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महाकाल मंदिर प्रांगण में हल्दी उत्सव शास्त्रोक्त नहीं

दर्शनार्थी महिलाओं ने शुरू की नई परंपरा, जमकर उड़ती है हल्दी

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अक्षरविश्व न्यूज उज्जैन। शिव नवरात्रि महोत्सव के दौरान पिछले कुछ सालों से महाकाल मंदिर प्रांगण में महिलाओं द्वारा हल्दी उत्सव मनाया जा रहा है। हर साल इस उत्सव में महिलाओं की संख्या बढ़ती जा रही है। इस दौरान भजन, डांस के साथ हल्दी का खेला भी होता है। पुजारी परिवार का मानना है कि यह प्राचीन उत्सवों का नया स्वरूप हमेशा विवाद का कारण बना है। होली पर हुआ हादसा इसका प्रमाण है। यह उत्सव और बढ़ा रूप ले इसके पहले मंदिर समिति को इसे रोकना चाहिए।

नियमित दर्शन करने वाली महिलाओं ने कुछ साल पहले इसकी शुरुआत की थी, जिसे वे शिव विवाह के उत्सव के रूप में मनाती हैं। शिव नवरात्रि के दौरान जब भगवान का विशेष श्रृंगार होता है, तब 50 से 100 महिलाएं भजन मंडली के साथ नाचते-गाते हुए एक-दूसरे को हल्दी लगाती हैं। इस कथित शिव विवाह उत्सव में अन्य दर्शनार्थी भी शामिल हो जाते हैं। शहर की अन्य महिलाएं भी इस उत्सव में शामिल होने लगीं। अन्य सामान्य दर्शनार्थी भी इसे परंपरा मानने लगे हैें। पुजारियों की अपील है कि यह परंपरा नहीं है और न ही यह विवाह उत्सव है। यह सिर्फ पूजन का अवसर है।

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मंदिर समिति उठा सकती है कड़े कदम: इस मामले में मंदिर समिति के पास औपचारिक शिकायत भी पहुंची हैं। जिम्मेदारों ने संकेत दिए हैं कि विचार विमर्श के बाद इसे सख्ती से रोका जाएगा।

विवाह बाधा के लिए ले जाती हैं हल्दी
कुछ महिलाएं यहां आकर उत्सव की हल्दी अपने साथ ले जाती हैं और रिश्तेदारों को भेजती हैं। इनका ऐसा मानना है जिस लड़का या लड़की की शादी होने में बाधा हो रही है, यह हल्दी लगाने से एक साल के भीतर उसका विवाह हो जाता है। इस कारण हल्दी उत्सव में धीरे-धीरे भीड़ बढऩे लगी है।

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पूजा को मजाक न बनाएं

पुजारी महेश शर्मा का कहना है कि शिव पुराण और अन्य शास्त्रों में इस तरह हल्दी खेलने का कोई उल्लेख नहीं है। उन्होंने इसे सनातन परंपरा के विपरीत बताते हुए मंदिर समिति से इस पर तत्काल रोक लगाने की मांग की है। उन्होंने कहा कि शिवनवरात्रि महोत्सव केवल उज्जैन महाकाल मंदिर में नौ दिन मनता है। जिसमें भगवान कोटेश्वर को उबटन अर्पित होता है। भगवान महाकाल को भी केशर-चंदन का उबटन, मां जगदंबा स्वरूप जलधारा पर हल्दी-कुंकु-मेहंदी आदि अर्पित कर विधि-विधान से पूजन होता है।

प्रतिदिन अलग स्वरूप में श्रृंगार होता है। सिर्फ महाशिवरात्रि को सेहरा लगाकर दूल्हा स्वरूप में महाकाल को श्रृंगारित करते हैं, जिसे लोग अब विवाह के उत्सव के रूप में मनाने लगे हैं। यह भगवान शिव के विवाह का उत्सव नहीं है। यह केवल पूजा, आराधना और संकल्प का पर्व है। शास्त्रों और शिव पुराण में शिवरात्रि को विवाह उत्सव, हल्दी उत्सव, रिसेप्शन आदि किसी रस्म का उल्लेख नहीं है। यह नए-नए उपक्रम परंपरा का मजाक है। मंदिर समिति को इस पर समय रहते प्रतिबंध लगाना चाहिए ताकि भविष्य में यह और घातक न हो।

क्या है शिवनवरात्रि और महाशिवराात्रि
शिवरात्रि हर महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी पर होती है। पुजारी महेश शर्मा ने सप्रमाण जानकारी दी कि शिव पुराण में व्याग्र (शिकारी) द्वारा इस रात चार प्रहर की पूजन की थी जिससे भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिए थे। भगवान शिव के प्राकट्य दिवस को महाशिवरात्रि कहा जाने लगा। इस रात सिर्फ पूजन, संकल्प और आराधना का महत्व है। उसी के मुताबिक महाकाल मंदिर मेें पूरी रात विधि विधान से पूजन-अर्चन होती है। विवाह उत्सव नहीं मनता। शिव नवरात्रि महोत्सव सिर्फ उज्जैन में मनता है, क्योंकि यहां साक्षात जगदंबा (शक्तिपीठ हरसिद्धि माता) भी विराजित हैं।

कब हुआ था भगवान शिव का विवाह
शिव पुराण के मुताबिक भगवान शिव का सती माता से विवाह चैत्र के शुक्ल पक्ष में और माता पार्वती से माघ माह में शुक्ल पक्ष में हुआ था। महेश पुजारी के मुताबिक शिव पुराण में इसका विस्तृत वर्णन है। महाशिवरात्रि को भगवान के विवाह का कोई उल्लेख नहीं है।

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