Advertisement

मुहर्रम का 10वां दिन क्यों है खास? जानिए कर्बला की दास्तां

इस्लामिक कैलेंडर के पहले महीने मुहर्रम की 10वीं तारीख को ‘आशूरा’ (Ashura) कहा जाता है। दुनिया भर के इतिहास में इस दिन को सबसे गमगीन, दर्दनाक और साथ ही सबसे प्रेरणादायक दिनों में से एक माना गया है। यह दिन किसी पारंपरिक त्योहार या जश्न का नहीं है, बल्कि सत्य, न्याय, धर्म और इंसानियत की रक्षा के लिए अत्याचारी शासक के सामने अपना सब कुछ न्योछावर कर देने वाले अमर शहीदों की याद का दिन है।

 

Advertisement

हजरत इमाम हुसैन (RA) और उनके 72 वफादार साथियों की शहादत की दास्तां आज सदियों बाद भी हर जाति, धर्म और वर्ग के इंसान की आंखें नम कर देती है। आइए जानते हैं कि आशूरा का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व क्या है और कर्बला के मैदान में वास्तव में क्या हुआ था।

Advertisement

आशूरा का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व

इस्लामिक इतिहास के अनुसार, मुहर्रम का 10वां दिन (आशूरा) बेहद खास और पवित्र माना गया है। इराक में घटी कर्बला की घटना से सदियों पहले भी इस दिन का अपना एक बड़ा धार्मिक महत्व था।

  • फिरौन के जुल्म से मुक्ति: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी पवित्र दिन अल्लाह ने हजरत मूसा (AS) और उनके अनुयायियों को मिस्र के क्रूर तानाशाह फिरौन के भीषण जुल्मों से निजात दिलाई थी। इस ऐतिहासिक जीत के उपलक्ष्य में यहूदी और बाद में मुस्लिम समाज के लोग कृतज्ञता प्रकट करने के लिए रोजा (Fasting) रखते आए हैं।
  • कर्बला का मोड़: हालांकि, सन 61 हिजरी (680 ईसवी) में इसी तारीख को इराक के कर्बला के मैदान में एक ऐसी दर्दनाक और खूनी घटना घटी, जिसने इस दिन को हमेशा-हमेशा के लिए गहरे शोक, मातम और आंसुओं में डुबो दिया।

Advertisement

हजरत इमाम हुसैन की शहादत की पूरी दास्तां

कर्बला का यह महासंग्राम किसी सत्ता, सिंहासन या जमीन के टुकड़े को हासिल करने के लिए नहीं था। यह शुद्ध रूप से हक (सत्य) और बातिल (अन्याय/अधर्म) के बीच का एक वैचारिक और नैतिक संघर्ष था।

1. यजीद का क्रूर शासन और इमाम हुसैन का इनकार

उस दौर में दमिश्क के क्रूर, अनैतिक और विलासी शासक यजीद ने खुद को जबरन संपूर्ण इस्लामी साम्राज्य का खलीफा घोषित कर दिया था। वह इस्लाम के बुनियादी लोकतांत्रिक और मानवीय सिद्धांतों को बदलकर अपनी मर्जी का दमनकारी शासन स्थापित करना चाहता था। अपनी सत्ता को वैध और सर्वमान्य साबित करने के लिए उसे पैगंबर मोहम्मद साहब के प्यारे नवासे (नाती) हजरत इमाम हुसैन (RA) के समर्थन (बैअत) की सख्त जरूरत थी। लेकिन इमाम हुसैन ने दोटूक शब्दों में यजीद के आगे सिर झुकाने से इनकार कर दिया और कहा कि एक अत्याचारी और भ्रष्ट व्यक्ति कभी दीन और इंसानियत का रहनुमा नहीं हो सकता।

2. कर्बला का घेराव और पानी पर कड़ा पहरा

जब इमाम हुसैन अपने परिवार, महिलाओं, छोटे बच्चों और वफादार साथियों के साथ मक्का से कूफा की ओर बढ़ रहे थे, तब यजीद की हजारों सैनिकों की विशाल और हथियारबंद फौज ने उन्हें कर्बला के तपते रेगिस्तान में चारों तरफ से बंधक बना लिया। मुहर्रम की 7 तारीख से ही यजीदी सेना ने क्रूरता की हदें पार करते हुए इमाम हुसैन के खेमे (तंबू) के लिए फरात नदी का पानी पूरी तरह बंद कर दिया। तपती रेत, झुलसा देने वाली धूप और तीन दिनों की भीषण प्यास के बावजूद इमाम हुसैन और उनके कुनबे ने अत्याचारी के सामने आत्मसमर्पण नहीं किया।

3. 10 मुहर्रम: इंसानियत को झकझोर देने वाला खूनी दिन

10वें दिन (आशूरा) यजीद की फौज ने इमाम हुसैन के महज 72 जांबाज साथियों पर चौतरफा हमला बोल दिया। एक-एक करके इमाम हुसैन के भाई (हजरत अब्बास), उनके भतीजे (हजरत कासिम) और उनके 18 वर्षीय जवान बेटे (अली अकबर) जंग के मैदान में बहादुरी से लड़ते हुए शहीद हो गए। जुल्म की पराकाष्ठा तब देखने को मिली जब यजीदी फौज के क्रूर तीरंदाजों ने इमाम हुसैन की गोद में मौजूद उनके महज 6 महीने के प्यासे मासूम बेटे अली असगर के गले पर तीन भालों वाला तीर चलाकर उन्हें भी शहीद कर दिया।

4. सजदे में सर्वोच्च बलिदान

जब इमाम हुसैन पूरी तरह अकेले बचे और उनका पूरा शरीर घावों और तीरों से चूर था, तब उन्होंने ‘असर’ (तीसरे प्रहर) की नमाज अदा करने का फैसला किया। जैसे ही वे खुदा की इबादत में सजदे में गए (जमीन पर सिर झुकाया), यजीदी फौज के शिम्र (Shimr) नाम के दरिंदे ने पीछे से वार कर उनकी गर्दन पर तलवार चला दी। इमाम हुसैन ने मुस्कुराते हुए इंसानियत के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी, लेकिन तानाशाही और अधर्म के सामने घुटने नहीं टेके।

आशूरा: सुन्नी और शिया समुदायों में याद करने के तरीके

समुदाय / दृष्टिकोण याद करने का तरीका (Commemoration Mode) मुख्य उद्देश्य (Core Purpose)
शिया और सूफी समुदाय मजलिस (धार्मिक सभाएं), नौहाख्वानी और शांतिपूर्ण शोक जुलूस (मातम) निकालना। कर्बला के शहीदों के दर्द को महसूस करना और उनके सब्र को श्रद्धांजलि देना।
सुन्नी समुदाय मुहर्रम की 9वीं-10वीं या 10वीं-11वीं तारीख को विशेष धार्मिक उपवास (रोजा) रखना। हजरत मूसा (AS) की विजय पर अल्लाह के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना और नमाज पढ़ना।
सामाजिक स्तर (सर्वधर्म) मुफ्त पानी, शरबत की ‘सबील’ (प्याऊ) लगाना और गरीबों में भोजन व लंगर बांटना। कर्बला के प्यासे शहीदों की याद में प्यासों को पानी पिलाना और इंसानियत की सेवा करना।

दुनिया को क्या संदेश देती है कर्बला की यह गाथा?

कर्बला की यह ऐतिहासिक दास्तां सदियों बाद आज भी पूरी दुनिया को यह शाश्वत संदेश देती है कि आपके सामने खड़ी विरोधी ताकतें या संख्या बल चाहे कितना भी विशाल क्यों न हो, अगर आप सच्चाई और न्याय के मार्ग पर हैं, तो आपको अपने सिद्धांतों पर हमेशा अडिग रहना चाहिए। यजीद अपनी विशाल सेना के बावजूद इतिहास के पन्नों में हार गया और हमेशा के लिए तिरस्कृत हो गया, जबकि इमाम हुसैन अपना सब कुछ खोकर भी वैचारिक रूप से जीत गए और कयामत तक के लिए अमर हो गए। यही कारण है कि मुहर्रम का 10वां दिन आज भी इतिहास का सबसे गमगीन लेकिन सबसे ज्यादा हौसला देने वाला दिन माना जाता है।

Related Articles

📢 पूरी खबर पढ़ने के लिए

बेहतर अनुभव के लिए ऐप का उपयोग करें

ऐप में पढ़ें
ऐप खोलें
ब्राउज़र में जारी रखें