जेन-जी में ऊर्जा बहुत, पर अस्थिरता उनकी सबसे बड़ी कमजोरी – प्रेमनारायण नागर

स्वतंत्रता दिवस के खास मौके पर शहर के सबसे बुजुर्ग स्वतंत्रता संग्राम सेनानी से खास चर्चा
उज्जैन। शहर के सबसे बुजुर्ग स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रेमनारायण नागर(100) का कहना है कि मौजूदा दौर की नई पीढ़ी (जेन-जी) में ऊर्जा बहुत है, पर अस्थिरता उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है। बगैर निरंतरता के मंजिल हासिल करना मुश्किल काम होता है।
स्वतंत्रता दिवस के एक दिन पहले उनसे देश के ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा की गई। पेश है संपादित अंश।
Q. जेन जी का आप किस नजर से देखते हैं ?
A. नई पीढ़ी में ऊर्जा है।वह सवाल पूछती है। शिक्षा, रोजगार और ईमानदार व्यवस्था को लेकर उनकी अपेक्षाएं हैं। यह अच्छी बात है। लेकिन आंदोलन शुरू करना जितना आसान है, उसे लंबे समय तक चलाना उतना ही कठिन है।
Q. युवाओं की सबसे बड़ी कमजोरी क्या है?
A. अस्थिरता। शुरुआत वह बड़े उत्साह से करते हैं। बाद में व्यक्गित मतभेद, अहंकार और स्वार्थ आंदोलन को कमजोर कर सकते हैं। किसी भी बड़े बदलाव के लिए धैर्य और अनुशासन जरूरी है।
Q. आज भारत की सबसे बड़ी जरूरत क्या है ?
A. राष्ट्रीय चेतना। हमें शिक्षा और स्वास्थ्य को सबसे ऊपर रखना होगा। गरीब परिवार को एक गंभीर इलाज सालों पीछे धकेल देता है। अच्छी स्वास्थ्य व्यवस्था और अच्छी शिक्षा किसी भी मजबूत राष्ट्र की बुनियाद है।
Q. आपने अपनी जीवन में देश में सामाजिक बदलाव भी देखे हैं। कौन सा बदलाव आपको सबसे ज्यादा याद आता है?
A. एक समय देश सामाजिक सामाजिक कुरीतियों की चपेट में था। सती प्रथा जैसे दृश्य आम थे। पर भारत ने सुधार की लंबी यात्रा की है। हालांकि सुधार की प्रक्रिया कभी खत्म नहीं होती।
Q. 100 साल के अनुभव के आधार पर अगर आपको कोई संदेश देना हो तो वह क्या होगा?
A. भारत को केवल एक धार्मिक राष्ट्र के तौर पर मत देखिए। हमारे पास एक समृद्ध विरासत है। अपने कर्तव्यों के साथ इसे संभालना हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी की भावना रहेगी तो देश हमेशा मजबूत रहेगा।
Q. नई पीढ़ी से आपकी सबसे बड़ी उम्मीद क्या है?
A. युवा शिक्षित हों, सवाल पूछें, आगे बढ़ें,भारत को समझें, अपनी जड़ों को पकड़कर रखें, क्योंकि अपनी जड़ों को पकड़े बिना कोई भी समाज बहुत दूर तक नहंी जा सकता।
Q. जीवन के इस पड़ाव पर पीछे मुड़कर देखते हैं तो सबसे बड़ी सीख क्या मिलती है?
A. समय बहुत कुछ बदल देता है लेकिन देश और अपनी जिम्मेदारी के भाव कभी भी नहीं बदलना चाहिए। पद, पैसा और प्रतिष्ठा सब पीछे छूट जाता है, अंत में यही मायने रखता है कि आपने अपने देश और समाज के लिए क्या किया है।









