Advertisement

सावधान! माता-पिता की रोज़ाना नोकझोंक बच्चों को बना सकती है आक्रामक, जानें विशेषज्ञों की राय

एक हालिया रिसर्च में सामने आया है कि बच्चे अपने घर के बड़ों की हर छोटी-बड़ी आदत को बहुत ध्यान से देखते और सीखते हैं। वे सिर्फ यह नहीं सीखते कि क्या बोलना है, बल्कि यह भी समझते हैं कि अपनी बात मनवाने के लिए बड़े लोग किन तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। यही वजह है कि कई बार बच्चे भी अपने दोस्तों और सहपाठियों के साथ वैसा ही व्यवहार करने लगते हैं, जैसा वे घर में देखते हैं।

 

Advertisement

विशेषज्ञों का मानना है कि जब बच्चे बार-बार घर में ताने, धमकियां, भावनात्मक दबाव या अपमानजनक व्यवहार देखते हैं, तो वे इसे सामान्य मान लेते हैं। बाद में यही व्यवहार उनके सामाजिक रिश्तों में भी दिखाई देने लगता है।

बच्चों की छोटी नोकझोंक को हल्के में लेना पड़ सकता है भारी

“अगर तुमने मेरी बात नहीं मानी तो मैं तुम्हें अपनी बर्थडे पार्टी में नहीं बुलाऊंगा” या “टिफिन शेयर नहीं किया तो मैं तुम्हारे साथ प्रोजेक्ट नहीं करूंगा” जैसी बातें आजकल स्कूल जाने वाले बच्चों के बीच आम हो गई हैं।

Advertisement

अक्सर माता-पिता और शिक्षक इन बातों को बच्चों की सामान्य नोकझोंक या बचपना समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन बाल मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि इस तरह की धमकियां और दबाव बनाने की आदतें अचानक पैदा नहीं होतीं। इनके पीछे घर का वातावरण और बच्चों द्वारा देखा गया व्यवहार महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

बच्चे वही करते हैं जो वे देखते हैं

डेनवर में हुई एक हालिया रिसर्च के अनुसार बच्चे अपने आसपास के वयस्कों का व्यवहार हूबहू अपनाते हैं। वे यह बारीकी से देखते हैं कि परिवार के सदस्य अपनी बात मनवाने के लिए किन तरीकों का इस्तेमाल करते हैं।

Advertisement

अगर घर में माता-पिता एक-दूसरे को धमकी देते हैं, ताने मारते हैं, बातचीत बंद कर देते हैं या भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल करते हैं, तो बच्चे भी यही मान लेते हैं कि समस्याओं का समाधान इसी तरह किया जाता है। धीरे-धीरे वे सीख जाते हैं कि दूसरों पर दबाव डालकर या उन्हें नीचा दिखाकर अपनी बात मनवाई जा सकती है।

‘बोबो डॉल’ रिसर्च ने क्या बताया?

मनोविज्ञान की दुनिया में ‘बोबो डॉल एक्सपेरिमेंट’ को बच्चों के व्यवहार को समझने वाली सबसे प्रसिद्ध रिसर्च में गिना जाता है।

इस अध्ययन में पाया गया कि जिन बच्चों ने बड़ों को एक खिलौना डॉल के प्रति आक्रामक व्यवहार करते देखा, उन्होंने भी बाद में उसी डॉल के साथ वैसा ही हिंसक व्यवहार दोहराया। इससे यह साबित हुआ कि बच्चे केवल निर्देशों से नहीं, बल्कि देखकर सीखते हैं।

विशेषज्ञ बताते हैं कि तीन से छह साल की उम्र के बीच बच्चों का मस्तिष्क सबसे तेजी से सीखता है। इस दौरान घर में देखी गई बातें उनके व्यक्तित्व का स्थायी हिस्सा बन सकती हैं। इसलिए भले ही घर में शारीरिक हिंसा न हो, लेकिन मानसिक और शाब्दिक आक्रामकता भी बच्चों पर गहरा असर डाल सकती है।

कौन-से व्यवहार बच्चों को गलत संदेश देते हैं?

कई बार माता-पिता अनजाने में ऐसे व्यवहार करते हैं, जो बच्चों को नकारात्मक सीख दे सकते हैं।

उदाहरण के लिए बार-बार कहना कि “तुमसे कुछ नहीं होगा” या “तुम हमेशा गलत करते हो”, बच्चों के सामने दूसरों को नीचा दिखाने का संदेश देता है।

इसी तरह “अगर तुमने मेरी बात नहीं मानी तो मैं तुमसे बात नहीं करूंगी” जैसी शर्तें भावनात्मक दबाव बनाने का तरीका सिखाती हैं। परिवार के सदस्यों की आलोचना करना या उनकी कमजोरियों का मजाक उड़ाना भी बच्चों के व्यवहार को प्रभावित करता है।

जब बच्चे यह सब लगातार देखते हैं, तो वे भी अपने दोस्तों से कहने लगते हैं, “तुम हमारे ग्रुप में नहीं खेल सकते” या “तुम्हारे कपड़े अच्छे नहीं हैं”, जिससे बुलिंग की शुरुआत होती है।

बुलिंग का असर सिर्फ पीड़ित पर नहीं पड़ता

विशेषज्ञों के अनुसार बुलिंग केवल उस बच्चे को नुकसान नहीं पहुंचाती जो इसका शिकार होता है, बल्कि ऐसा व्यवहार करने वाले बच्चे के भविष्य पर भी गंभीर असर डाल सकती है।

जो बच्चे बचपन में दूसरों को नियंत्रित करने, डराने या हेरफेर करने की आदत विकसित कर लेते हैं, उनमें किशोरावस्था के दौरान कई समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। इनमें अवसाद, अनुशासनहीनता, नियमों की अनदेखी, आपराधिक प्रवृत्तियां और नशे की लत जैसी समस्याएं शामिल हो सकती हैं।

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसे बच्चों के लिए स्वस्थ सामाजिक संबंध बनाना भी कठिन हो सकता है, क्योंकि वे सहयोग और सम्मान के बजाय नियंत्रण और दबाव की भाषा सीखते हैं।

समाधान पूरी तरह माता-पिता के हाथ में

विशेषज्ञों का मानना है कि अच्छी खबर यह है कि इस समस्या का समाधान परिवार के भीतर ही मौजूद है। बच्चे मूल रूप से दो चीजों से प्रेरित होते हैं—जो वे पाना चाहते हैं और जिससे वे बचना चाहते हैं।

ऐसे में माता-पिता को अपनी बात मनवाने के लिए नकारात्मक तरीकों के बजाय सकारात्मक व्यवहार अपनाना चाहिए। बच्चों के सामने एक-दूसरे का सम्मान करना, धन्यवाद कहना, सहयोग करना और मिलकर काम करना उन्हें स्वस्थ रिश्तों की सीख देता है।

बच्चों के सामने सम्मान और सहयोग का उदाहरण बनें

जब माता-पिता बच्चों के सामने एक-दूसरे की सराहना करते हैं और सम्मानपूर्वक बातचीत करते हैं, तो बच्चे भी यही व्यवहार सीखते हैं।

उदाहरण के तौर पर यदि आप बच्चों के सामने अपने जीवनसाथी की तारीफ करते हुए कहते हैं, “आज हम समय पर पहुंचे क्योंकि मम्मी ने अच्छी तैयारी की थी”, तो बच्चा सहयोग और टीमवर्क का महत्व समझता है।

इसी तरह परिवार में किसी मतभेद की स्थिति में चिल्लाने या आरोप लगाने के बजाय शांति से बातचीत कर समाधान निकालना बच्चों को स्वस्थ संवाद का तरीका सिखाता है।

घर का सकारात्मक माहौल बच्चों को बनाता है बेहतर इंसान

विशेषज्ञों का कहना है कि जब बच्चे घर में दयालुता, सम्मान, सहयोग और आपसी समझदारी देखते हैं, तो वे न केवल दूसरों को धमकाने से बचते हैं बल्कि खुद भी बुलिंग का शिकार बनने की संभावना कम कर देते हैं।

ऐसे बच्चों में आत्मसम्मान मजबूत होता है, वे बेहतर रिश्ते बनाते हैं और सामाजिक परिस्थितियों को अधिक संतुलित तरीके से संभालते हैं।

याद रखिए, माता-पिता के पास केवल बच्चों से काम करवाने की शक्ति नहीं होती, बल्कि उन्हें एक संवेदनशील, जिम्मेदार और अच्छा इंसान बनाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी होती है।

Related Articles

📢 पूरी खबर पढ़ने के लिए

बेहतर अनुभव के लिए ऐप का उपयोग करें

ऐप में पढ़ें
ऐप खोलें
ब्राउज़र में जारी रखें