हैं कि इन गहनों के पीछे कौन से मनोवैज्ञानिक सच छिपे हैं।

पहचान का हिस्सा बनती अंगूठियां

कंज्यूमर साइकोलॉजिस्ट रसेल बेल्क की ‘एक्सटेंडेड सेल्फ थ्योरी’ (Extended Self Theory) इस व्यवहार को समझाती है। इसके मुताबिक, हम अपनी पसंदीदा चीजों को खुद की पहचान मान लेते हैं। जैसे बुजुर्गों की आखिरी निशानी या पहली कमाई से खरीदी रिंग। ये गहने नहीं, बल्कि जीवन की कहानी बन जाते हैं, जिन्हें इंसान खुद से अलग नहीं करना चाहता।

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व्यक्तित्व दर्शाती हैं ये कड़ियां

रॉबर्ट विकलुंड और पीटर गोलविट्ज़र की ‘सिम्बोलिक सेल्फ-कंप्लीटशन थ्योरी’ इस पर रोशनी डालती है। लोग ऐसी चीजें पहनते हैं जो उनके अंदरूनी मूल्यों को दर्शाती हैं। जैसे कोई कलाकार अनोखी रिंग पहनकर अपनी रचनात्मकता दिखाता है। वहीं कोई पुश्तैनी अंगूठी पहनकर परिवार के प्रति सम्मान व्यक्त करता है। यह उनके गहरे आत्म-मूल्यों को प्रकट करता है।

यादों से बंधा भावनात्मक जुड़ाव

शोध बताते हैं कि हमारा अपनी चुनिंदा वस्तुओं से गहरा भावनात्मक लगाव (Emotional Attachment) होता है। दोस्त का उपहार या किसी खास यात्रा से ली गई रिंग लोग सालों पहनते हैं। जब भी नजर उंगलियों पर पड़ती है, पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं। यहाँ मामला बाहरी फैशन का नहीं, बल्कि अंदरूनी भावनाओं और अनमोल लम्हों को संजोने का होता है।

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रोज पहनने से मानसिक सुकून

मनोवैज्ञानिक रॉबर्ट ज़ायोंक का ‘मेयर एक्सपोजर इफेक्ट’ (Mere Exposure Effect) इसके पीछे की वजह बताता है। जिन चीजों का हम रोज उपयोग करते हैं, उनसे जुड़ाव बेहद बढ़ जाता है। धीरे-धीरे यह आदत बन जाती है। कई लोगों को अंगूठी उतारे बिना रहने पर ही मानसिक कंफर्ट मिलता है। इसके बिना उन्हें अपना हाथ अधूरा और अजीब लगने लगता है।

क्या यह केवल दिखावा है?

हाथ में ढेर सारी अंगूठियां देखकर किसी को भी ‘दिखावेबाज़’ समझ लेना जल्दबाज़ी होगी। हर रिंग के पीछे एक छिपा हुआ अहसास, कामयाबी या किसी का प्यार हो सकता है। अगली बार जब ऐसा कोई हाथ देखें, तो उसे अटेंशन सीकिंग न समझें। बल्कि यह सोचें कि वह शख्स यादों का एक खूबसूरत संसार समेटे हुए घूम रहा है।

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