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दादा, मैं ठीक से पहुंच गया हूं… यही अर्पित के आखिरी शब्द थे

सुबह कहा था- ‘खाना खाने जा रहा हूं’, शाम तक बेटे की तलाश में भटकता रहा परिवार

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भाई की अर्थी उठी तो उसे रोकने दौड़ पड़ी बहन, पिता ने कांपते कंधों पर उठाया इकलौते बेटे का शव

11 अक्टूबर को जन्मदिन मनाना था, उससे पहले ही घर पहुंची अर्पित की अर्थी

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अक्षरविश्व न्यूज देवास। शनिवार शाम ट्रेन से दिल्ली रवाना हुए 18 वर्षीय अर्पित जाज ने रविवार सुबह घर फोन कर दादा से कहा था- दादा, मैं ठीक से पहुंच गया हूं, खाना खाने जा रहा हूं। यह अर्पित की परिवार से हुई आखिरी सामान्य बातचीत थी। कुछ ही घंटों बाद दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में वह पीजी इमारत हादसे का शिकार हो गया, जिसमें उसकी जान चली गई। 15 घंटे के सफर के बाद मंगलवार सुबह जब एंबुलेंस से उसका शव जय बजरंग नगर स्थित घर पहुंचा तो मां बेटे का शव देखते ही बेसुध हो गईं और बहन प्रियांशी खुद को संभाल नहीं सकी। इकलौते बेटे को अंतिम विदाई देते समय पिता भूपेंद्र जाज की आंखों के सामने बेटे से जुड़ी तमाम यादें तैरती रहीं।

अर्पित करीब एक साल से दिल्ली में रहकर पढ़ाई कर रहा था। अर्पित तीसरी मंजिल के कमरा नंबर 320 में रहता था।

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पूरी रात की तलाश के बाद जन्मचिह्न से हुई पहचान
परिवार के लिए सबसे कठिन समय वह था, जब अस्पतालों से कोई स्पष्ट जानकारी नहीं मिल रही थी। अर्पित के दोस्त के मुताबिक, सोमवार सुबह एम्स में एक शव की पहचान अर्पित के विवरण से मेल खाने की सूचना मिली, लेकिन चोटों के कारण शव को पहचानना आसान नहीं था। बाद में उसकी मां ने शरीर पर मौजूद जन्मचिह्नों के आधार पर बेटे की पहचान की। अर्पित के पिता भूपेंद्र ने बताया कि दिल्ली पहुंचने के बाद उन्हें शव की तलाश में काफी परेशानी हुई। कई अस्पतालों और घटनास्थल पर जाने के बावजूद स्पष्ट जानकारी नहीं मिल पा रही थी। पोस्टमॉर्टम कक्ष तक पहुंचने में एक वकील ने उनकी मदद की। उन्हें प्रशासनिक स्तर पर अपेक्षित सहयोग नहीं मिला। उन्होंने बताया कि मध्यप्रदेश सरकार के बोर्ड से जुड़े लोगों से उन्हें मदद मिली, जिससे बेटे की तलाश और आगे की प्रक्रिया में सहायता हुई।

काश बेटा पहले बता देता
बेटे की मौत से टूटे भूपेंद्र ने कहा कि परिवार को बाद में पता चला कि पीजी की इमारत की हालत खराब थी। उन्होंने कहा, काश, मेरे बेटे ने मुझे पहले बताया होता। मैं उसे वहां कभी नहीं रहने देता।

दूसरी आंख किसी की जिंदगी रोशन करेगी
अर्पित की एक आंख हादसे में क्षतिग्रस्त हो गई थी, जबकि दूसरी सुरक्षित थी। बेटे को खोने के असहनीय दुख के बीच परिवार ने उसकी सुरक्षित आंख दान करने का निर्णय लिया। पिता ने कहा कि बेटे से उन्हें बहुत उम्मीदें थीं, लेकिन अब उसकी एक आंख किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन में रोशनी का माध्यम बन सकेगी।

मोबाइल में कैद था आखिरी सफर
दिल्ली पहुंचने के बाद अर्पित ने अपने पीजी परिसर का वीडियो भी बनाया था। हादसे के बाद उसका मोबाइल भी नहीं मिल सका। परिवार के पास अब उसके सुरक्षित पहुंचने की आखिरी बातचीत और उस दिन की यादें ही रह गई हैं। 11 अक्टूबर को अर्पित का जन्मदिन था।

अंतिम विदाई में टूट गया परिवार

मंगलवार सुबह अर्पित का शव घर पहुंचते ही माहौल चीख-पुकार में बदल गया। मां बेटे के शव से लिपटकर बेसुध हो गईं। अंतिम बार भाई का चेहरा देखने के बाद बहन प्रियांशी फूट-फूटकर रोने लगी। अंतिम यात्रा के लिए जब शव ले जाने लगे तो वह भाई को रोकने के लिए दौड़ पड़ी। परिजन ने किसी तरह उसे संभाला। पिता ने जब इकलौते बेटे को कंधा दिया तो वहां मौजूद लोगों की आंखें नम हो गईं। इसी दौरान अर्पित की एक चचेरी बहन भी सदमे में बेहोश होकर गिर पड़ी। आसपास के लोग और रिश्तेदार परिवार को ढांढस बंधाते रहे।

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