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Return Of The Jungle Review: देसी एनीमेशन में लौटा बचपन, शानदार विजुअल्स से जीत लेगी दिल

भारतीय एनीमेशन सिनेमा में बच्चों के लिए बेहतरीन फिल्मों की संख्या आज भी काफी सीमित है। ऐसे में 29 मई 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज हुई ‘रिटर्न ऑफ द जंगल’ एक ताज़ा और दिलचस्प कोशिश बनकर सामने आई है। रंग-बिरंगी जादुई दुनिया, देसी अंदाज और पंचतंत्र की सीख से सजी यह फिल्म बच्चों के साथ-साथ बड़ों को भी अपने बचपन की गलियों में ले जाने का दम रखती है। निर्देशक वैभव कुमारेश ने आधुनिक दौर की चुनौतियों और भारतीय लोककथाओं को जिस तरह जोड़ा है, वह फिल्म की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरता है।

 

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जब स्कूल की परेशानी का जवाब मिला कहानियों में

फिल्म की कहानी एक साधारण स्कूली बच्चे और उसके दोस्तों के इर्द-गिर्द घूमती है। ये बच्चे अपनी पढ़ाई और दोस्तों के साथ जिंदगी का आनंद लेना चाहते हैं, लेकिन स्कूल में एक दबंग छात्र उनके लिए मुसीबत बन जाता है। लगातार तंग किए जाने, मजाक उड़ाए जाने और मानसिक दबाव की वजह से उनका आत्मविश्वास कमजोर पड़ने लगता है।

समस्या का हल खोजते-खोजते बच्चे अपने सबसे भरोसेमंद साथी यानी दादाजी के पास पहुंचते हैं। यहां से कहानी एक खूबसूरत मोड़ लेती है। दादाजी उन्हें डांटने या सीख देने के बजाय जंगल की रहस्यमयी और रोचक कहानियां सुनाना शुरू करते हैं। इन कहानियों में जानवरों के जरिए दोस्ती, साहस, एकता और समझदारी का महत्व बताया जाता है।

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धीरे-धीरे बच्चे इन कथाओं से प्रेरणा लेते हैं और अपनी वास्तविक जिंदगी की चुनौतियों का सामना करना सीखते हैं। फिल्म का यही हिस्सा दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ता है।

दो दुनियाओं को जोड़ता शानदार स्क्रीनप्ले

फिल्म की सबसे खास बात इसका स्क्रीनप्ले है, जो स्कूल की वास्तविक दुनिया और कल्पनाओं से भरे जंगल के बीच लगातार आवाजाही करता रहता है। यह बदलाव कहीं भी कृत्रिम नहीं लगता।

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कहानी आगे बढ़ने के साथ दर्शक भी बच्चों के साथ उस जादुई सफर का हिस्सा बन जाते हैं, जहां हर घटना के पीछे कोई सीख छिपी होती है। फिल्म मनोरंजन के साथ-साथ बच्चों को सकारात्मक संदेश देने में भी सफल रहती है।

निर्देशन में दिखी सादगी और समझ

निर्देशक वैभव कुमारेश ने एक बार फिर साबित किया है कि मजबूत कहानी के लिए बड़े-बड़े चमत्कारों की जरूरत नहीं होती। उन्होंने बच्चों की डिजिटल दुनिया और भारतीय लोककथाओं के बीच ऐसा पुल बनाया है, जो फिल्म को अलग पहचान देता है।

करीब डेढ़ घंटे की यह फिल्म कहीं भी बोझिल महसूस नहीं होती। कहानी की गति संतुलित रहती है और बच्चों की रुचि लगातार बनी रहती है।

देसी रंगों से सजा शानदार विजुअल अनुभव

फिल्म का एनिमेशन इसकी बड़ी उपलब्धियों में से एक है। जंगल की दुनिया को बेहद खूबसूरती से रचा गया है। रंगों का इस्तेमाल, प्राकृतिक दृश्य, बहती नदियां, पेड़-पौधे और उड़ते जुगनू स्क्रीन पर एक जादुई माहौल तैयार करते हैं।

विजुअल्स भले ही पूरी तरह अंतरराष्ट्रीय स्तर के न हों, लेकिन उनमें भारतीयता की खुशबू साफ महसूस होती है। यही बात इसे बाकी एनिमेशन फिल्मों से अलग बनाती है।

संगीत बढ़ाता है कहानी का असर

फिल्म का संगीत भी इसकी मजबूत कड़ी है। लोकधुनों और भारतीय वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल कहानी को और जीवंत बना देता है।

गाने सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं रहते, बल्कि कहानी को आगे बढ़ाने में भी मदद करते हैं। बैकग्राउंड स्कोर भी हर भाव को प्रभावी ढंग से दर्शकों तक पहुंचाता है। जहां बच्चों की परेशानी दिखती है, वहां संगीत गंभीर हो जाता है और जंगल की दुनिया में प्रवेश करते ही माहौल उत्साह और रोमांच से भर उठता है।

कुछ कमियां भी करती हैं परेशान

हालांकि फिल्म कई मामलों में प्रभावित करती है, लेकिन इसमें कुछ कमजोरियां भी नजर आती हैं। कहानी का अंत काफी हद तक अनुमानित लगता है और कुछ उपकथाएं पूरी तरह विकसित नहीं हो पातीं।

खासतौर पर क्लाइमैक्स थोड़ा जल्दबाजी में निपटाया गया महसूस होता है। यदि आखिरी हिस्से को थोड़ा और विस्तार दिया जाता तो फिल्म का प्रभाव और मजबूत हो सकता था।

देखनी चाहिए या नहीं?

‘रिटर्न ऑफ द जंगल’ सिर्फ एक एनीमेशन फिल्म नहीं, बल्कि दादा-दादी की कहानियों और भारतीय संस्कृति से जुड़ा एक भावनात्मक अनुभव है। यह फिल्म बच्चों को मनोरंजन के साथ जीवन की छोटी लेकिन जरूरी सीख भी देती है।

अगर आप परिवार के साथ ऐसी फिल्म देखना चाहते हैं जो बच्चों को स्क्रीन से जोड़ने के साथ कुछ सकारात्मक संदेश भी दे, तो यह फिल्म निराश नहीं करेगी। हालांकि जो दर्शक बड़े ट्विस्ट, तेज रफ्तार रोमांच या अत्याधुनिक विजुअल इफेक्ट्स की उम्मीद लेकर जाएंगे, उन्हें फिल्म थोड़ी साधारण लग सकती है।

रेटिंग: 3/5 स्टार

दिल को छू लेने वाली कहानी, खूबसूरत विजुअल्स और भारतीय लोककथाओं की मिठास के लिए यह फिल्म एक बार जरूर देखी जा सकती है।

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