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धर्म रिलीजन नहीं, वह तो आचरण में होता है

युवा धर्म संसद में बोले आरएसएस सुप्रीमो डॉ मोहन भागवत

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अक्षरविश्व न्यूज उज्जैन। आरएसएस सप्रीमो डॉ मोहन भागवत ने कहा कि रिलीजन धर्म नहीं हो सकता। धर्म का मतलब है धारण करना है। वह अनुशासन जो हम धारण करते हैं, वह ही धर्म है।

डॉ. भागवत शुक्रवार को गीता भवन में युवा धर्म संसद के शुभारंभ सत्र को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि धर्म को रिलीजन कहना धर्म नहीं है, क्योंकि रिलीजन धर्म नहीं है। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के फिलासपर गुरु रानाड़े कहते थे कि रिलीजन वह जो, रिलीजियस को अनुशासन से बांधे। स्वामी विवेकानंद जी ने भी अपने भाषणों में धर्म को रिलीजन ही कहा है। धर्म रिलीजन से ऊपर है। जब रिलिजियस धर्म के अनुसार चलते हैं तो वह मनुष्य को मुक्ति दिलाते हैं। जब रिलीजियस धर्म को छोड़कर चलते हैं तब वे सांप्रदयिक कलर देते हैं। धर्म के नाम पर अत्याचार होते हैं। यह जो गांठ सदियों से बैठी है, उसे निकाल देना चाहिए।

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रिलीजन , रिलीजियो शब्द से आया है। इसे कहते है बांधना। धर्म मुक्त करता है। धर्म का मतलब है धारण करना। हमारे अंदर २०० साल से गांठें पड़ी हैं, यह विस्मक लहर है। यह हमारे अंदर कुछ जाने नहीं देना चाहती है।

धारणा का अर्थ है एक अवस्था में कायम रहना। अगर हम कायम नहीं रहेंगे तो वापस पहली अवस्था में आ जाएंगे। धारणा करने वाला जोड़ता है, वह बिखरने नहीं देता। वह टूटने नहीं देता। वह हमेशा उन्नत करता है।

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धर्म धारणा करने वाला है। जिसका भी जन्म हुआ है। उसे धारणा धरनी है। विश्व नियम से चलता है। यह नियमों पर टिका होगा तो टूटेगा नहीं। जैसे आज लोग पर्यावरण खराब होने से डर रहे हैं। सहमे हुए हैं। चिंतित हैंद्ध

पृथ्वी से मनुष्य जीवन के सभी उपयोगी पदार्थ मिलते हैं। संन्यास आश्रम के लिए कोई धर्म नहीं होता। धर्म सबका जीवन और परिवार चलाने के लिए आवश्यक है। सृष्टि चलाने के लिए आवश्यक है। वह ऐसा नहीं है, कि उसे लैबोरेटरी में टेस्ट कर सकें, क्योंकि धर्म आचरण में रहता है।

बहना पानी का धर्म है, जलाना आग का धर्म है। ऐसा भी कहा है धर्म से सब मिलता है। व्याख्या में भी यह आता है। जिससे भौतिक और आध्यत्मिक जगत की प्रगति है। धर्म जीवन से दूर जाने के लिए नहीं है। सबकुछ छोडऩे के लिए नहीं है।

धर्म मनुष्य के स्वभाव के मुताबिक कर्तव्य तय करता है। मन में कोई भ्रम नहीं रखता। ऐसा अनुशासन जो सबको आध्यात्मिक और भौतिक रूप से सक्षम बनाए, वही धर्म है।

युधिष्ठिर ने कभी अपना धर्म नहीं छोड़ा। वह स्वर्ग तक पहुंचे तो भाई-पत्नी छूट गए थे। स्वर्ग के दरवाजे पर जब इंद्र रथ लेकरआए तब उन्होंने कहा कि कुत्ते को पहले बैठाए। इंद्र ने कहा कि कुत्ता स्वर्ग में नहीं जा सकता , तब युधिष्ठिर ने कहा जब कुत्ते ने मेरा साथ नहीं छोड़ा तो मैं क्यों स्वर्ग जाऊ। स्वर्ग में उन्हें कौरव मिले तो पूछा कि यह यहां क्यों? मेरे भाई क्यों नहीं? तब बताया गया कि आपके भाई नर्क में हैं। युधिष्ठर ने कहा मैं भी अपने भाइयों के पास जाऊंगा। वह नर्क चले गए।

कुछ दिन बाद इंद्र फिर उन्हें लेने गए और बोले, आपका यहां का समय पूरा हो गया। लेकिन उन्होंने कहा कि वह भाइयों के बिना नहीं जाएंगे। नर्कवासियों ने कहा कि आपके आने से शीतलता आ गई है। तो युधिष्ठिर वहीं रुक गए। यानी उन्होंने अपना धर्म कहीं नहीं छोड़ा। धर्म आचरण में हैं, वह पुस्तकों में नहीं है। धर्म की बात नहीं करनी होती, उसे हमें अपने आचरण में उतारना होता है। धर्म एक दूसरे के विरोधी भी हो सकते हैं लेकिन तब मनुष्यों को समन्वय करना होता है। इससे पहले सेवाज्ञ संस्थानम के संरक्षक आचार्य मिथिेलेश नंदिनी शरण ने स्वागत भाषण दिया। मंच पर केंद्रीय संस्कत विश्व विद्यालय के कुलगुरु श्रीनिवास वरखेड़ी, सेवाज्ञ संस्थानम के अध्यक्ष आशीष कुमार आशु उपस्थित थे।

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