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चातुर्मास की शुरुआत कल से: 119 दिनों तक क्षीर सागर छोड़ इस स्थान पर विराजेंगे भगवान विष्णु

हिंदू धर्म में चातुर्मास का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना जाता है। मान्यता है कि इस अवधि में भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं, जिसके कारण मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाता है। इस वर्ष चातुर्मास की शुरुआत कल से हो रही है और यह अवधि 119 दिनों तक चलेगी।

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चातुर्मास क्या है?

‘चातुर्मास’ का अर्थ है चार महीनों का समय। इसकी शुरुआत आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी एकादशी) से होती है और समापन कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी या प्रबोधिनी एकादशी) पर होता है। इन चार महीनों में साधु-संत एक स्थान पर रहकर तप, जप और साधना करते हैं, वहीं श्रद्धालु भी व्रत, पूजा और दान-पुण्य जैसे धार्मिक कार्यों में विशेष रुचि लेते हैं।

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119 दिनों तक कहां विराजते हैं भगवान विष्णु?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु क्षीर सागर में शेषनाग की शैया पर योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसी अवधि में सृष्टि के संचालन की जिम्मेदारी भगवान शिव को सौंपी जाती है।

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हालांकि, कई धार्मिक परंपराओं में यह भी मान्यता है कि चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु अपने भक्तों के हृदय और तीर्थस्थलों में विशेष रूप से विराजमान रहते हैं तथा उनकी कृपा भक्तों पर बनी रहती है। इसलिए इस अवधि में भगवान विष्णु की पूजा, व्रत और भक्ति का विशेष महत्व बताया गया है।

चातुर्मास में क्यों नहीं होते मांगलिक कार्य?

मान्यता है कि भगवान विष्णु के योगनिद्रा में रहने के कारण विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, नए भवन का शुभारंभ और अन्य मांगलिक कार्य इस दौरान नहीं किए जाते। देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु के जागने के बाद दोबारा शुभ कार्यों का आरंभ होता है।

चातुर्मास में करें ये शुभ कार्य

  • भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की नियमित पूजा करें।
  • ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करें।
  • एकादशी व्रत का पालन करें।
  • जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और धन का दान करें।
  • धार्मिक ग्रंथों का पाठ और सत्संग में भाग लें।
  • सात्विक भोजन करें और संयमित जीवनशैली अपनाएं।

चातुर्मास का धार्मिक महत्व

शास्त्रों के अनुसार, चातुर्मास आत्मचिंतन, साधना, संयम और आध्यात्मिक उन्नति का समय माना जाता है। इस दौरान किए गए जप, तप, दान और भगवान विष्णु की आराधना का विशेष फल प्राप्त होता है। यही कारण है कि सनातन परंपरा में इन चार महीनों को अत्यंत पवित्र माना गया है।

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