अफसरों का ग्रहण: नियम ताक पर, एमपी में अधिकारियों की पसंद-नापसंद से चल रहा व्यापार

एक्ट कहता है ऑनलाइन… अधिकारी कहते हैं दफ्तर आओ
अक्षरविश्व न्यूज इंदौर। व्यापारियों के लिए इन दिनों जीएसटी पोर्टल से यादा विभाग के अधिकारियों को संतुष्ट करना टेढ़ी खीर बन गया है। प्रदेश में स्टेट जीएसटी के अधिकारी नियमों की अपनी सुविधानुसार व्याख्या कर रहे हैं, जिससे व्यापारियों का कारोबार संकट में है। आलम यह है कि टैक्स, पेनल्टी और ब्याज चुकाने के बाद भी अधिकारियों की सहमति न मिलने पर व्यापारियों के जीएसटी पंजीयन बहाल करने के बजाय सीधे निरस्त किए जा रहे हैं।
जीएसटी कानून के मुताबिक पूरी कर प्रणाली ऑनलाइन और पारदर्शी है, जिसमें अधिकारी के व्यक्तिगत दखल की गुंजाइश न्यूनतम रखी गई है। विभाग के दफ्तरों में भी दखल-मुक्त प्रक्रिया के पोस्टर चस्पा हैं। लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है। नियम है कि रिटर्न में देरी पर पंजीयन निलंबित होता है और बकाया चुकाते ही इसे बहाल होना चाहिए। इसके उलट, सर्कल अधिकारी व्यापारियों को दफ्तर बुला रहे हैं और न जाने पर जवाब संतोषजनक नहीं बताकर पंजीयन ही कैंसिल कर रहे हैं।
विभागीय प्रताडऩा का एक ताजा मामला शिवसाईं एजेंसी नामक फर्म का है। नवंबर में रिटर्न देरी के कारण इनका पंजीयन निलंबित हुआ। व्यापारी ने 19 जनवरी को सारा टैक्स और पेनल्टी भरकर बहाली का आवेदन दिया। कई चक्कर काटने के बाद 10 फरवरी को विभाग ने स्पष्टीकरण मांगा। व्यापारी ने उसी दिन ऑनलाइन जवाब दाखिल किया, लेकिन चूंकि वह अधिकारी से व्यक्तिगत तौर पर मिलने नहीं पहुंचा, इसलिए 25 फरवरी को उसका पंजीयन यह कहकर निरस्त कर दिया गया कि जवाब संतुष्टिप्रद नहीं हैÓ।
लगातार बढ़ती शिकायतों के बावजूद वरिष्ठ अधिकारी इसे विवेकाधीन अधिकार बताकर पल्ला झाड़ रहे हैं। व्यापारियों का कहना है कि पंजीयन निरस्त होने से उनका काम पूरी तरह ठप हो गया है, क्योंकि वे न तो माल खरीद पा रहे हैं और न ही बेच पा रहे हैं। पोर्टल पर प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी अधिकारियों की यह व्यक्तिगत संतुष्टि वाली शर्त अब भ्रष्टाचार और मानसिक प्रताडऩा का जरिया बनती जा रही है।
पड़ताल में खुली पोल: अधिकारी बोले- आदत सुधारनी है…
जब इस मामले की पड़ताल की गई और सर्कल 15 के सहायक आयुक्त अजय मुजाल्दे से इस मनमानी पर सवाल किया गया, तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि हम जवाब से संतुष्ट नहीं हैं। उनका तर्क था कि अगर पंजीयन बहाल कर दिया तो व्यापारी छह-छह महीने टैक्स नहीं चुकाने को आदत बना लेंगे। हैरानी की बात यह है कि कानूनन ऐसी कड़ी कार्रवाई केवल बोगस फर्मों पर, वह भी फिजिकल वेरिफिकेशन के बाद ही की जा सकती है, लेकिन यहां नियमित व्यापारियों को निशाना बनाया जा रहा है।









