शहर में स्ट्रीट डॉग बने परेशानी, डॉग बाइट के हर दिन 80 से 100 मरीज पहुंच रहे चरक अस्पताल

श्वानों की नसबंदी के लिए नगर निगम ने निकाला टेंडर
निजी चिकित्सकों के यहां पहुंचने वाले पीडि़तों की संख्या भी लगभग इतनी ही
अक्षरविश्व न्यूज उज्जैन। शहर के राहगीरों के लिए स्ट्रीट डॉग परेशानी का सबब बन गए हैं। मार्निंग वॉक के लिए जाने वाले बुजुर्ग हों या पैदल स्कूल जाने वाले बच्चे हर रोज 80 से 100 पीडि़त इन डॉग्स के कारण चरक अस्पताल पहुंच रहे हैं। इतनी ही संख्या निजी अस्पतालों में उपचार कराने वाले पीडि़तों की है। समस्या के निदान के लिए नगर निगम ने स्ट्रीट डॉग की नसबंदी का निर्णय लिया है। इस काम के लिए टेंडर भी जारी किया है। यह अभियान अभी शुरू नहीं हुआ है और प्रक्रिया में है।
तीन हजार से ज्यादा की नसबंदी हुई
नगर निगम की एमआईसी के स्वास्थ्य प्रभारी सत्यनारायण चौहान ने बताया डॉग स्टरलाइजेशन (नसबंदी) के लिए टेंडर आमंत्रित किए हैं। दो साल पहले भी टेंडर हुए थे जिसमें भोपाल के एनजीओ ने तीन हजार से अधिक कुत्तों की नसबंदी की थी। अनुमान है कि वर्तमान में शहर में स्ट्रीट डॉग की संख्या करीब 10 हजार होगी। नसबंदी के लिए कुत्तों को जहां से पकड़ते हैं नसबंदी के बाद उन्हें वहीं छोडऩा पड़ता है।
निजी उपचार में खर्च हो जाते हैं ढाई से 3 हजार
डॉग बाइट के पीडि़तों के उपचार के लिए लगने वाली एंटी रेबीज वैक्सीन सरकारी अस्पताल में मुफ्त उपलब्ध है। वैक्सीन के तीन इंजेक्शन लगते हैं। एंटी रेबीज वैक्सीन के एक डोज की कीमत 500 रुपए है। निजी अस्पतालों में जाने वाले पीडि़त को पूरा डोज लेने के लिए 1500 रुपए की वैक्सीन के अलावा डॉक्टर की फीस और एंटी बायोटिक इंजेक्शन की कीमत अलग से चुकानी होती है। सड़क चलते राहगीर को कुत्ता काट ले तो इलाज करवाने में उसके ढाई से तीन हजार रुपए खर्च हो जाते हैं। मरहम पट्टी और ऑफिस या स्कूल से छुट्टी का नुकसान अतिरिक्त है।
80 से 100 केस रोजाना पहुंच रहे अस्पताल में
चरक अस्पताल की प्रबंधक हिमांगी चौहान ने बताया अस्पताल में 80-100 केस रोजाना आ रहे हैं। उन्हें एंटी वैक्सीन लगाई जा रही है। डॉग बाइट के पेशेंटों में ३० से 45 वर्ष आयु समूह के लोग ज्यादा है। कामकाज के लिए आना-जाना इसी आयु वर्ग समूह के लोग ज्यादा करते हैं। वेक्सिनेशन के बाद भर्ती करने की जरूरत नहीं रहती।
मेटिंग सीजन है इसलिए डॉग बाइट की घटनाएं ज्यादा
पशु चिकित्सा अधिकारी मुकेश जैन ने बताया जुलाई-अगस्त और जनवरी-फरवरी डॉग का मेटिंग सीजन होता है। इस सीजन में आते-जाते लोगों को यह बाधक समझकर हमला कर देते हैं। मेटिंग सीजन के अलावा अधिक गर्मी या अधिक ठंड होने पर एन्वायर स्ट्रेस के कारण भी डॉग बाइट की घटना बढ़ जाती है। इसके अतिरिक्त घायल होने, पेट में कीड़े होने, बुखार आने या स्किन प्रॉब्लम होने पर भी स्ट्रेस के कारण डॉग बाइट होती हैं। सिंहस्थ से पहले एंटी रेबीज वेक्सीनेशन के लिए मुख्यालय के प्रस्ताव भेजकर बजट मांगा है। जानकारी के अनुसार जिले में कुत्तों की संख्या 25 हजार और शहर में 10 हजार से अधिक है।
नसबंदी के बाद टांके सूखने तक आराम आवश्यक
डॉ. जैन ने बताया एनेस्थिसिया देने पर कई बार कुत्तों को उल्टी हो जाती है और भोजन श्वासनली में फंस जाने के कारण मौत हो जाती है। इसलिए नसबंदी से पहले कुत्ते को एक दिन भूखा रखते हैं ताकि उसका आमाशय खाली रहे। पोस्ट ऑपरेशन रिकवरी के लिए तीन से पांच दिन तक कुत्ते को रखते हैं और इसके बाद जहां से पकड़ा जाता है, उसे वहीं ले जाकर छोडऩा आवश्यक होता है।









