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EV और एक्सपोर्ट पर ऑटो सेक्टर का बड़ा दांव, 3.5 लाख करोड़ निवेश की तैयारी

भारत का पैसेंजर व्हीकल सेक्टर इतिहास के सबसे बड़े निवेश दौर में कदम रख चुका है। रेटिंग एजेंसी इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक वित्त वर्ष 2026 से 2030 के बीच भारतीय ऑटो इंडस्ट्री 3.2 लाख करोड़ से लेकर 3.5 लाख करोड़ रुपये तक का रिकॉर्ड कैपेक्स करने की तैयारी में है। इस जबरदस्त निवेश के पीछे तीन बड़ी वजहें हैं — तेजी से बढ़ता EV बाजार, विदेशों में भारतीय गाड़ियों की बढ़ती मांग और देश में प्रीमियम कारों के प्रति ग्राहकों का बढ़ता रुझान।

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EV पर लगेगा सबसे बड़ा दांव

इस पूरे निवेश का 60 से 70 फीसदी हिस्सा इलेक्ट्रिक व्हीकल से जुड़े कामों पर खर्च होगा। EV प्लेटफॉर्म बनाना, बैटरी टेक्नोलॉजी विकसित करना और पूरा EV इकोसिस्टम तैयार करना — यही तीन मोर्चे आने वाले वर्षों में सबसे बड़ी प्राथमिकता बने रहेंगे। ऑटो कंपनियां मान चुकी हैं कि EV ही भविष्य का सबसे बड़ा बाजार है और इसीलिए अभी से बड़े पैमाने पर जमीन तैयार की जा रही है।

देश की टॉप 5 ऑटो कंपनियां अकेले दो लाख करोड़ से ज्यादा का निवेश करने की योजना में हैं। यह पैसा EV मॉडल, बैटरी सिस्टम, लचीली मैन्युफैक्चरिंग और निर्यात नेटवर्क को मजबूत करने में लगाया जाएगा।

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निर्यात बना नया मोर्चा

भारतीय ऑटो कंपनियां अब सिर्फ घरेलू बाजार पर निर्भर नहीं रहना चाहतीं। FY26 में पैसेंजर व्हीकल का निर्यात कुल बिक्री का 18.7 फीसदी तक पहुंच चुका है। FY23 से FY26 के बीच निर्यात में हर साल करीब 12 फीसदी की दर से बढ़ोतरी हुई है। कंपनियां अब ऐसे प्लांट तैयार कर रही हैं जो एक साथ घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों बाजारों की जरूरतें पूरी कर सकें।

शुरुआत में मुनाफे पर दबाव रहेगा

इतने बड़े निवेश का एक पहलू यह भी है कि शुरुआती दौर में कंपनियों के रिटर्न पर असर पड़ सकता है। FY23 से FY25 के बीच सेक्टर का ROCE 15 से 20 फीसदी के बीच था लेकिन अगले कुछ वर्षों में यह थोड़ा कम रह सकता है क्योंकि पहले निवेश होगा और कमाई बाद में आएगी।

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हालांकि इंडिया रेटिंग्स का मानना है कि ऑटो सेक्टर की वित्तीय सेहत फिलहाल काफी मजबूत है। FY25 के अंत तक सेक्टर का नेट लेवरेज -0.8x था और ऑपरेशन से आने वाला कैश फ्लो कैपेक्स से लगभग 2.4 गुना ज्यादा था। यानी कंपनियों के पास इतनी ताकत है कि वे बिना ज्यादा कर्ज लिए यह बड़ा दांव खेल सकती हैं।

किन चुनौतियों से करना होगा सामना?

रिपोर्ट में कुछ बड़े जोखिमों की भी चर्चा की गई है जो इस निवेश की राह में रोड़ा बन सकते हैं — EV अपनाने की रफ्तार उम्मीद से धीमी रहना, देश में चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी, नए EV प्लेयर्स के सामने उत्पादन की चुनौतियां और वैश्विक ऑटो कंपनियों से बढ़ती प्रतिस्पर्धा।

इंडिया रेटिंग्स के मुताबिक भारतीय पैसेंजर व्हीकल इंडस्ट्री एक बड़े ढांचागत बदलाव के मुहाने पर खड़ी है। आने वाले वर्षों में भारत सिर्फ पेट्रोल-डीजल कारों का बाजार नहीं बल्कि EV टेक्नोलॉजी और ग्लोबल एक्सपोर्ट का एक बड़ा केंद्र बनकर उभरेगा।

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