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स्कूल खुलने से पहले बच्चों की मोबाइल लत ऐसे छुड़ाएं

लाइफस्टाइल डेस्क। गर्मियों की छुट्टियां यानी बच्चों के लिए मौज-मस्ती और पाबंदियों से आजादी का दौर। लेकिन इस वेकेशन में कब बच्चे स्मार्टफोन, टैबलेट और टीवी जैसे ‘डिजिटल जाल’ में पूरी तरह फंस गए, माता-पिता को इसका अंदाजा भी नहीं लगा। सुबह आंख खुलने से लेकर देर रात सोने तक—इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉट्स और ऑनलाइन वीडियो गेम्स का चस्का बच्चों की दिनचर्या बन चुका है। अब जब छुट्टियां खत्म होने की कगार पर हैं और नए स्कूल सेशन की शुरुआत होने वाली है, तो हर घर में पैरेंट्स के सामने एक ही सबसे बड़ा सिरदर्द है—”बच्चे के हाथ से मोबाइल कैसे छुड़ाएं?”

 

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अगर आप भी रोज सुबह-शाम अपने बच्चे से फोन छीनने के लिए डांट-फटकार या गुस्से का सहारा ले रहे हैं, तो ठहरिए। इस तरीके से बात बनने के बजाय बच्चा और जिद्दी हो सकता है। स्कूल की घंटी बजने से पहले बच्चों के स्क्रीन टाइम को चालाकी और प्यार से नियंत्रित करने के लिए यहां 5 जादुई और व्यावहारिक टिप्स दिए जा रहे हैं, जो बिना किसी पारिवारिक ड्रामे के काम करेंगे:

1. अचानक बंद न करें, ‘डिजिटल टेपरिंग’ का फॉर्मूला अपनाएं

जिस तरह कोई व्यक्ति अचानक से मीठा खाना या कैफीन लेना बंद नहीं कर सकता, ठीक वैसे ही बच्चे भी रातों-रात मोबाइल नहीं छोड़ सकते। अगर आपका बच्चा दिन भर में 4 से 5 घंटे स्क्रीन पर बिता रहा है, तो उसे सीधे ‘जीरो’ पर लाने की भूल न करें।

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  • क्या है ट्रिक: इसके लिए ‘ग्रैजुअल रिडक्शन’ (Gradual Reduction) यानी धीरे-धीरे कटौती की नीति अपनाएं। आज से ही बच्चे के स्क्रीन टाइम में से रोज केवल 20 से 30 मिनट कम करना शुरू करें। स्कूल खुलने के दिन तक बच्चा बिना किसी चिड़चिड़ेपन या गुस्से के अपने पुराने और सामान्य रूटीन पर वापस आ जाएगा।

2. स्लीप साइकिल सुधारने के लिए ‘नो-स्क्रीन बेडटाइम’

स्कूल शुरू होने का सीधा मतलब है सुबह जल्दी उठना और रात को समय पर सोना। गैजेट्स से निकलने वाली नीली रोशनी (Blue Light) बच्चों के दिमाग में नींद पैदा करने वाले जरूरी हार्मोन ‘मेलाटोनिन’ के स्राव को रोक देती है, जिससे उनकी स्लीप साइकिल बिगड़ जाती है।

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  • क्या है ट्रिक: घर में कड़ाई से ‘नो-स्क्रीन बिफोर बेड’ का नियम लागू करें। सोने के समय से ठीक 1 घंटे पहले घर के सभी मोबाइल, टैबलेट और लैपटॉप को लिविंग रूम में बने एक कॉमन ‘चार्जिंग स्टेशन’ पर जमा करवा दें। शुरुआती कुछ दिन बच्चे बोरियत की शिकायत करेंगे, लेकिन जल्द ही उनकी जैविक घड़ी (Biological Clock) पटरी पर लौट आएगी।

3. घर में तय करें ‘स्क्रीन-फ्री ज़ोन’ और ‘स्क्रीन-फ्री टाइम’

बुरी आदतों को बदलने के लिए घर के माहौल में कुछ बुनियादी नियमों का होना बेहद जरूरी है। हालांकि, इन नियमों को लागू करते समय घर में तनाव का माहौल बनाने के बजाय इसे एक खेल की तरह पेश करें।

  • पारिवारिक नियम: दो जगहों पर मोबाइल का इस्तेमाल पूरी तरह प्रतिबंधित (बैन) होना चाहिए—पहला, डाइनिंग टेबल पर खाना खाते समय और दूसरा, बेडरूम में सोने जाते समय। सबसे खास बात यह है कि जब माता-पिता खुद इस नियम का पालन करेंगे, तो बच्चे भी बिना किसी विरोध के इसे आसानी से स्वीकार कर लेंगे।

4. बोरियत को दुश्मन नहीं, रचनात्मकता का दोस्त समझें

अक्सर पैरेंट्स की यह आदत होती है कि जैसे ही बच्चा कहता है कि “मैं बोर हो रहा हूँ”, वे अपना पीछा छुड़ाने या उसे व्यस्त रखने के लिए उसके हाथ में स्मार्टफोन थमा देते हैं। बाल मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, बोरियत बच्चों में रचनात्मकता (Creativity) को जन्म देती है।

  • बेहतरीन विकल्प: बच्चे को कुछ देर खाली बैठने और बोर होने दें। जब सामने स्क्रीन का विकल्प नहीं होगा, तो उनका दिमाग खुद-ब-खुद पुराने खिलौने, कॉमिक्स, पेंटिंग कलर्स या लेगो ब्लॉक्स की तरफ जाएगा। आप उन्हें लूडो, स्क्रैबल, शतरंज या कैरम जैसे मजेदार बोर्ड गेम्स लाकर दे सकते हैं या शाम को साइकलिंग के लिए बाहर भेज सकते हैं।

5. खुद रोल मॉडल बनें (बच्चे वही करते हैं जो देखते हैं)

यह पेरेंटिंग का सबसे कड़वा और अहम सच है कि बच्चे वह कभी नहीं करते जो हम उन्हें ‘कहते हैं’, बल्कि वे वही दोहराते हैं जो हमें ‘करते हुए देखते हैं’। अगर आप खुद दफ्तर या किचन के काम से फ्री होकर घंटों फेसबुक या रील्स स्क्रॉल कर रहे हैं, तो आपकी डांट का बच्चे पर कोई असर नहीं होगा।

  • क्वालिटी टाइम: जब आप बच्चों के साथ हों, तो अपना फोन साइलेंट मोड पर रखकर दूर रख दें। उनके साथ बात करें, उनके स्कूल की चर्चा करें और उन्हें महसूस कराएं कि आपके लिए स्क्रीन से ज्यादा जरूरी वे हैं।

सजा नहीं, इसे बनाएं एक रिवॉर्ड गेम

स्कूल खुलने में अब गिनती के दिन बचे हैं, इसलिए आज से ही इन ट्रिक्स को आजमाना शुरू कर दें। स्क्रीन टाइम कम करने के इस मिशन को किसी सजा या मिलिट्री रूल की तरह पेश करने के बजाय एक ‘गेम’ में बदल दें। जो बच्चा पूरे हफ्ते इस रूटीन को ईमानदारी से फॉलो करे, उसे वीकेंड पर उसकी पसंद की कोई डिश बनाकर या उसे उसकी पसंदीदा जगह या पार्क ले जाकर ‘रिवॉर्ड’ (पुरस्कार) दें।

तो फिर देर किस बात की? आज ही से इस ‘डिजिटल डिटॉक्स’ की शुरुआत कीजिए और अपने बच्चों को आभासी दुनिया से निकालकर किताबों, दोस्तों और खिलौनों की खूबसूरत व वास्तविक दुनिया में वापस लाइए!

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