जेन-जी बच्चों को समझें और सही दिशा दें

माता-पिता उन्हें समझाने की बजाय उनका रोल मॉडल बनें, जो वो चाहते हैं पहले खुद वैसा बने
आज की जेनरेशन झेड़ (लगभग 1997 से 2012 के बीच जन्मे बच्चे) पूरी तरह डिजिटल दुनिया में बड़ी हुई है। मोबाइल, सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेम और इंटरनेट इनके जीवन का अहम हिस्सा हैं। कई बार माता-पिता शिकायत करते हैं कि बच्चे चिड़चिड़े हो गए हैं, बात नहीं सुनते, हर समय मोबाइल में लगे रहते हैं और परिवार से दूरी बना लेते हैं। ऐसे में डांट-फटकार या सख्ती से समस्या और बढ़ सकती है। जरूरत है उन्हें समझने और सही मार्गदर्शन देने की।
मोबाइल नहीं संवाद बढ़ाएं
अक्सर माता-पिता बच्चों का मोबाइल छीनकर समस्या का समाधान ढूंढते हैं, लेकिन इससे बच्चों में गुस्सा और विद्रोह बढ़ सकता है। इसके बजाय उनके साथ रोज कुछ समय बैठकर बात करें। उनकी पसंद, दोस्त, पढ़ाई और परेशानियों को समझने की कोशिश करें।
अगर माता-पिता भी हर समय मोबाइल में व्यस्त रहेंगे तो बच्चे उनसे अलग व्यवहार क्यों करेंगे? घर में ‘नो मोबाइल टाइम’ तय करें, जहां पूरा परिवार एक साथ समय बिताए।
फायदे-नुकसान बताएं
बच्चों को केवल रोकने के बजाय यह बताएं कि सोशल मीडिया का सही उपयोग कैसे किया जाए। उन्हें फेक न्यूज, साइबर बुलिंग और ऑनलाइन धोखाधड़ी के बारे में जागरूक करें।
बच्चों की भावनाओं को महत्व दें
कई बार किशोरावस्था में बच्चे तनाव, अकेलेपन या आत्मविश्वास की कमी से जूझते हैं। उनकी बातों को हल्के में न लें। यदि वे गुस्सा या उदास दिखें तो कारण जानने का प्रयास करें।
अन्य गतिविधियों को बढ़ावा दें
खेल, योग, संगीत, किताबें, पेंटिंग या अन्य रचनात्मक गतिविधियां बच्चों को मोबाइल की लत से दूर रखने में मदद करती हैं। सप्ताह में एक दिन परिवार के साथ घूमने या किसी गतिविधि में भाग लेने की आदत डालें।
नियम बनाएं, लेकिन दोस्ताना तरीके से
मोबाइल उपयोग के लिए समय सीमा तय करें, लेकिन नियम बनाने में बच्चों की राय भी शामिल करें। जब बच्चे निर्णय का हिस्सा बनते हैं तो वे नियमों का पालन बेहतर तरीके से करते हैं।
अन्य बच्चें से तुलना करने से बचें
देखो, शर्मा जी का बेटा कितना अच्छा है जैसी बातें बच्चों के आत्मविश्वास को चोट पहुंचाती हैं। हर बच्चे की अपनी क्षमता और रुचि होती है, उसे पहचानें और प्रोत्साहित करें। जेन जी बच्चों को सुधारने का सबसे अच्छा तरीका उन्हें समझना है, न कि केवल नियंत्रित करना। प्यार, संवाद, विश्वास और सही मार्गदर्शन से माता-पिता अपने बच्चों को डिजिटल दुनिया के बीच भी जिम्मेदार, संवेदनशील और सफल बना सकते हैं। जब परिवार साथ बैठकर समय बिताता है, तो मोबाइल की स्क्रीन से ज्यादा मजबूत रिश्तों की डोर बनती है।









