भारतीय मूल की नावी पिल्ले को मिला नोबेल शांति पुरस्कार

ओस्लो: मानवाधिकारों की रक्षा और न्याय के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अमिट छाप छोड़ने वाली भारतीय मूल की दक्षिण अफ्रीकी ज्यूरिस्ट नवेनेथम ‘नावी’ पिल्ले को प्रतिष्ठित नोबेल शांति पुरस्कार (Nobel Peace Prize) से सम्मानित किया गया है। दूसरी तरफ डोनाल्ड ट्रंप के हाथ फिर से खाली रह गये हैं और उन्हें इस साल भी नोबेल पुरस्कार के लिए नहीं चुना गया है।
कौन हैं नावी पिल्ले?
88 वर्ष की नावी पिल्ले का जन्म दक्षिण अफ्रीका के डरबन में एक भारतीय तमिल परिवार में हुआ था। उनके दादा तमिलनाडु से दक्षिण अफ्रीका जाकर बसे थे।
विपरीत परिस्थितियों और रंगभेद के दौर में पढ़ाई पूरी कर वह दक्षिण अफ्रीका के नेटाल प्रांत में अपनी लॉ प्रैक्टिस शुरू करने वाली पहली गैर-श्वेत महिला बनी थीं। मानवाधिकारों की लड़ाई में उनका योगदान ऐतिहासिक रहा है।
- रंगभेद के क्रूर दौर के दौरान उन्होंने नेल्सन मंडेला के राजनीतिक बंदियों और अन्य मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के मुकदमों की पैरवी की और जेलों में प्रताड़ना के खिलाफ आवाज उठाई।
- वह 2008 से 2014 तक संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त रह चुकी हैं।
- वह इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट (ICC) की जज और रवांडा के लिए बने इंटरनेशनल क्रिमिनल ट्रिब्यूनल की अध्यक्ष भी रहीं जहां उन्होंने युद्ध अपराधों और नरसंहार के खिलाफ ऐतिहासिक फैसले दिए।
- उन्होंने रवांडा में हुए नरसंहार के लिए बने अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण में न्यायाधीश और बाद में अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। इसी दौरान उन्होंने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया जिसके तहत अंतरराष्ट्रीय कानून में पहली बार ‘बलात्कार और यौन हिंसा’ को नरसंहार का हिस्सा माना गया।
- हाल समय में उन्होंने इजरायल और फिलिस्तीनी क्षेत्रों में मानवाधिकारों के उल्लंघन की जांच करने वाले संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र जांच आयोग की अध्यक्षता भी की थी।
- नवी पिल्लई ने हार्वर्ड लॉ स्कूल से डॉक्टर ऑफ ज्यूरिडिकल साइंस (PhD) की उपाधि प्राप्त की है और वे यह डिग्री हासिल करने वाली पहली दक्षिण अफ्रीकी नागरिक हैं। उन्होंने अपना पूरा जीवन दुनिया भर में पीड़ितों, महिलाओं के अधिकारों और न्याय की आवाज बुलंद करने में समर्पित किया है।








