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घर के मंदिर में कितने शंख रखें? जानें सही नियम और दिशा

घर के मंदिर में शंख रखने के नियम : हिंदू धर्म में घर के पूजा स्थल पर शंख स्थापित करना अत्यंत मंगलकारी माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार, कुंडली के विभिन्न ग्रह दोषों को शांत करने के लिए इसे एक अचूक उपाय के रूप में देखा जाता है। आध्यात्मिक मान्यताओं के अनुसार, शंख का सीधा संबंध धन और ऐश्वर्य की देवी माता लक्ष्मी तथा सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु से है। इसलिए, पूजा घर में इसे नियमानुसार रखना आपके सोए हुए भाग्य को जगा सकता है, जबकि की गई छोटी सी लापरवाही जीवनभर की परेशानियों का कारण बन सकती है।

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अक्सर लोग अनजाने में पूजा घर में शंख से जुड़ी कई बुनियादी गलतियां कर बैठते हैं, जिससे सकारात्मक फल मिलने के बजाय वास्तु दोष उत्पन्न होने लगता है। यदि आप भी अपने घर में सुख-समृद्धि और मानसिक शांति बनाए रखना चाहते हैं, तो आपको इसके सही रख-रखाव की पूरी जानकारी होनी चाहिए। आइए विस्तार से जानते हैं कि घर के मुख्य मंदिर में शंख को स्थापित करते समय आपको किन महत्वपूर्ण बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

जानिए घर के मंदिर में शंख रखने के नियम और कितनी संख्या होनी चाहिए:

ज्योतिष शास्त्र के नियमों के अनुसार, किसी भी गृहस्थ के पूजा घर में एक साथ दो शंख कभी भी स्थापित नहीं करने चाहिए। जब हम एक ही स्थान पर दो शंख रखते हैं, तो उनसे निकलने वाली तरंगें और ऊर्जा आपस में टकराने लगती हैं। इसके नकारात्मक प्रभाव स्वरूप घर के सदस्यों के बीच बिना वजह मनमुटाव, आपसी कलह और गंभीर गृह दोष पैदा होने की आशंका बढ़ जाती है। इसलिए मंदिर में हमेशा एक ही शंख को स्थान दें।

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दक्षिणावर्ती शंख से शुक्र ग्रह को मजबूत करने का सबसे आसान उपाय:

अगर आपकी कुंडली में शुक्र ग्रह कमजोर स्थिति में है और आपको आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ रहा है, तो मंदिर में दक्षिणावर्ती शंख रखना एक बेहद प्रभावशाली उपाय है। इस विशेष शंख की उपस्थिति से शुक्र देव प्रसन्न होकर शुभ फल प्रदान करते हैं। इसके सकारात्मक प्रभाव के चलते घर-परिवार में कभी भी धन-धान्य की कमी नहीं होती और भौतिक सुख-सुविधाओं तथा मान-सम्मान में लगातार वृद्धि होने लगती है।

बजाने वाले शंख का भूलकर भी न करें पूजा और अभिषेक में इस्तेमाल:

पूजा-पाठ के दौरान आप जिस शंख का उपयोग ध्वनि करने या बजाने के लिए करते हैं, उससे कभी भी भगवान की मूर्तियों का अभिषेक नहीं करना चाहिए और न ही उससे देव प्रतिमाओं पर जल अर्पित करें। दरअसल, मुख से फूंकने के कारण वह शंख धार्मिक रूप से उच्छिष्ट यानी झूठा माना जाता है। पवित्र कार्यों में ऐसे शंख का उपयोग करने से पूजा का कोई भी शुभ फल या पुण्य प्राप्त नहीं होता है। इसलिए बजाने और पूजा करने का शंख हमेशा अलग रखें।

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सही दिशा और सही धातु के स्टैंड पर स्थापित करने का विधान:

वास्तु शास्त्र के अनुसार, शंख को सदैव मंदिर के ईशान कोण यानी उत्तर-पूर्व दिशा में ही स्थापित किया जाना चाहिए, क्योंकि इस कोने को देवताओं का स्थान माना जाता है। इस पवित्र दिशा में शंख रखने से कुंडली में देवगुरु बृहस्पति बलवान होते हैं, जिससे परिवार के सदस्यों की बुद्धि और ज्ञान का विकास होता है। इसके साथ ही, शंख का खुला हुआ मुख्य भाग हमेशा ऊपर की ओर और उसका नुकीला सिरा भगवान की प्रतिमा की तरफ होना चाहिए।

एक बात का हमेशा ध्यान रखें कि शंख को कभी भी सीधे जमीन या फर्श पर नहीं टिकाना चाहिए। इसे हमेशा तांबे या पीतल से बने किसी सुंदर स्टैंड पर ही सम्मानपूर्वक विराजमान करें। तांबा और पीतल जैसी पवित्र धातुएं सूर्य एवं गुरु ग्रह से जुड़ी होने के कारण मंदिर के वातावरण में दिव्य ऊर्जा के प्रवाह को निरंतर बनाए रखने का काम करती हैं, जिससे घर में सकारात्मकता का संचार होता है।

राहु-केतु के अशुभ प्रभावों और नजर दोष से मुक्ति पाने का तरीका:

यदि आपके परिवार के कार्यों में लगातार बाधाएं आ रही हैं, तो मंदिर में रखे पवित्र शंख में रोज सुबह स्वच्छ जल या गंगाजल भरकर रखें। इसके बाद, अगले दिन सुबह पूजा समाप्त होने पर उस अभिमंत्रित जल को अपने पूरे घर के कोने-कोने में पूरी श्रद्धा के साथ छिड़क दें। ऐसा नियमित रूप से करने से राहु-केतु के कारण मिलने वाले सभी तरह के बुरे प्रभाव पूरी तरह समाप्त हो जाते हैं और घर को किसी की बुरी नजर भी नहीं लगती है।

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