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बच्चों की जिद से हैं परेशान? ये आसान पेरेंटिंग ट्रिक्स बदल सकती हैं उनका पूरा व्यवहार

हर मां-बाप का सपना होता है कि उनका बच्चा समझदार, शांत और संस्कारी बने। लेकिन छोटे बच्चों में जिद करना एक ऐसी आम बात है जो लगभग हर घर में देखने को मिलती है। कभी खिलौने के लिए रोना, कभी मोबाइल छोड़ने से इनकार करना और कभी अपनी बात मनवाने के लिए पूरा घर सिर पर उठा लेना। ऐसे में कई माता-पिता या तो गुस्से में डांटने लगते हैं या फिर झल्लाहट से बचने के लिए तुरंत बच्चे की मांग मान लेते हैं। लेकिन विशेषज्ञों की मानें तो दोनों ही तरीके लंबे समय में स्थिति को और बिगाड़ सकते हैं। बच्चे की जिद को समझदारी और धैर्य के साथ संभालना ही असली और टिकाऊ हल है।

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बच्चा जिद क्यों करता है, पहले यह समझें

दरअसल छोटे बच्चे अपनी भावनाओं को शब्दों में बयान नहीं कर पाते। जब उनकी कोई इच्छा अधूरी रह जाती है तो वे रोने, चिल्लाने या गुस्सा करने के जरिए अपनी बात कहने की कोशिश करते हैं। कई बार बच्चे सिर्फ यह जानना चाहते हैं कि मां-बाप का ध्यान उन पर है या नहीं। अगर हर बार उनकी हर मांग फौरन पूरी कर दी जाए तो उनके मन में यह धारणा बन जाती है कि जिद करने से सब कुछ मिल जाता है। यही सोच धीरे-धीरे एक पक्की आदत का रूप ले लेती है।

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गुस्सा नहीं, शांति ही है सबसे बड़ा हथियार

जब बच्चा जिद पर अड़ा हो तो उस वक्त जोर से डांटना या मारना आग में घी डालने जैसा है। बच्चा डरने की बजाय और ज्यादा चिड़चिड़ा और ढीठ हो सकता है। ऐसे नाजुक पलों में शांत रहकर बच्चे से बात करना कहीं ज्यादा कारगर साबित होता है। अगर बच्चा किसी चीज के लिए रो रहा है तो पहले धैर्य से उसकी बात सुनें। अक्सर सिर्फ यह महसूस होना कि कोई उसे समझ रहा है, बच्चे को खुद-ब-खुद शांत कर देता है।

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हर बार हां कहना भी नुकसानदेह है

बहुत से माता-पिता बाजार में या सार्वजनिक जगहों पर शर्मिंदगी से बचने के लिए बच्चे की मांग फौरन मान लेते हैं। लेकिन यही आदत बच्चे की जिद को और बड़ा करती है। बच्चे को धीरे-धीरे यह सीखना भी जरूरी है कि हर बात के लिए हां नहीं होती। हालांकि ना बोलते वक्त तरीका बेहद मायने रखता है। सिर्फ मना करने की बजाय उसे प्यार से कारण समझाना बच्चे के मन में बात को बेहतर तरीके से बिठाता है।

मोबाइल और स्क्रीन बढ़ा रहे हैं जिद की आदत

आजकल मोबाइल और टेलीविजन बच्चों की दिनचर्या और स्वभाव पर गहरा असर डाल रहे हैं। जो बच्चे ज्यादा स्क्रीन देखते हैं वे जल्दी चिड़चिड़े और गुस्सैल हो जाते हैं। गेम या वीडियो बंद होते ही उनमें जिद और रोना-धोना शुरू हो जाता है। इसलिए बच्चों का स्क्रीन टाइम सीमित रखना और उन्हें बाहरी खेलों, किताबों और रचनात्मक गतिविधियों में व्यस्त रखना बेहद जरूरी और फायदेमंद है।

अच्छे व्यवहार की तारीफ करना न भूलें

जब भी बच्चा बिना जिद किए किसी बात को शांति से मान ले, तो उसकी तुरंत तारीफ करें। इससे बच्चे के मन में अच्छे व्यवहार को दोहराने की स्वाभाविक प्रेरणा जागती है। विशेषज्ञ इसे सकारात्मक प्रोत्साहन कहते हैं जो बच्चे के व्यक्तित्व को सही दिशा में ढालने का सबसे असरदार तरीका माना जाता है।

बच्चे से पहले खुद को संभालें

बच्चे अपने आसपास के लोगों को देखकर ही सबसे ज्यादा सीखते हैं। अगर घर में हर छोटी-छोटी बात पर गुस्सा, बहस या तनाव का माहौल रहता है तो उसकी छाया बच्चे के स्वभाव पर भी जरूर पड़ती है। इसलिए माता-पिता का खुद शांत, धैर्यवान और संतुलित रहना उतना ही जरूरी है जितना बच्चे को सही सीख देना। घर का माहौल जैसा होगा, बच्चे का स्वभाव भी वैसा ही बनेगा।

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