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पितृपक्ष: इस बार चतुर्थी-पंचमी, पंचमी-षष्ठी पर मिलाप श्राद्ध

अलग-अलग पंचांग में दो दिन तिथि अलग-अलग होने से बनेगी ऐसी स्थिति

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अक्षरविश्व न्यूज उज्जैन। पितृपक्ष में इस बार दो ऐसे मौके आ रहे हैं जब मिलाप श्राद्ध होगा। बुधवार को चतुर्थी और पंचमी पर ऐसी स्थिति बनेगी। 1 अक्टूबर को भी पंचमी-षष्ठी के श्राद्ध एक साथ होंगे। इस संबंध में पंडितों के अलग-अलग मत है।

पं. श्याम पंचोली के मुताबिक शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध कर्म हमेशा अपराह्न काल में रहने वाली तिथि में किया जाता है, न कि सूर्योदय कालीन तिथि में। पंचांग गणना के अनुसार 30 सितंबर (बुधवार) को दोनों श्राद्ध एक ही दिन इसलिए पड़ रहे हैं क्योंकि चतुर्थी तिथि 29 सितंबर की शाम से शुरू होकर 30 सितंबर की दोपहर 2.55 बजे तक रहेगी। श्राद्ध का मुख्य समय (कुतुप और रोहिण मुहूर्त—दोपहर 11.47 से 1.22) चतुर्थी तिथि के भीतर रहेगा। इसलिए चतुर्थी का श्राद्ध 30 सितंबर दोपहर में होगा।

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पंचमी तिथि 30 सितंबर की दोपहर 2.55 बजे से शुरू होगी। यह 1 अक्टूबर को दोपहर 12.35 बजे समाप्त होगी। शास्त्रों का नियम है कि यदि कोई तिथि दोपहर (अपराह्न काल) में शुरू होती है और अगले दिन दोपहर से पहले ही खत्म हो जाती है, तो उसका श्राद्ध उसी दिन किया जाता है, जब वह शुरू (दोपहर में) हुई थी। चूंकि 1 अक्टूबर को दोपहर 12.35 पर पंचमी खत्म हो रही है, इसलिए 1 अक्टूबर को मुख्य अपराह्न काल (दोपहर 1.20 के बाद) में पंचमी नहीं रहेगी। कुछ पंचांगों में स्थानीय देशांतर और सूर्योदय के समय में अंतर के कारण तिथियों के चक्र में 1 दिन का हेरफेर दिखता है।

मौद्रिक पंचांग के अनुसार भारत के अधिकांश हिस्सों (जैसे दिल्ली, उज्जैन, मुंबई) में 2 अक्टूबर को सप्तमी और 3 अक्टूबर को अष्टमी का श्राद्ध अलग-अलग दिन हैं, लेकिन कुछ अन्य क्षेत्रीय पंचांगों (विशेषकर उत्तर-पूर्वी या कुछ स्थानीय पंचांगों) में अष्टमी तिथि 2 अक्टूबर की दोपहर को ही बहुत जल्दी शुरू हो रही हो, तो वहां के ज्योतिषी सप्तमी-अष्टमी का श्राद्ध एक ही दिन (2 अक्टूबर) करने की सलाह देते हैं। पंचांग की चंद्र तिथियां अंग्रेजी कैलेंडर की तरह रात के 12 बजे नहीं बदलतीं, बल्कि ब्रह्मांड में चंद्रमा की गति अनुसार दिन-रात में किसी भी समय शुरू और समाप्त हो सकती हैं।

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अकाल मृत्यु वाले जातक का चतुर्थी और अविवाहित का पंचमी पर श्राद्ध
पं. श्याम पंचोली के मुताबिक बुधवार को चतुर्थी और पंचमी का श्राद्ध एक ही दिन रहेगा। इस श्राद्ध को मिलाप श्राद्ध भी कहते हैं। चतुर्थी श्राद्ध — उन पितरों के लिए होता है, जिनकी मृत्यु कृष्ण/शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को हुई हो और जिनकी अकाल मौत हुई हो। पंचमी श्राद्ध पंचमी तिथि को दिवंगत पितरों और अविवाहित संतान के लिए किया जाता है। इसे कुंवारा पंचमी भी कहते हैं। इस श्राद्ध का पुण्य जातक को विद्या ज्ञान के तौर पर मिलता है। चतुर्थी और पंचमी एक ही दिन होने का अर्थ यह नहीं कि दोनों तिथियों का महत्व समाप्त हो जाता है। श्राद्ध का निर्णय सामान्य तारीख देखकर नहीं, बल्कि तिथि और श्राद्धकाल देखकर किया जाता है।

तिथियों को लेकर असंमजस
पंचमी-षष्ठी तिथि का श्राद्ध एक दिन कर सकते हैं
इधर तिथियों के घालमेल के कारण पंचमी और षष्ठी का श्राद्ध भी एक साथ करने की बात की जा रही है। पं. राजेश त्रिवेदी ने बताया कि पंचमी और षष्ठी तिथि एक साथ आ रही है। पंचमी का श्राद्ध १ अक्टूबर को होगा। इस दिन ही दोपहर से षष्ठी तिथि रहेगी।ऐसे में पंचमी-षष्ठी का श्राद्ध एक साथ होगा। ऐसी ही स्थिति षष्ठी और सप्तमी को लेकर भी बन रही है। २ अक्टूबर को ऐसा रहेगा। इस दिन षष्ठी और सप्तमी का श्राद्ध एक दिन हो सकेगा। हालांकि अगली तिथि ३ अक्टूबर से स्थिति साफ हो जाएगी और तब अष्टमी का श्राद्ध रहेगा।

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