80/84 महादेव : श्री स्वप्नेश्वर महादेव मंदिर

By AV NEWS

ये च पुष्पैर्विचित्रैश्चपूजयन्ति च पर्वसु।

ते सर्वकामसम्पन्ना: श्रीबलारोग्यसंयुता:।।

दीर्घायुष: शुभाचरा जायन्ते देहिनोऽमला:।।

(अर्थात्- जो विविध पुष्पों से लिंग पूजा करेंगे, वे सर्वकामनासम्पन्न, श्रीमान्, निरोग, दीर्घायु, शुभाचारी तथा निर्मल होंगे।)

यह मंदिर विश्व प्रसिद्ध श्री ज्योतिर्लिंग महाकाल मंदिर में ऊपरी तल पर श्री ओंकारेश्वर मंदिर वाले समतल प्रांगण के पश्चिमोत्तर वायव्य कोण में स्थित है। मंदिर का मुख्य द्वार पूर्वाभिमुखी है, जबकि इसके उश्रर तथा दक्षिण दिशाओं में भी चैनल गेट हैं, जो सदैव खुले रहते हैं।

पूर्व से प्रवेश करने पर करीब एक सौ वर्गफीट का सभामंडप है जिसमें सवा फीट लम्बी व दस इंच चौड़ी सफेद मार्बल की नंदी की कलात्मक प्रतिमा स्थापित है। गर्भगृह में प्रवेश करने पर करीब 3 फीट चौड़ी उश्ररामुखी पीतल की जलाधारी है जिसके मध्य पीतल के दीर्घ नाग से आवेष्ठित लाल व भूरे रंग के पाषाण में निर्मित स्वप्नेश्वर महादेव का दिव्य लिंग प्रतिष्ठित है जिसके ऊपर सवा फीट चौड़ा 5 फणों वाला दर्शनीय नाग छाया किये हुए है।

जलाधारी ऊं आकृति से शोभित पीतल की बॉडर से आवृश्र है। गर्भगृह में हमारे प्रवेश पर बायें ताक में सवा फीट ऊंची गणेश, सामने दीवार पर 10 इंच ऊंची पार्वती तथा दायें ताक में सवा फीट ऊंची कार्तिकेय की मूर्तियां स्थापित हंै। सभी मूतियां सफेद मार्बल की हैं तथा फर्श पर मार्बल की टुकडिय़ों की कलात्मक पच्चीकारी है तथा दीवारों पर टाइल्स जड़े हैं।

लिंग के माहात्म्य की कथा- आदित्यकाल में इक्ष्वाकु वंश में कल्माषपाद राजा ने वसिष्ठ मुनि के पुत्र शक्ति को मार्ग छोडऩे की बात पर चाबुक से आघात किया, फलत: राजा नरभक्षी बनने से शापित हुए। तदनंतर शक्ति व उनके अन्य भाइयों को राक्षसवत् भक्षण कर गया, पापमुग्ध राजा भयानक दु:स्वप्न देखता था।

वह दु:स्वप्न में सागर, पृथ्वी, पर्वत शिखर, लाल रमणियों द्वारा स्वर्ण-लौह व चांदी से बंधने, पक्षियों द्वारा खरोंचे जाने व श्रृगाल द्वारा खाये जाने जैसे बुरे स्वप्न देखता था। उसे जलहीन नदी में डूबने, गदहे द्वारा दांतों से चीरे जाने, वेतालगण द्वारा नेत्रों पर आघात किये जाने और असंख्य तीरों द्वारा विद्ध किये जाने जैसे दु:स्वप्नों से अशांत व अनाथ सा हो रहा हूँ। यह सब स्थिति जानकर राजा के मंत्रियों व अन्य लोगों ने राजा को ढांढस बंधाया तथा पितृगण-देवगण, ब्राह्मणों की पूजा करने का परामर्श दिया।

तब राजा ने वसिष्ठ मुनि के 99 पुत्रों का भक्षण करने की बात कही तथा अग्नि में जीवित विसर्जित हो जाने का निर्णय बताया। जब राजा सभी के साथ ब्रह्महत्या से मुक्ति का उपाय पूछने वसिष्ठजी के आश्रम पहुंचा तो उनकी पुत्री अदृश्यन्ती ने कहा – ये भीषण राक्षस हमारे भक्षण हेतु आया है।

महर्षि वसिष्ठ ने कहा – ये राक्षस नहीं, राजा कल्माषपाद हैं। महर्षि ने हुंकार से निवारण करते मन्त्रपूत जल से राजा को राक्षसभाव रहित कर दिया तथा उसे कुशस्थली (अवंतिका) जाकर महाकाल के समीप दु:स्वप्ननाशक लिंग का दर्शन कर भयरहित होने का कहा। राजा ने यहां आकर लिंग का दर्शन किया, उसके दु:स्वप्न सुस्वप्न में परिवर्तित हो गये। राजा पुन: अयोध्या का राज्य करने लगा तब से यह लिंग सुस्वप्नेश्वर के नाम से प्रसिद्ध है।

फलश्रुति- जो मानव इस लिंग के दर्शन करता है, वह इहलोक में सदैव पूज्य है तथा उसकी अभिलाषाएं फलित होती है। प्रसंगत: दर्शन करने से ही पुण्यमयी योगीगण की गति प्राप्त होती है।

लेखक – रमेश दीक्षित

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