इलाहाबाद हाईकोर्ट हलाला केस में सख्त: पर्सनल लॉ की आड़ में अपराध नहीं

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निकाह हलाला और तीन तलाक से जुड़े एक मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कहा कि अगर किसी मामले में आपराधिक अपराध के आरोप हैं, तो सिर्फ पर्सनल लॉ का हवाला देकर कार्रवाई से नहीं बचा जा सकता।

अदालत ने अमरोहा के एक मामले में 9 आरोपियों के खिलाफ दर्ज FIR रद्द करने से इनकार कर दिया। कोर्ट का कहना है कि कानून सभी नागरिकों के लिए समान है और गंभीर अपराधों की जांच जरूर होनी चाहिए।
क्या है पूरा मामला?
मामला उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले का है। पीड़िता ने आरोप लगाया कि साल 2015 में उसकी शादी कम उम्र में कराई गई थी।
शिकायत के मुताबिक, शादी के कुछ समय बाद उसके पति ने उसे तीन तलाक दे दिया। बाद में दोबारा शादी कराने के नाम पर उसे कथित तौर पर निकाह हलाला की प्रक्रिया से गुजरने के लिए मजबूर किया गया।
महिला का आरोप है कि इस दौरान उसके साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए गए। बाद में उसका दोबारा पहले पति से निकाह कराया गया।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि अगर शिकायत में यौन शोषण, जबरदस्ती या अन्य गंभीर अपराधों के आरोप हैं, तो मामले की जांच होनी चाहिए।
अदालत ने कहा,
“पर्सनल लॉ की आड़ में आपराधिक अपराधों को स्वीकार नहीं किया जा सकता।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि संविधान हर व्यक्ति को गरिमा, समानता और सुरक्षा का अधिकार देता है।
9 आरोपियों को नहीं मिली राहत
मामले में शामिल 9 लोगों ने हाईकोर्ट से FIR रद्द करने की मांग की थी। उनका तर्क था कि मामला धार्मिक प्रथाओं और पर्सनल लॉ से जुड़ा है।
हालांकि कोर्ट ने उनकी दलील नहीं मानी और सभी याचिकाएं खारिज कर दीं।
क्यों अहम है यह फैसला?
कानूनी जानकारों के मुताबिक, यह फैसला साफ संदेश देता है कि धार्मिक प्रथा या पर्सनल लॉ के नाम पर किसी भी तरह के आपराधिक कृत्य को संरक्षण नहीं मिल सकता।
अगर किसी महिला के साथ अपराध होता है, तो उसकी जांच भारतीय कानून के तहत ही होगी।







