पीते हैं तो तबीयत खराब होती है, नहीं पीते तो नीयत

तालियों की गूंज और ठहाकों के बीच बीती रात, मालीपुरा में पूरी रात चला कवि सम्मेलन
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उज्जैन। मालीपुरा चौराहे पर आयोजित कवि सम्मेलन में जब कवियों ने अपनी रचनाओं का पाठ शुरू किया, तो श्रोता अपनी जगह से हिल न सके। हास्य की चुटकियों से लेकर प्रेम की गहराई और राजनीति पर तीखे कटाक्षों ने रात को यादगार बना दिया। होलिका उत्सव की पूर्व संध्या पर मंगलवार रात मालीपुरा सांस्कृतिक समिति द्वारा आयोजित 79वां अभा कवि सम्मेलन एक बार फिर साहित्य प्रेमियों के लिए स्मरणीय सौगात लाया
सम्मेलन का आकर्षण मुंबई से आए प्रख्यात हास्य व्यंग्य कवि आशकरण अटल और सुनील व्यास रहे, जिनकी चुटकियों पर श्रोता ठहाके लगाने को मजबूर हो गए। सांसद अनिल फिरोजिया, विधायक अनिल जैन कालूहेड़ा और भाजपा नगर अध्यक्ष संजय अग्रवाल अतिथि थे। समिति संरक्षक सत्यनारायण चौहान, अध्यक्ष राकेश चौहान और सचिव मुकेश बारोट ने बताया कि सम्मेलन के लिए मालीपुरा चौराहे को सुगंधित फूलों से दुल्हन की तरह सजाया गया था। पुष्प सज्जा जानकीलाल गहलोत ने की थी। संचालन:संजय देवधर एवं संदीप राजनोद किया। कवि सम्मेलन के सूत्रधार अशोक भाटी थे।
मंच से गूंजीं प्रमुख रचनाएं
अशोक भाटी (उज्जैन)- स्थानीय रंग में रंगे व्यंग्य को पढ़ते हुए कहा— पीते हैं तो तबीयत खराब होती है, नहीं पीते तो नीयत खराब होती है। एक दिन पीते, एक दिन नहीं पीते, न तबियत, न नीयत खराब होती है।
राकेश शर्मा (बदनावर)- चुटीले अंदाज में बोले— स्त्री प्रकृति की अनुपम कृति है, मेरे पास सिर्फ एक प्रति है।
आशकरण अटल (मुंबई)- नेताओं पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा— बिना एक भी वादा निभाए, नेता जी वोट मांगने आए। मतदाता बोला- माई बाप! इतनी हिम्मत कहां से लाते हैं आप? हम तो एक खिलौने का वादा करके शाम को खाली हाथ घर आते हैं, तो बच्चों से आंख नहीं मिला पाते हैं।
अमन अक्षर (इंदौर)- युवाओं के चहेते गीतकार ने जज्बात कुछ यूं बयां किए— पराजय का नहीं होता है कोई शोर- मत कहना, जमाने में कहां होते हैं अब चितचोर -मत कहना। मुझे लडऩा है दुनिया से अकेले अब तुम्हारे बिन, अगर मैं हार जाऊं तो मुझे कमजोर मत कहना।
डॉ. अनु सपन (भोपाल)- प्रेम के अधूरेपन को अपनी गजल में पिरोते हुए उन्होंने पढ़ा— तेरे मेरे मिल जाने में जब तक दूरी है, तुलसी की चौपाई मीर की गजल अधूरी है। अभी अधूरा प्रेम छंद पूरा कर जाना तुम, सांझ ढले तो प्रियतम मेरे घर आ जाना तुम।
अजय अंजाम (औरैया)- ब्रज की होली के रंग बिखेरते हुए— छीन पीतांबर कम्मर से सु-विदा दई मीड़ कपोलन रोरी, नैन नचाए कही मटकाय लला फिर आईओ खेलन होरी।
सुनील व्यास (मुंबई)- माटी की सुगंध बिखेरते हुए उन्होंने आह्वान किया— अपने भारत के हर रंग में रंग जाएं, अपनी जड़ों से फिर से मिल आएं। अपने बचपन को फिर से जी आएं, और इस माटी की सोंधी महक में रंग बरसे की धुन पर थिरक जाएं।










