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पर्यावरण बचाने की पहल: मंदिर समिति की मदद से बांटेंगे शिवप्रिय पौधे

बाबा महाकाल की चौथी सवारी पर 11 हजार पौधे बांटे, गोकाष्ठ के गमले में खास तौर पर वन विभाग ने तैयार करवाए थे

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अक्षरविश्व न्यूज उज्जैन। शिव की नगरी उज्जैन में पर्यावरण को बचाने की अनूठी पहल वन विभाग ने शुरू की है। विभाग श्री महाकालेश्वर मंदिर प्रबंध समिति के माध्यम से शिवप्रिय पौधों को वितरण कर रहा है। बाबा महाकाल की चौथी सवारी पर 11 हजार पौधे बांटे गए। यह सिलसिला आगे भी जारी रखने की योजना बनाई जा रही है।

दरअसल, सावन-भादौ मास में निकलने वाले बाबा महाकाल की सवारी हर बार नई थीम पर निकाली जा रही है। चौथे सावन पर निकली सवारी पर्यावरण बचाने की थी। ऐसे में पौधों का वितरण किया गया। वितरित किए जाने वाले पौधों को चुनने में इस बात का ख्याल रखा गया कि वे भगवान शिव को प्रिय हो। डीएफओ अनुराग तिवारी कहते हैं कि बिल्व, सिंदूर, रुद्राक्ष और शमी के पौधों का खास तौर पर चयन किया गया।

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बिल्व
एगल मार्मेलोस वानस्पतिक नाम वाले बिल्व पत्र की ख्ूाबी इसकी पत्तियां और फल हैं। तीन पत्तियां ब्रह्मा, विष्णु और महेश की प्रतीक है। सावन में बिल्व पत्र शिवलिंग पर चढ़ाने का खास महत्व है। बेल का फल पाचन के लिए ठीक होता है।

रुद्राक्ष
एलोकापर््स गैनिट्राना वानस्पतिक नाम वाले रुद्राक्ष का पेड़ 50 से 80 फीट ऊंचा होता है। इसमें हरे रंग के फल लगते हैं, जो सूखने पर रुद्राक्ष में बन जाते हैं। इनका उपयोग आध्यत्मिक जगत में खूब होता है। शिव रुद्राक्ष धारण करते हैं।

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सिंदूर
बिक्सा ओरेलाना वानस्पितक नाम वाले सिंदूर के पौधे को लिपस्टिक ट्री भी कहा जाता है। यह 20 फीट तक ऊंचा होता है। इसके फल लाल रंग के होते हैं और इनके बीज से सिंदूर बनता है। सनातन संस्कृति में सिंदूर की खास अहमियत है

शमी
प्रोसोपिस सिनेरेरिया वानस्पितक नाम वाले शमी वृक्ष को शनि की कृपा वाला माना जाता है। सुख-समृद्धि और वास्तुदोष दूर करने में यह कारगर माना जाता है। इसकी पहचान पीले फूल, शाखाओं पर कांटे और बबूल जैसी पत्तियां होती हैं।

तुलसी
ओसीमिस सैंक्टम वानस्पितक नाम वाला यह पौधा करीब-करीब हर सनातनी घर में पाया जाता है। लैमिऐसी कुल के इस पौधे का धार्मिक और औषधीय महत्व है। पौधे के पूजन की परंपरा है। सर्दी-खांसी में औषधि के तौर पर इस्तेमाल होता है।

अभी 11 हजार पौधें बांटे आगे भी बांटने की योजना
सावन सवारी पर 11 हजार पौधों का वितरण किया गया है। इन्हें खास तौर पर गोकाष्ठ से तैयार गमलों में रखा गया था। गमलों सहित इन पौधों को जमीन में रोपा जा सकता है। पौधों का चयन करते समय इस बात का खास ख्याल रखा गया है कि वे शिवप्रिय हों। शमी, बेल, सिंदूर, रुद्राक्ष और तुलसी के पौधें महाकाल प्रसाद्म के तौर पर वितरित किए गए हैं। वन विभाग की योजना है कि महाकालेश्वर मंदिर प्रबंध समिति की सहयोग से पौधों का वितरण पूरे साल होता रहे। इसके लिए मंदिर परिसर में ही स्टाल लगाने की योजना है।
अनुराग तिवारी, डीएफओ

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