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पापा ‘आई लव यू’ क्यों नहीं कहते? जानिए वजह

लाइफस्टाइल व साइकोलॉजी डेस्क। “मम्मी तो दिन भर में कई बार अपना लाड़ और दुलार जता देती हैं, लेकिन पापा हमेशा इतने गंभीर और शांत क्यों रहते हैं?” यह एक ऐसा शाश्वत सवाल है, जो दुनिया के हर कोने में लगभग हर बच्चे के जेहन में कभी न कभी जरूर कौंधता है। अनजाने में कई परिवारों में पिता की छवि सिर्फ एक सख्त अनुशासनप्रिय व्यक्ति, डांटने वाले अभिभावक या घर के एक गंभीर सदस्य के रूप में सिमट कर रह जाती है। लेकिन आधुनिक मनोविज्ञान (Psychology) इस विषय पर एक बिल्कुल अलग और गहरा दृष्टिकोण रखता है। साइकोलॉजी कहती है कि पिताओं का यह मौन या कम बोलना किसी भी तरह की बेरुखी या भावनाहीनता का प्रतीक नहीं है; असल में उनका प्यार शब्दों के जाल में नहीं बंधता, बल्कि उनके मौन प्रयासों में झलकता है।

 

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लव लैंग्वेज का अंतर: शब्दों के बजाय ‘एक्शन’ पर भरोसा

मनोविज्ञान के प्रसिद्ध सिद्धांतों के अनुसार, हर इंसान के पास प्रेम व्यक्त करने की एक अनूठी ‘लव लैंग्वेज’ (Love Language) होती है।

  • मां का तरीका: माताएं आमतौर पर मौखिक रूप से (बोलकर) या शारीरिक स्पर्श (गले लगाकर, चूमकर) के जरिए अपनी ममता और प्यार को तुरंत जाहिर कर देती हैं।

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  • पिता का तरीका: इसके विपरीत, अधिकांश पिता ‘एक्ट ऑफ सर्विस’ (Act of Service) यानी कर्म और जिम्मेदारियों को अपनी लव लैंग्वेज बनाते हैं। आपके उज्ज्वल भविष्य के लिए उनका देर रात तक दफ्तर में पसीना बहाना, आपकी पढ़ाई लिखाई की फीस का समय पर बंदोबस्त करना, या आपकी हर छोटी-बड़ी ख्वाहिश को पूरा करने के लिए अपनी जरूरतों का त्याग करना—यही दरअसल उनका ‘आई लव यू’ कहने का मूक अंदाज होता है। उनका पूरा ध्यान इस बात पर केंद्रित रहता है कि उनका परिवार बाहरी दुनिया से पूरी तरह सुरक्षित और सुखी रहे।

सामाजिक ताना-बाना और व्यवहार का दोहराव

हमारे पारंपरिक समाज में पिताओं को हमेशा ‘परिवार की ढाल’ या एक बेहद मजबूत और अडिग इंसान के रूप में ढाला जाता है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, पुरुष बचपन से ही अपने पिताओं को इसी गंभीर और मजबूत रूप में देखते हुए बड़े होते हैं। नतीजतन, वे अनजाने में उसी व्यवहारिक पैटर्न (Behavioral Pattern) को अपने जीवन में भी दोहराने लगते हैं। उनके लिए जिम्मेदारियों का बोझ उठाना, घर में एक स्वस्थ अनुशासन बनाए रखना और बच्चों को जीवन के कड़े संघर्षों के लिए तैयार करना ही एक ‘आदर्श पिता’ की मुख्य परिभाषा बन जाती है।

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अटैचमेंट थ्योरी: पिता का मौन सुरक्षा कवच

मशहूर ब्रिटिश मनोवैज्ञानिक जॉन बॉल्बी की ‘अटैचमेंट थ्योरी’ (Attachment Theory) इस व्यवहार को बेहद खूबसूरती से समझाती है। इस सिद्धांत के मुताबिक, माता-पिता का प्राथमिक और सबसे महत्वपूर्ण दायित्व बच्चों को एक ऐसा ‘सेफ हेवन’ (सुरक्षित आश्रय) प्रदान करना है, जहां वे बिना किसी भय के फल-फूल सकें।

एक पिता इस सुरक्षात्मक जिम्मेदारी को अपने जीवन का सबसे बड़ा मिशन मान लेता है। वे खुद पुराने जूतों या कपड़ों में दिन गुजार लेंगे, लेकिन बच्चों की बुनियादी जरूरतों और उनकी खुशियों में कभी कमी नहीं आने देंगे। मनोविज्ञान कहता है कि जब एक पिता अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं को मारकर बच्चों के भविष्य को प्राथमिकता देता है, तो वह बिना कुछ बोले एक ऐसा अभेद्य सुरक्षा कवच तैयार कर रहा होता है, जो बच्चों को जीवन की हर धूप-छांव में खड़े रहने का हौसला देता है।

‘जेनेरेटिविटी’ और अगली पीढ़ी को आत्मनिर्भर बनाने की चाह

प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक एरिक एरिकसन ने मानव विकास के चरणों को समझाते हुए एक विशेष अवस्था का जिक्र किया है, जिसे उन्होंने ‘जेनेरेटिविटी’ (Generativity) का नाम दिया है। इस मनोवैज्ञानिक अवस्था में व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं से ऊपर उठकर अगली पीढ़ी के भविष्य और समाज को संवारने में अपनी पूरी ऊर्जा लगा देता है।

एक पिता के लिए उनके बच्चों की हर छोटी कामयाबी उनकी खुद की जिंदगी की सबसे बड़ी जीत होती है। जब वे आपको:

  • पैसों का सही प्रबंधन और बचत करना सिखाते हैं,

  • कठिन समय में व्यावहारिक और व्यावहारिक फैसले लेना बताते हैं,

  • या आपके करियर और जीवन के लक्ष्यों के प्रति कड़ा मार्गदर्शन करते हैं,

तो असल में वह उनका आपके प्रति सबसे गहरा और सच्चा प्रेम ही होता है। वे आपको सिर्फ आज के लिए लाड़-प्यार देकर कमजोर नहीं बनाना चाहते, बल्कि वे आपको आने वाले कल के लिए मानसिक और व्यावहारिक रूप से आत्मनिर्भर (Independent) देखना चाहते हैं।

भावनाओं को न दर्शा पाना (Emotional Restraint) बेरुखी नहीं है

अक्सर संवाद की कमी या पिता की खामोशी को बच्चे ‘कठोरता’ या ‘दूरी’ समझने की भूल कर बैठते हैं, जिससे कभी-कभी रिश्तों में एक अदृश्य दीवार खड़ी हो जाती है। लेकिन साइकोलॉजी इस बात को पूरी तरह साफ करती है कि भावनाओं को प्रदर्शित न कर पाने (Emotional Restraint) का अर्थ यह बिल्कुल नहीं होता कि भीतर भावनाएं मौजूद ही नहीं हैं (Emotional Absence)

एक पिता के अंतर्मन में भी अपने बच्चों के लिए उतना ही अगाध स्नेह और प्रेम का समंदर हिलोरें लेता है, जितना किसी मां के दिल में। बस, उनके पास उस समंदर को मीठे शब्दों या आंसुओं के जरिए बाहर लाने का सामाजिक अभ्यास या हुनर नहीं होता। जैसे ही हम इस मनोवैज्ञानिक और व्यावहारिक सच को सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं, पिता के उस शांत चेहरे के पीछे छिपा उनका असीम त्याग और गहरा प्यार हमें साफ-साफ दिखाई देने लगता है।

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