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ऋषि पंचमी 2026: जानिए व्रत से जुड़ी प्रमुख पौराणिक कथाएं

ऋषि पंचमी का पर्व हिंदू धर्म में सप्तऋषियों के प्रति श्रद्धा और सम्मान का प्रतीक माना जाता है। इस दिन व्रत रखने के साथ ऋषि पंचमी की कथा सुनने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह कथा मनुष्य को अपने कर्मों, संस्कारों और आत्मशुद्धि का महत्व समझाती है। ऋषि पंचमी 2026 में 15 सितंबर, मंगलवार को मनाई जा रही है।

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  • राजा सिताश्व और ब्रह्मा जी का संवाद

एक बार राजा सिताश्व ने ब्रह्मा जी से धर्म और ऐसे व्रत के बारे में पूछा, जिससे मनुष्य अपने पापों से मुक्ति पा सके। उन्होंने कहा, “हे पितामह! आप सभी धर्मों के ज्ञाता हैं। कृपया मुझे ऐसे श्रेष्ठ व्रत के बारे में बताइए, जिसके प्रभाव से मनुष्य के जाने-अनजाने किए गए पाप दूर हो सकें।”

राजा की बात सुनकर ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए। उन्होंने बताया कि ऋषि पंचमी का व्रत आत्मशुद्धि और पापों से मुक्ति की भावना से जुड़ा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत को करने से मनुष्य को अपने दोषों से मुक्ति मिलती है।

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  • उत्तंक ब्राह्मण की पुत्री की कथा

विदर्भ देश में उत्तंक नामक एक ब्राह्मण अपनी पत्नी सुशीला और दो बच्चों के साथ रहते थे। समय आने पर उन्होंने अपनी पुत्री का विवाह कर दिया, लेकिन कुछ समय बाद वह विधवा हो गई। इसके बाद ब्राह्मण दंपत्ति अपनी पुत्री के साथ गंगा तट पर रहने लगे।

एक दिन सोते समय उनकी पुत्री के शरीर में अचानक कीड़े पड़ गए। यह देखकर मां सुशीला बहुत दुखी हुईं और उन्होंने अपने पति से इसका कारण पूछा। उत्तंक ब्राह्मण ने ध्यान लगाकर बताया कि पूर्व जन्म में उनकी पुत्री ने रजस्वला अवस्था में घर के बर्तनों को छू दिया था। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी कारण उसे कष्ट भोगना पड़ा।

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उन्होंने पुत्री को ऋषि पंचमी का व्रत करने की सलाह दी। पुत्री ने श्रद्धा और विधि-विधान से व्रत रखा तथा सप्तऋषियों की पूजा की। कथा के अनुसार, व्रत के प्रभाव से उसके कष्ट दूर हुए और उसे सुख की प्राप्ति हुई।

  • माता-पिता की मुक्ति से जुड़ी कथा

सतयुग में विदर्भ नगरी के राजा श्येनजित के राज्य में सुमित्र नामक एक किसान अपनी पत्नी जयश्री के साथ रहता था। धार्मिक कथा के अनुसार, पिछले जन्म के कर्मों के कारण मृत्यु के बाद जयश्री को कुतिया और सुमित्र को बैल की योनि मिली। दोनों को अपने पिछले जन्म की बातें याद थीं और वे अपने पुत्र सुचित्र के घर के आसपास ही रहने लगे।

एक दिन सुचित्र के घर श्राद्ध का आयोजन था। उसकी पत्नी चंद्रवती ने ब्राह्मणों के लिए भोजन बनाया। इसी दौरान एक विषैले सर्प ने खीर में विष डाल दिया। कुतिया बनी जयश्री ने यह देख लिया और पुत्र को अनजाने में पाप से बचाने के लिए खीर में मुंह डाल दिया।

यह देखकर चंद्रवती ने क्रोध में कुतिया को भगा दिया और पूरा भोजन फेंककर नया भोजन बनाया। उस दिन कुतिया को भोजन भी नहीं मिला। बाद में वह बैल बने अपने पति के पास गई और दोनों ने अपने दुख की चर्चा की।

उनकी बातचीत सुचित्र ने सुन ली। उसने माता-पिता को भोजन कराया और उनकी मुक्ति का उपाय जानने के लिए वन में सर्वतमा ऋषि के पास गया। ऋषि ने बताया कि भाद्रपद शुक्ल पंचमी को पत्नी सहित स्नान कर अरुंधती समेत सप्तऋषियों की पूजा करें और व्रत का पुण्य अपने माता-पिता को अर्पित करें।

सुचित्र ने घर लौटकर ऐसा ही किया। कथा के अनुसार, ऋषि पंचमी व्रत के प्रभाव से उसके माता-पिता पशु योनि के कष्टों से मुक्त होकर उत्तम लोक को प्राप्त हुए।

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