नागपंचमी पर दिखी मिनी सिंहस्थ की झलक पर क्राउड मैनेजमेंट के लिए और तैयारी जरूरी

महाकाल मंदिर, नागचंद्रेश्वर और कालभैरव पर रिकार्डतोड़ दर्शनार्थी पहुंचे, हर जगह अव्यवस्था और विवाद
अक्षरविश्व न्यूज उज्जैन। नागपंचमी पर सोमवार को उज्जैन में अभूतपूर्व दर्शनार्थी पहुंचे। सावन सोमवार, नागपंचमी और श्री महाकालेश्वर सवारी के संयोग के बीच उमड़ी भीड़ की वजह से मिनी सिंहस्थ का नजारा रहा। हालांकि देशभर से आए श्रद्धालुओं केा प्रमुख मंदिरों में दर्शन के लिए खासा परेशान होना पड़ा।कहीं विवाद हुए तो कहीं अव्यवस्था ने परेशानी पैदा की। सोशल मीडिया पर लोग आपबीती बता रहे है।
प्रशासनिक आंकड़ों के अनुसार साल में एक बार 24 घंटे के लिए खुलने वाले श्री नागचंद्रेश्वर मंदिर के 12 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने दर्शन किए। महाकाल में यह आंकड़ा 4 लाख 80 हजार का रहा। कालभैरव में करीब 1 लाख 50 हजार श्रद्धालु पहुंचे। तीसरी सवारी में 7.80 लाख लोगों ने बाबा के तीन स्वरूपों को निहारा। सिंहस्थ से पहले एक ही दिन में इतनी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं का आना ऐतिहासिक क्षण रहा। यह अभूतपूर्व भीड़ सिंहस्थ तैयारियों के लिए प्रशासन की कसौटी भी थी। हालांकि व्यवस्था से यह लगा कि क्राउड मैनेजमेंट के लिए तैयारी को और पुख्ता करने की जरूरत है।
गेट बंद, ताला तोड़कर निकले दर्शनार्थी
हरिफाटक ब्रिज उतरते ही श्री महाकाल महालोक की ओर बना गेट सोमवार शाम करीब 7 बजे बंद कर दिया। लोग बाहर नहीं निकल पाए तो गेट फांदकर निकलना शुरू कर दिया। इसी बीच कुछ दर्शनार्थियों ने गेट पर लगा ताला तोड़ दिया और बाहर आ गए।
भीड़ के बीच अव्यवस्थाओं की झलक
हरिफाटक रोड सहित आसपास की प्रमुख सड़कें दिन भर जाम रहीं।
महाकाल मंदिर के नि:शुल्क अन्न क्षेत्र तक पहुंचने में श्रद्धालुओं को पसीने छूट गए
दर्शनार्थियों को इतना पैदल घुमाया कि वे दोबारा आने से तौबा कर रहे हैं।
मंगलनाथ-सांदीपनि आश्रम रोड पर यातायात बुरी तरह फंसा रहा।
पांच घंटे लाइन में एक झलक नहीं दिखी
सोशल मीडिया पर वंडर विथ अक्षय पर एक युवक ने लिखा कि वह परिवार के साथ पांच घंटे काल भैरव मंदिर की कतार में खड़ा रहा। एक सेकंड भी दर्शन नहीं करने दिया। ज्यादा देर तक खड़े रहने से पैरों में सूजन तक आ गई। अंदर से बाहर आने की जगह नहीं थी। बैरिकेड्स में कैद बच्चे रोते रहे। उन्होंने सोशल मीडिया पर संदेश छोड़ा उज्जैन मत आओ यहां दर्शन के नाम पर व्यापार हो रहा है।
इनका कहना
सोमवार को भीड़ बहुत थी। लोगों को दर्शन के तुरंत बाद मंदिर से बाहर करना जरूरी था, नहीं तो पीछे वालों को मौका नहीं मिलता। सुरक्षा गार्ड इसी में लगे थे, अधिकतर दर्शनार्थियों ने सहयोग भी किया। अभी शीघ्र दर्शन व्यवस्था बंद है।
– संध्या मार्कण्डेय, प्रशासक काल भैरव मंदिर
खरी-खरी : गलतियां सबक के लिए होती हैं, छिपाने के लिए नहीं
ना गपंचमी, सावन सोमवार और महाकाल सवारी के त्रिसंयोग में प्रशासनिक-पुलिस अफसरों ने व्यवस्था को बेहतर बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 36 घंटे तक लगातार डयूटी दी। खूब मेहनत की। लेकिन श्रद्धालुओं के घायल होने की घटना ने कई सवाल छोड़ दिए हैं। इस अफरातफरी की घटना ने सिंहस्थ से पहले हमारी व्यवस्था को आईना दिखा दिया है। असली सवाल यह नहीं है कि आईना क्या दिखा रहा है बल्कि यह है कि क्या हम उस आईने में अपना चेहरा देखने को तैयार हैं?
हादसे होते हैं, गलतियां होती हैं, बड़ी से बड़ी व्यवस्था में चूक की गुंजाइश रहती है लेकिन उसे स्वीकार करने के बजाय नकारना ही असली खतरा है, क्योंकि सुधार का रास्ता स्वीकृति से होकर गुजरता है। स्थिति से मुकरने से खतरा घटता नहीं, बल्कि और बड़ा होकर सामने आता है। हरसिद्धि बैरिकेड के पास हुई घटना ने सिंहस्थ व्यवस्था के लिए कम से कम चार गंभीर चेतावनियां छोड़ी हैं।
1 प्रबुद्धजनों की अनदेखी कुछ समय पहले तक बड़े आयोजन से पहले प्रबुद्धजनों की राय ली जाती थी। श्री महाकालेश्वर मंदिर प्रबंध समिति बाकायदा इसके लिए बैठक करती थी। इसमें आए सुझावों पर अमल भी होता था। अब ऐसा होना कम हो गया है। समिति के पदेन सदस्य महापौर मुकेश टटवाल खुद कहते हैं कि अब बैठक तो होती है, मगर प्रबंध समिति के नाम से नहीं।
2 भीड़ के आंकलन में चूक: सोमवार को आया त्रिसंयोग सामान्य दिन नहीं था, बल्कि यह लंबा वीकेंड था। लोग मौज-मस्ती और पर्यटन के मूड में निकले और स्वाभाविक तौर पर उन्होंने धार्मिक पर्यटन को प्राथमिकता दी। नतीजा उज्जैन इस भीड़ के लिए छोटा पड़ गया।
3 वीआईपी व्यवस्था का दबाव: इस त्रिसंयोग में आम श्रद्धालु ही व्यवस्था का सबसे बड़ा हिस्सा थे, ऐसे में सबसे पहले उनकी सुरक्षा- सुविधा के इंतजाम को तरजीह दी जानी थी। मगर हुआ यह कि प्राथमिकता वीआईपी बन गए। वीआईपी के सुरक्षा प्रोटोकॉल को नहीं टाला जा सकता, पर सवाल यह है कि क्या आम आदमी की सुरक्षा जरूरी नहीं है?
4 बैरिकेडिंग की खामी बड़े आयोजन में भीड़ प्रबंधन की पहली दीवार बैरिकेडिंग है। यह सहज-सुगम होनी चाहिए। दबाव में अगर यह कमजोर पड़ जाए तो मजबूत व्यवस्था भी भरभरा जाती है। इस बार बैरिकेडिंग बहुत टाइट थी। अंदर जाने के बाद निकलना बहुत मुश्किल था। भीड़ में लोगों को दिक्कत हुई तो अफरातफरी मचनी ही थी।
नागपंचमी की इस घटना को सिंहस्थ की तैयारियों से अलग करके नहीं देखा जा सकता, क्योंकि सिंहस्थ कोई प्रयोगशाला नहीं है, जहां गलती सुधारने का दूसरा मौका मिलेगा। वहां भीड़ इतनी विशाल होगी कि एक छोटी सी चूक भी बड़े हादसे में बदल सकती है। ऐसे में जरूरत छवि बचाने से ज्यादा व्यवस्था को बनाने- बचाने की है। आंकड़ों पर बहस करने से सवाल खत्म नहीं होते, और जिम्मेदारी से बचने से जवाबदेही।
सिंहस्थ के लिए नागपंचमी पर हुए हादसे को समीक्षा जरूरी है। उम्मीद है जिम्मेदार लोग चूक-गलती को स्वीकारने का नैतिक साहस दिखाएंगे और यह स्वीकार करेंगे कि गलतियां सीखने के लिए होती हैं, छिपाने के लिए नहीं। अगर वे ऐसा करते हैं तो सिंहस्थ तैयारियों के लिए यह बेहतर सबक होगा।
विनोदसिंह सोमवंशी









