AI इन्फ्लुएंसर से प्रचार, कंपनियां करा रहीं गुप्त अनुबंध

सोशल मीडिया स्क्रॉल करते समय अगर आपको कोई खूबसूरत मॉडल या आम उपभोक्ता किसी प्रोडक्ट की तारीफ करता हुआ दिखाई दे, तो सावधान हो जाइए। जरूरी नहीं कि स्क्रीन पर दिख रहा वह चेहरा किसी जीते-जागते इंसान का ही हो। टेक और मार्केटिंग जगत से आई एक चौंकाने वाली रिपोर्ट के मुताबिक, कई नामी कंपनियां अपने ब्रांड और प्रोडक्ट्स के प्रचार-प्रसार के लिए अब एआई (Artificial Intelligence) द्वारा तैयार किए गए ‘नकली इन्फ्लुएंसर्स’ का धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रही हैं। इन वीडियो और तस्वीरों को इतनी बारीकी से तैयार किया जाता है कि आम यूजर्स इन्हें किसी असली ग्राहक का वास्तविक अनुभव समझकर धोखे का शिकार हो रहे हैं।

एनडीए (NDA) का ढाल: सच छिपाने की कॉर्पोरेट साजिश
इस पूरे खेल का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि कंपनियां इस तकनीक के इस्तेमाल को पूरी तरह गुप्त रखना चाहती हैं।
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सच्चाई छिपाने का अनुबंध: रिपोर्ट के अनुसार, बड़े ब्रांड्स एआई कंटेंट बनाने वाले क्रिएटर्स और डिजाइनर्स से नॉन-डिस्क्लोजर एग्रीमेंट (NDA) यानी गोपनीयता का कड़ा अनुबंध साइन करा रहे हैं।
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क्रिएटर्स पर पाबंदी: इस कानूनी समझौते के कारण कंटेंट क्रिएटर्स चाहकर भी सार्वजनिक रूप से यह खुलासा नहीं कर सकते कि विज्ञापन में दिखने वाला चेहरा असल में एक कंप्यूटर प्रोग्राम (AI) द्वारा बनाया गया है।
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मुनाफे का गणित: ब्रिटेन की जानी-मानी एआई कंटेंट क्रिएटर क्लैरिसा मैन्सब्रिज ने इस बात की पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि कंपनियों के लिए एआई मॉडल्स के जरिए विज्ञापन तैयार करना पारंपरिक रूप से होने वाले महंगे फोटोशूट और रियल मॉडल्स की फीस की तुलना में बेहद सस्ता और आसान पड़ता है।
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ग्लोबल ब्रांड्स की खुली पोल: दुल्हन से लेकर फैशन मॉडल तक सब एआई
जांच और तकनीकी विश्लेषण में ऐसे कई वैश्विक उदाहरण सामने आए हैं, जहां कंपनियों ने उपभोक्ताओं को भ्रमित करने के लिए एआई चेहरों का सहारा लिया:
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वंस (Once) ऐप: अमेरिका के इस प्रसिद्ध फोटो एप्लीकेशन के एक प्रचार वीडियो में कई दुल्हनें ऐप को लेकर अपना बेहतरीन अनुभव साझा करती दिखीं। हालांकि, जब तकनीकी विशेषज्ञों ने वीडियो का बारीकी से विश्लेषण किया, तो साफ हुआ कि वे सभी चेहरे पूरी तरह एआई-जेनरेटेड (AI-Generated) थे।
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एशले (Ashley) ब्रांड: दुबई के इस नामी फैशन ब्रांड ने भी अपने सोशल मीडिया पर कपड़ों के प्रचार के लिए जो तस्वीरें पोस्ट की थीं, उनमें एआई टूल्स की तकनीकी कमियां और गड़बड़ियां (AI Artifacts) साफ पकड़ी गईं।
विशेषज्ञों और उपभोक्ता संगठनों का कहना है कि यह सीधे तौर पर लोगों के भरोसे के साथ खिलवाड़ है, जिससे आने वाले समय में डिजिटल विज्ञापनों और ब्रांड्स पर से जनता का विश्वास पूरी तरह उठ सकता है।
नियामक नीतियां: भारत में कड़ाई, पश्चिम में ढिलाई
एआई के इस भ्रामक इस्तेमाल को रोकने के लिए अलग-अलग देशों में कानूनी स्थिति अलग है:
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भारत (सख्त रुख): भारत सरकार ने इस मामले में समय रहते कड़े कदम उठाए हैं। नए नियमों के तहत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और कंपनियों के लिए किसी भी एआई-जेनरेटेड, मॉर्फ्ड या डीपफेक कंटेंट पर स्पष्ट रूप से ‘AI लेबल’ लगाना अनिवार्य कर दिया गया है, ताकि उपभोक्ता को सच पता रहे।
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ब्रिटेन और पश्चिमी देश (अस्पष्टता): इसके विपरीत, ब्रिटेन जैसे देशों में फिलहाल ऐसा कोई स्पष्ट कानून या नियामक ढांचा नहीं है, जो कंपनियों को यह बताने के लिए कानूनी रूप से बाध्य करे कि उनके विज्ञापन में दिख रहा चेहरा असली है या एआई की देन।









