दशकों में कैसे बदली पैरेंटिंग, जानिए नए ट्रेंड्स

पिछले कुछ दशकों में भारतीय समाज की पारिवारिक संरचना में आए बदलावों का सबसे सीधा असर बच्चों के पालन-पोषण (पैरेंटिंग) के तरीकों पर पड़ा है। कभी संयुक्त परिवारों में सबकी सामूहिक जिम्मेदारी के बीच पलने वाले बच्चे, आज एकल (न्यूक्लियर) परिवारों में माता-पिता के विशेष फोकस और हाइब्रिड पैरेंटिंग के साए में बड़े हो रहे हैं। इस बदलाव के साथ ही माता-पिता की सोच, उनकी प्राथमिकताएं और बच्चों के प्रति उनका दृष्टिकोण पूरी तरह बदल चुका है। अब केवल किताबी पढ़ाई या कठोर अनुशासन को ही बच्चों की सफलता का एकमात्र पैमाना मानने वाले परिवारों की संख्या तेजी से घट रही है।

सामूहिक जिम्मेदारी से व्यक्तिगत फोकस तक का सफर
‘जर्नल ऑफ इमर्जिंग टेक्नोलॉजी एंड इनोवेटिव रिसर्च’ में प्रकाशित एक शोध के मुताबिक, 1990 के दशक से पहले भारतीय समाज में बच्चों की परवरिश पूरे कुनबे या मोहल्ले की साझी जिम्मेदारी मानी जाती थी। दादा-दादी, चाचा-चाची और बड़े भाई-बहन बच्चों के विकास में बराबर की भूमिका निभाते थे, जहां ऐतिहासिक और धार्मिक महापुरुषों की कहानियां उनके चरित्र निर्माण का मुख्य स्रोत हुआ करती थीं।
इस व्यवस्था में बच्चे रिश्तों का महत्व, आपस में चीजें साझा करना (शेयरिंग) और सामंजस्य बिठाना स्वाभाविक रूप से सीख जाते थे। हालांकि, इसकी अपनी सीमाएं भी थीं; बच्चों को व्यक्तिगत ध्यान (Personal Attention) कम मिल पाता था और उनकी व्यक्तिगत भावनात्मक जरूरतों पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता था जितना आज के दौर में दिया जाता है।
बदलते दौर के आंकड़े: सर्वे में सामने आए चौंकाने वाले सच
वैश्विक डेटा और सर्वे एजेंसी ‘यूगव’ (YouGov) के एक हालिया सर्वेक्षण ने भारतीय माता-पिता की बदलती मानसिकता को रेखांकित किया है:
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परवरिश का तरीका: आज के केवल 20% माता-पिता ही ऐसे हैं जो अपने बच्चों को बिल्कुल उसी ढर्रे पर बड़ा करना चाहते हैं, जैसे उनके खुद के माता-पिता ने उन्हें किया था। यानी करीब 80% पैरेंट्स पुरानी रूढ़िवादी तकनीकों को छोड़ना चाहते हैं।
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सख्ती बनाम समझदारी: सर्वे के अनुसार, 75% माता-पिता का मानना है कि बच्चों पर अत्यधिक पाबंदियां या सख्ती लादने के बजाय उन्हें प्यार, धैर्य और आपसी समझदारी से समझाना कहीं अधिक प्रभावी और सकारात्मक परिणाम देता है।
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पढ़ाई का महत्व: केवल 43% माता-पिता ही अब शिक्षा को जीवन में सफलता का मुख्य आधार मानते हैं, जबकि पहले यह आंकड़ा 54% हुआ करता था।
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बढ़ती चुनौतियां: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) द्वारा किए गए एक अन्य सर्वे में शामिल हर 5 में से 1 माता-पिता ने स्वीकार किया कि बदलते परिवेश में बच्चों की सही परवरिश करना उनके लिए एक बड़ी मनोवैज्ञानिक और सामाजिक चुनौती बनता जा रहा है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ? डिजिटल और वास्तविक जीवन में संतुलन जरूरी
चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट और पैरेंटिंग कोच पायल चौरसिया के अनुसार, “परवरिश का दायरा केवल बच्चों को समय पर भोजन देने और अच्छी स्कूली शिक्षा की व्यवस्था करने तक सीमित नहीं है। इसका वास्तविक उद्देश्य बच्चों में पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय मूल्यों का बीजारोपण करना है, ताकि वे समाज के एक जिम्मेदार और सफल नागरिक बन सकें।”
वे आगे कहती हैं कि आज के माता-पिता के सामने सबसे बड़ी चुनौती बच्चों को डिजिटल आभासी दुनिया (स्क्रीन टाइम) और वास्तविक जीवन के बीच एक सही संतुलन सिखाने की है। आज के प्रतिस्पर्धी दौर में केवल अच्छे अंक या कड़ा अनुशासन काफी नहीं है; बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health), भावनात्मक बुद्धिमत्ता (Emotional Intelligence), आत्मविश्वास और सामाजिक कौशलों (Social Skills) को निखारना माता-पिता की प्राथमिक जिम्मेदारी बन गया है।
दशकों के साथ कैसे बदले पैरेंटिंग के मुख्य मॉडल?
आर्थिक उदारीकरण और शहरीकरण के बाद, सन 1990 के बाद से पैरेंटिंग की शैलियों में तेजी से बदलाव आया है, जिन्हें मुख्य रूप से इन श्रेणियों में समझा जा सकता है:
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सत्तावादी (Authoritarian): इसमें माता-पिता बेहद कड़े नियम तय करते हैं और बच्चों से बिना किसी सवाल-जवाब के उनका पालन करने की उम्मीद की जाती है।
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आधिकारिक (Authoritative): यहां नियम तो स्पष्ट होते हैं, लेकिन माता-पिता बच्चों की भावनाओं का सम्मान करते हैं और उनके साथ दोस्ताना संवाद बनाए रखते हैं।
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हेलीकॉप्टर और टाइगर पैरेंटिंग: 2000 के दशक में उभरी इस शैली में माता-पिता बच्चों की सुरक्षा और उनके हर काम पर चौबीसों घंटे पैनी नजर रखते हैं (हेलीकॉप्टर) या फिर उनसे पढ़ाई और एक्स्ट्रा-करिकुलर एक्टिविटीज में हर हाल में अव्वल आने की अत्यधिक मांग करते हैं (टाइगर)।
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परमिसिव (Permissive): 2010 के बाद लोकप्रिय हुई इस शैली में माता-पिता बच्चों के दोस्त बनकर रहते हैं और उनकी हर मांग पूरी करते हैं, लेकिन नियम या सीमाएं तय नहीं करते।
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उदासीन (Uninvolved): इसमें बच्चों को पूरी आजादी तो मिलती है, लेकिन उनमें माता-पिता के साथ भावनात्मक जुड़ाव या सही मार्गदर्शन की भारी कमी देखी जाती है।
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जेंटल या हाइब्रिड पैरेंटिंग: कोविड-19 महामारी के बाद इस आधुनिक तकनीक की चर्चा सबसे ज्यादा है। इसमें बच्चों को किसी गलती पर शारीरिक या मानसिक सजा देने के बजाय उन्हें सही और गलत का अंतर सिखाया जाता है। इसमें बच्चों को प्रोत्साहित करने और अपनी गलतियों से खुद सीखने का पर्याप्त अवसर देने पर जोर रहता है।









