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“भारतीय भाषा और साहित्य का अनुबंध” पुस्तक का विमोचन

मुंबई, 11 जून। महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी, मुंबई के कार्याध्यक्ष डॉ. शीतलाप्रसाद दुबे द्वारा अकादमी के कार्यकारी सदस्य एवं शिवाजी महाविद्यालय, रेनापुर, जिला लातूर के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. सतीश यादव और सरस्वती संगीत कला महाविद्यालय, लातूर के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. संतोष कुलकर्णी द्वारा संयुक्त रूप से सम्पादित “भारतीय भाषा और साहित्य का अनुबंध” विषय पर केन्द्रित पुस्तक का विमोचन सोमवार, 10 जून, 2024 को मुंबई में आयोजित गरिमापूर्ण कार्यक्रम में सम्पन्न हुआ।

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चर्चगेट, मुंबई स्थित सिडनम कॉलेज के सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम में महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी की उपाध्यक्षा श्रीमती प्रियंका ठाकुर और वरिष्ठ भाजपा नेता अमरजीत मिश्र के साथ महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी के कार्यकारी सदस्य डॉ. सतीश यादव, आनंद सिंह, गजानन महतपुरकर, भारती गोरे, प्रमिला शर्मा, विजेन्द्र बत्रा, अमोल पेडणेकर, डॉ. प्रमोद शुक्ल, श्याम शर्मा, दिनेश प्रताप सिंह, राघवेन्द्र द्विवेदी, चंद्रकांत भौंजाल, जगदीश थपलियाल, अरविंद शर्मा, मार्कंडेय त्रिपाठी, कमला बडोनी तथा अकादमी के सचिव एवं सह निदेशक सचिन निंबाळकर भी उपस्थित थे।

इस अवसर पर ग्रंथ की प्रासंगिकता पर सार्थक चर्चा हुई। यह ग्रंथ भारतीय भाषाओं के अध्येताओं के लिए संदर्भ ग्रंथ के रूप में अत्यंत उपयोगी साबित होगा, ऐसा विश्वास डॉ. शीतला प्रसाद दुबे ने व्यक्त किया। डॉ. सतीश यादव ने कहा कि भारत एक महादेश है, जिसमें 1652 मातृभाषाएँ, 200 वर्गीकृत भाषाएँ और 10 लिपियों का प्रयोग सामान्य तौर पर होता है। हमारे देश की विशेषता विविधता में एकता के रूप में जानी जाती है।

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उन्होंने बताया कि “भारतीय भाषा और साहित्य का अनुबंध” विषय पर केंद्रित पुस्तक के माध्यम से हिंदी- बांग्ला, हिंदी- गुजराती, हिंदी- कन्नड, हिंदी- तेलुगु, हिंदी- अरुणाचली , हिंदी- तमिल तथा हिंदी- मराठी भाषाओं एवं साहित्यों में स्थित अंत:संबंधों की पहचान सुधी अध्येताओं ने की है। इसमें प्रोफेसर सूर्यनारायण रणसुभे, डॉ .कालीचरण झा, डॉ. कुमारी उर्वशी, डॉ. मोर्जुम लोयी, डॉ प्रतिभा प्रसाद, पार्वती कच्छप, डॉ .अवधेश कुमार मेहता, डॉ. बबन बोडके और डॉ. पंडित बन्ने आदि विद्वतजनों ने इस संदर्भ में नये आयाम प्रस्तुत किये हैं।

इस पुस्तक में संत साहित्य, अनुवाद साहित्य , व्याकरण के स्तर पर जो प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं, उन्हें भी समाविष्ट किया गया है। यह पुस्तक भारतीयता जैसे बड़े मूल्यवान पहलू को संकीर्ण साम्प्रदायिकता में बदले जाने के खतरे की तरफ भी इशारा करती है। कार्यक्रम में शामिल सभी गणमान्य साहित्यकारों ने इस सृजनात्मक उपलब्धि के लिए डॉ. सतीश यादव को हार्दिक बधाई दी।

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