Aakhri Sawal Movie Review | इतिहास और RSS पर तीखी बहस, कैसी है संजय दत्त की ‘आखिरी सवाल’?

डायरेक्टर अभिजीत मोहन वारंग की नई फिल्म ‘आखिरी सवाल’ सिनेमाघरों में दस्तक दे चुकी है। यह फिल्म महज मनोरंजन नहीं बल्कि भारतीय इतिहास, राजनीति और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इर्द-गिर्द बुनी गई एक वैचारिक और तथ्यों से भरपूर बहस है। फिल्म सोशल मीडिया की नकली चमक-दमक और देश की जमीनी हकीकत के बीच के फर्क को बेहद संजीदगी से सामने रखती है। हाल ही में 100 साल पूरे कर चुके संगठन RSS के उन पहलुओं और योगदानों को यह फिल्म उजागर करती है जिनसे आम जनता आज भी अनजान है।
क्या है ‘आखिरी सवाल’ की कहानी?
फिल्म की कहानी एक होनहार लेकिन गुस्सैल युवक विक्की हेगड़े के इर्द-गिर्द घूमती है। विक्की ने RSS पर एक थीसिस लिखी है जिसे कॉलेज द्वारा खारिज कर दिया जाता है। इससे नाराज होकर वह अपने ही सम्मानित गुरु प्रोफेसर गोपाल नाडकर्णी पर संस्थागत पक्षपात का आरोप लगा देता है। अकादमिक स्तर पर शुरू हुआ यह विवाद धीरे-धीरे एक बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बन जाता है और आखिरकार एक हाई-वोल्टेज लाइव टीवी डिबेट का रूप ले लेता है। इस बहस के जरिए डायरेक्टर और लेखक ने कई संवेदनशील और ऐतिहासिक मुद्दों को छुआ है जिनमें महात्मा गांधी की हत्या और उससे जुड़े तथ्य, आपातकाल के काले दौर में RSS की भूमिका, बाबरी मस्जिद विध्वंस का घटनाक्रम, सुनामी जैसी आपदाओं में संगठन का राहत कार्य और केरल में एक संघ कार्यकर्ता की दुखद मौत जैसे मुद्दे शामिल हैं। फिल्म में यह नैरेटिव सेट किया गया है कि संगठन का मूल उद्देश्य जाति, पंथ और वर्ग के भेदभाव को मिटाकर हिंदू समाज को एकजुट करना और नागरिकों में सांस्कृतिक गौरव जगाना है।
उत्कर्ष नैथानी के दमदार डायलॉग्स ने मारी बाजी
इस फिल्म की असली जान इसकी कसी हुई स्क्रिप्ट और कड़क संवाद हैं। लेखक उत्कर्ष नैथानी ने RSS के प्रति समाज में बनी धारणाओं और जमीनी सच्चाई दोनों पक्षों को बेहद तार्किक और विश्वसनीय तरीके से आमने-सामने रखा है। फिल्म सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहती बल्कि हिंदू धर्म और इस्लाम दोनों के धार्मिक और ऐतिहासिक तथ्यों की गहराई में उतरती है। संवादों के जरिए दर्शकों को नटराज की मूर्ति के नीचे दबी अपस्मार पुरुष आकृति का आध्यात्मिक महत्व और इस्लामी ग्रंथों तथा शरिया के अनुसार मस्जिद निर्माण की अनिवार्य शर्तें जैसी अनोखी जानकारियां मिलती हैं जो आमतौर पर पर्दे के पीछे दबी रहती हैं।
तकनीक का मास्टरस्ट्रोक — अतीत को दिखाने के लिए AI का जादू
फिल्म की सबसे बड़ी खासियत इसका तकनीकी पक्ष है। अतीत की ऐतिहासिक घटनाओं और संगठन की 100 साल की यात्रा को पर्दे पर जीवंत करने के लिए किसी पुराने धुंधले फुटेज की जगह AI-जनरेटेड विजुअल्स का इस्तेमाल किया गया है। तकनीक का यह प्रयोग इतना शानदार और सटीक है कि हर दृश्य की बारीकी और कारीगरी स्क्रीन पर साफ झलकती है। यह तकनीक दर्शकों को सीधे उस दौर से जोड़ देती है और उन्हें इतिहास का हिस्सा होने का एहसास कराती है।
अभिनय — छा गए संजू बाबा, नमाशी चक्रवर्ती ने किया हैरान
संजय दत्त ने प्रोफेसर गोपाल नाडकर्णी के रूप में अपने करियर का बेहतरीन प्रदर्शन दिया है। शुद्ध हिंदी और कठिन संस्कृत श्लोकों के संवाद बोलते हुए उनका ठहराव, गंभीरता और संयम देखने लायक है। मिथुन चक्रवर्ती के बेटे नमाशी चक्रवर्ती ने बागी छात्र विक्की हेगड़े के रोल में सबको चौंका दिया है। पूरी फिल्म में वे संजय दत्त जैसे दिग्गज के सामने पूरी शिद्दत और आत्मविश्वास के साथ टिके रहते हैं। अमित साध ने एक छोटे से कैमियो में हमेशा की तरह प्रभावित किया है और मृणाल कुलकर्णी ने प्रोफेसर की पत्नी के रूप में शानदार काम किया है। हालांकि समीरा रेड्डी के चेहरे के बनावटी हाव-भाव निराश करते हैं और त्रिधा चौधरी तथा नीतू चंद्रा सजावटी किरदारों में सिमटकर रह गई हैं।
निर्देशन और संगीत — फिल्म को बोझिल नहीं होने दिया
117 मिनट की इस कसी हुई फिल्म को एडिट और डायरेक्ट करने का पूरा श्रेय अभिजीत मोहन वारंग को जाता है। उन्होंने फिल्म को कहीं भी उबाऊ नहीं होने दिया है। खासकर सेकंड हाफ और क्लाइमेक्स जो पूरी तरह अकाट्य तथ्यों पर आधारित है, दर्शकों को बांधे रखता है। मोंटी शर्मा का बैकग्राउंड स्कोर दृश्यों के तनाव को बखूबी उभारता है। फिल्म के अंत में बजने वाला इंदीवर का लिखा क्लासिक गाना थिएटर से बाहर निकलते हुए दर्शकों के दिलों में देशभक्ति का एक अलग जज्बा छोड़ जाता है।
रेटिंग — 3.5/5 स्टार: तथ्यात्मक सिनेमा और कड़क राजनीतिक ड्रामा पसंद करने वालों के लिए यह एक मस्ट-वॉच फिल्म है।





