महाशिवरात्रि पर्व : मालवांचल के प्रमुख शिवलिंगों की हैं अलग-अलग महिमा, अक्षरविश्व में पढि़ए इनकी विशेषता…

कण-कण में शिव… हर मन में शिव
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महाशिवरात्रि भगवान शिव और माता पार्वती के मिलन तथा शिव के नीलकंठ बनने और उनके आदि गुरु के रूप में स्थिरता प्राप्त करने का उत्सव है। यह पावन रात आत्म जागृति, आध्यात्मिक साधना और शिव से शक्ति के मिलन का प्रतीक मानी जाती हैं। मान्यता है कि शिवरात्रि के दिन माता पार्वती का शिव से विवाह हुआ था जो वैराग्य और भक्ति का संगम माना जाता है।
इसी दिन भगवान शिव निराकार से साकार रूप में प्रकट हुए थे। यौगिक परम्परा के अनुसार इस रात शिवजी ने ध्यान की सर्वोच्च अवस्था प्राप्त की थी। वे पूर्ण रूप से स्थिर हुए। इसलिए इसे आत्म जागृति की रात भी माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन रूद्राभिषेक करने से वैवाहिक जीवन में संतुलन स्थापित होता है और सुख-समृद्धि प्राप्त होती है। उज्जैन में राजाधिराज बाबा महाकाल मौजूद हैं। यहां कण-कण में उनकी कृपा है। पूरा नगर शिवरात्रि पर शिवभक्ति में डूब जाता है। बारह ज्योर्तिलिंगों में एक बाबा महाकाल स्वयंभू है। इसकी महिमा अपरम्पार है। मालवाचंल में महाकाल के साथ अन्य शिवलिंग भी हैं, जिनकी अपनी महिमा हैं। महाशिवरात्रि पर पढि़ए प्रमुख शिवलिंगों की विशेषता…
उज्जैन : तडक़े भभूत रमाते हैं बाबा महाकाल….

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक हैं। यह एकमात्र दक्षिणमुखी शिवलिंग हंै, जिसे स्वयंभू माना जाता है। मंदिर की स्थापना 2000 साल पहले की बताई जाती है। हालांकि मुगल आक्रमण के समय यह क्षतिग्रस्त हो गया था और १६वीं शताब्दी में इसका पुर्ननिर्माण कराया गया था।
ख्याति- मंदिर में तडक़े होने वाली भस्मारती विश्व प्रसिद्ध है। तीन मंजिला मंदिर के गर्भगृह में श्री महाकाल, तल मंजिल पर ओंकारेश्वर और दूसरी मंजिल पर नागचंद्रेश्वर विराजमान हैं। नागचंद्रेश्वर के पट साल में एक बार नागपंचमी पर खुलते हैं। बाबा महाकाल सावन-भादौ, कार्तिक अगहन में प्रजा को दर्शन देने सवारी के रूप में निकलते हैं।
आयोजन: महाशिवरात्रि पर दस दिनी उत्सव मनाया जाता हैं। सबसे खास महाशिवरात्रि के अगले दिन दोपहर की भस्मारती होती है।
देवास : तपस्या से खुश होकर स्वयंभू प्रकट हुए भोलेनाथ | स्वयंभू महाकालेश्वर

अमित व्यास|मंदिर का इतिहास: देवास से ५ किलोमीटर दूर स्थित बिलावली में स्थित है। ३०० साल पुराना मंदिर है। एक शिवभक्त को बाबा महाकाल के दर्शन की तीव्र इच्छा थी। कहा जाता है कि उनकी तपस्या और श्रद्धा से प्रसन्न होकर भगवान शिव एक टीले पर स्वयंभू रूप में प्रकट हुए। इसके बाद ग्रामीणों ने यहां मंदिर का निर्माण करवाया। समय के साथ यह स्थान प्रसिद्ध धार्मिक स्थल बन गया।
प्रसिद्धि- भगवान शिव का स्वयंभू शिवलिंग श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार यह शिवलिंग हर वर्ष महाशिवरात्रि के अवसर पर एक तिल के बराबर बढ़ता है।
पूजा-अर्चना:- महाशिवरात्रि पर्व पर गांव में मेला लगता है, भगवान का पूरे दिन जलाभिषेक होता है शाम को दूल्हे की तरह पंडित भगवान का शृंगार करते हैं।
कैसे पहुंचे :- उज्जैन से यह करीब ४० किलोमीटर दूर है। यहां बस सेवा उपलब्ध है। अपने निजी वाहन से भी पहुंचा जा सकता है।
भौंरासा : बाबा के चमत्कार से भागा था औरंगजेब…

बाबा भंवरनाथ जी महाराज|इतिहास: यहां भंवरनाथ जी महाराज का मंदिर है। भगवान शंकर के परम भक्त भंवरसिंह ने कठोर तपस्या की और बाद में जीवित समाधि ली। मंदिर में आने वाले श्रद्धालु पहले भक्त भंवरसिंह की समाधि पर नमन करते हैं और उसके बाद ही भगवान मनकामेश्वर के दर्शन करते हैं। लगभग 1650 वर्ष पूर्व भागवत सेठ नामक व्यापारी ने इस नगर और मंदिर का निर्माण करवाया था।
प्रसिद्धि- जनश्रुतियों के अनुसार औरंगजेब ने मंदिर को ध्वस्त करने के लिए भगवान मनकामेश्वर की शिवपिंडी पर गंडासे से प्रहार किया था। जैसे ही वार हुआ, शिवपिंडी से रक्त और दूध की धारा बहने लगी। यह दृश्य देखकर वह घबराकर भाग निकला।
पूजा-अर्चना- महाशिवरात्रि पर यहां 10 दिवसीय विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। नगर परिषद से आयोजित बाबा भंवरनाथ जी महाराज का मेला इस वर्ष 14 फरवरी से शुरू होकर 22 फरवरी तक चलेगा।
कैसे पहुंचे- देवास से १६ किलोमीटर दूर भोपाल रोड पर बसा है भौंरासा। यहां के लिए बस सेवा उपलब्ध हैं। अपने निजी वाहन से भी यहां पहुंचा जा सकता है।
सोयत : मां नर्मदा की गहराई से प्रकट हुए बाबा नर्मदेश्वर| बाबा नर्मदेश्वर महादेव

सत्येंद्रसिंह चौहान इतिहास : शिवालय का सबसे बड़ा रहस्य यहां स्थापित शिवलिंग है। यह शिवलिंग नर्मदा नदी की गहराइयों से निकला एक दुर्लभ ‘बाणलिंग’ है। नगर का कोई भी मांगलिक कार्य हो, पहला निमंत्रण महादेव के दरबार में ही चढ़ाया जाता है। श्री नर्मदेश्वर महादेव मंदिर केवल एक देवालय नहीं, बल्कि सोयत का अभेद्य ‘आध्यात्मिक कवच’ है। सोयत के जन-मानस में बाबा नर्मदेश्वर ‘नगर कोतवाल’ के रूप में पूजनीय हैं।
प्रसिद्धि – शास्त्रों में उल्लेख है कि ‘नर्मदा के कंकड़़, उतने शंकर’। सदियों पहले भक्त इस स्वयंभू शिवलिंग को नर्मदा तट से यहां लाए थे। इसे किसी छेनी या हथौड़े से गढ़ा नहीं गया है, यही कारण है कि यहां एक अद्भुत ऊर्जा का संचार महसूस होता है।
पूजा-अर्चना- तडक़े 4 बजे से ही अभिषेक शुरू होता है। बाबा को सूखे मेवों, ताजे फलों और भांग से ‘दूल्हे’ की तरह अलंकृत किया जाता है। दोपहर में शाही सवारी निकलती है। शाम को पालकी की वापसी पर महाआरती होती है। इसके पश्चात महाप्रसादी का वितरण होता है।
कैसे पहुंचे- उज्जैन से यह मंदिर लगभग 115 किलोमीटर दूर है। निजी या बस द्वारा भी पहुंचा जा सकता है। बस सेवा भी उपलब्ध है।
कानड़ : भोले का प्रताप, जल कुंड का जल खत्म नहीं होता
बाबा भूतेश्वर महादेव | दिनेश बरेठा
इतिहास एवं प्रसिद्धि-बाबा भूतेश्वर महादेव का मंदिर करीब 200 साल से भी अधिक पुराना है। नीचे एक जलकुंड भी है। आपने ऐसा भी कुंड देखे होंगे गर्मी में सूख जाते हैं। लेकिन इस बाबा भूतेश्वर महादेव की अद्भुत महिमा है जो इस कुंड में 12 महीने ही पानी भरा रहता है। रमणीय स्थल से उभरा शिव पहाड़ी श्रद्धालुओं का बना आस्था का केंद्र है।
पूजा-अर्चना-शिवरात्रि पर जुलूस और महाप्रसादी के आयोजन होंगे।
कैसे पहुंचे- उज्जैन से ८६ किमी दूर कोटा रोड पर स्थित है। निजी या बस द्वारा पहुंचा जा सकता है।
आगर : ब्रिटिश कर्नल ने देखा बाबा का चमत्कार

बाबा बैजनाथ महादेव | अजय झंझी
मंदिर का इतिहास- आगर शहर से 4 किमी दूर है बाबा श्री बैजनाथ महादेव का मंदिर। इसे अति प्राचीन माना जाता है। यह मंदिर पहले मठ था। यहां अघौरी तांत्रिक पूजा-पाठ करते थे। मंदिर के शिखर पर चार फीट ऊंचा स्वर्ण कलश है। यह मंदिर बहुत ही मनोहारी और दर्शनीय है।
प्रसिद्धि- मंदिर का जीर्णोद्धार कर्नल मार्टिन ने 1883 में 15 हजार रुपए का चंदा कर करवाया था। अफगानिस्तान में करीब 145 वर्ष पहले पठानी सेना से घिरे कर्नल मार्टिन की प्राणरक्षा भगवान शिव ने की और वे सही सलामत घर लौटे। इतिहास में वर्णित है कि वर्ष 1879 में अंग्रेजों ने अफगानिस्तान पर आक्रमण कर दिया था। इस युद्ध का संचालन आगर-मालवा की ब्रिटिश छावनी के लेफ्टिनेंट कर्नल मार्टिन को सौंपा गया था। वह युद्ध में घिर गए थे। उनकी पत्नी ने बाबा बैजनाथ की पूजा की। उधर मार्टिन को बाबा बैजनाथ ने एक योगी के रूप में दर्शन दिए। नतीजतन अफगान सेना पराजित हो गई। मार्टिन लौट आए। तब उन्हें पत्नी ने बताया कि यह सब बाबा बैजनाथ की वजह से हुआ है।
महाकाल लोक तर्ज पर विकसित हो रहा बाबा बैजनाथ लोक- मप्र शासन द्वारा मंदिरों का कायाकल्प जारी है। इसी कड़ी में महाकाल लोक की तर्ज पर बाबा बैजनाथ लोक का नवनिर्माण कार्य निरंतर चल रहा है। १८.९० करोड़ की राशि से अधिकतर कार्य पूर्ण होने वाले हैं। शेष कार्य महाशिवरात्रि के तत्काल बाद प्रारंभ हो जाएंगे। इस वर्ष के अंत तक बैजनाथ लोक भव्य और सुंदर दिखाई देगा।
पूजा-अर्चना – प्रतिवर्ष सावन के आखिरी सोमवार को बाबा बैजनाथ की राजसी सवारी निकलती हैं। जिसमें लगभग दो लाख भक्त सम्मिलित होकर सवारी को भव्य रूप प्रदान करते हैं। सवारी पश्चात भक्तों द्वारा जनसहयोग से एकत्रित राशि से विशाल भंडारे का आयोजन किया जाता है, जिसमें लगभग एक लाख भक्त भोजन करते हंै।
कैसे पहुंचे-उज्जैन से आगर की दूरी ६८ किलोमीटर है। यहां बस सेवा भी उपलब्ध है। और अपने निजी वाहन से भी जा सकते हैं।
शाजापुर : काशी विश्वनाथ के समकक्ष हंै महादेव

श्री मंगलनाथ महादेव | हेमंत आर्य
इतिहास एवं प्रसिद्धि- एबी रोड पर मां राजराजेश्वरी माता मंदिर के समीप स्थित श्री मंगलनाथ महादेव मंदिर की भौगौलिक स्थिति ठीक बनारस के काशी विश्वनाथ मंदिर जैसी है। करीब 700 वर्षों से अधिक प्राचीन इस मंदिर के सामने चंद्रभागा नदी स्थित है, यहां करीब 25 सालों से अखंड ज्योत जल रही है। जो बारिश के समय में श्मशान घाट को छूती हुई बहती है। मंदिर में स्थित शिवलिंग पर पूर्व में श्मशान में जल रही चिता की लौ भी दिखाई देती थी। इस नदी को वर्तमान में चीलर नदी के नाम से जाना जाता है। बताया जाता है कि पूर्व में श्मशान घाट में जल रही चिता की लौ मंदिर के शिवलिंग पर भी दिखाई देती थी। मंदिर और श्मशन घाट दोनों का स्वरूप परिवर्तित होने से वर्तमान में यह स्थिति नहीं है। मंदिर के पुजारी ने बताया कि पिछली 8 पीढिय़ों से हमारे पूर्वज यहां पूजा अर्चना करते आ रहे हैं। उज्जैन के मंगलनाथ मंदिर की तरह शाजापुर का यह मंगलनाथ मंदिर भी कर्क रेखा पर स्थित है।
मंगलदोष दूर करते हैं मंगलनाथ
इस मंदिर पर नगर के लोगों की गहरी आस्था है। दूरदराज से भी लोग यहां अपनी मनोकामनाएं लेकर आते हैं। ऐसा माना जाता है कि बाबा मंगलनाथ मंगल ग्रह दोष को दूर करते हैं। इसी कारण जिन लोगों को मंगल ग्रह का दोष रहता है, वे विवाह से पहले यहां पर पूजा अर्चना करने आते हैं ताकि मंगल दोष शांत हो जाए।
पूजा-अर्चना- यह मंदिर बड़ा ही प्रसिद्ध और प्राचीन है। ऐसा कहा जाता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से बाबा मंगलनाथ की आराधना करता है वह कर्ज से भी मुक्त हो जाता है।
कैसे पहुंचे- उज्जैन से शाजापुर की दूरी ८५ किलोमीटर है। यहां २ घंटे में पहुंचा जा सकता है। यहां बस सेवा भी उपलब्ध है। और अपने निजी वाहन से भी जाया जा सकता है।
धार : भूमि से प्रकट हुए थे धारेश्वर महादेव

धारेश्वर महादेव | सुनील यादव
मंदिर का इतिहास- ऐतिहासिक नगरी धार अपने प्राचीन वैभव और धार्मिक स्थलों के लिए जानी जाती है। इन्हीं में से एक प्रमुख आस्था केंद्र है धारेश्वर महादेव मंदिर, जो शहर के श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है। सावन माह और महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां बड़ी संख्या में भक्त दर्शन और पूजन के लिए पहुंचते हैं। धारेश्वर महादेव मंदिर के निर्माण से संबंधित शिलालेखीय प्रमाण सीमित हैं, मंदिर को लेकर कई किवदंतियां भी प्रचलित हैं। राजा भोज ने इसका निर्माण किया था। लेकिन स्थानीय परंपराएं इसे परमारकालीन मानती हैं।
प्रसिद्धि- यहां स्थापित शिवलिंग स्वयं-भू है, जो भूमि से प्रकट हुआ था। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि भगवान धारेश्वर महादेव शहर की रक्षा करते हैं और सच्चे मन से की गई प्रार्थना अवश्य स्वीकार होती है।
पूजा-अर्चना- विशेष अवसरों पर यहां रुद्राभिषेक, जलाभिषेक और भजन-कीर्तन का आयोजन किया जाता है। महाशिवरात्रि पर भी यहां विशेष सजावट और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
कैसे पहुंचे- उज्जैन से यह मंदिर ११५ किलोमीटर की दूरी पर एनएच-५९ पर स्थित है। इंदौर-अहमदाबाद हाई-वे पर स्थित इस मंदिर तक बस या निजी वाहन से तीन घंटे में पहुंचा जा सकता है।
उन्हेल : राजा बर्बरीक ने रखी थी मंदिर की नींव

मेलेश्वर महादेव | अनिल कपासिया
मंदिर का इतिहास- क्षिप्रा-गंभीर नदी के संगम पर स्थित महाभारत काल के इस मंदिर की नींव भीम के पौत्र राजा बर्बरीक यानी खाटू श्याम ने रखी थी। मान्यता है कि 5 हजार वर्ष पहले नागदा में नागदाह के बाद राजा जन्मेजय मेलेश्वर पहुंचे थे। कुछ दिन रुकने के बाद जन्मेजय ने महिदपुर में यज्ञ किया। टीले पर शिवलिंग की स्थापना के बाद स्थानीय लोगों यहां मंदिर बनवाया।
प्रसिद्धि- महाभारत काल में कौरव-पांडवों के युद्ध के दौरान राजा बर्बरीक ने मेलेश्वर में यज्ञ किया था। यज्ञ के दौरान बर्बरीक ने शिवलिंग की स्थापना की। मेलेश्वर महादेव भी पर्वत पर विराजमान है, जो बहुत कम स्थानों पर होते हैं।
पूजा-अर्चना- यह यज्ञशाला लोगों की आस्था के केंद्र के साथ दु:खों का निवारण करती है। इसकी भस्मी लगाने से सभी दु:खों का निवारण होता है। यहां दूर-दराज से लोग पहुंचते हैं।
कैसे पहुंचे-उज्जैन से 43 किमी दूर आलोट-जागीर मार्ग स्थित मंदिर में बस या निजी वाहन से ४० से ४५ मिनट में पहुंच सकते हैं।
खाचरौद : जलाधारी देती है बड़ी घटनाओं का अंदेशा

नीलकंठेश्वर महादेव | दीपक पांचाल
मंदिर का इतिहास- अति प्राचीन नीलकंठेश्वर महादेव मंदिर 700 साल पुराना है। यह तालाब के बीचो-बीच स्थित है। मंदिर में एक गुफा है, जो उज्जैन तक जाती थी। अब इसे बंद कर दिया गया है। जलाधारी है, जो होने वाली बड़ी घटनाओं का अंदेशा देती है।
प्रसिद्धि- मान्यता है कि यह जल 12 महीने बहता है लेकिन कहीं भी देश में बड़ी घटना होने के पूर्व इस जल की धारा में कमी दिखाई देती है। यह संकट का प्रतीक होती है।
पूजा-अर्चना- शिवरात्रि को महाकाल की बारात जूनी कचहरी जयेश्वर महादेव मंदिर जाएगी। जहां शिव पार्वती विवाह होगा।
कैसे पहुंचे- उज्जैन से खाचरौद ७५ किमी दूर है। यहां बस और रेल और निजी वाहन से पहुंचा जा सकता है।
सारंगपुर : चारों दिशाओं में हैं भोलेनाथ के चार स्वरूप | गिरीश जोशी
मंदिर का नाम- चारों दिशाओं में मौजूद है शिवलिंग। पूर्व दिशा में तिलभांडेश्वर महादेव मंदिर, पश्चिम में श्री ओंकारेश्वर महादेव मंदिर, उत्तर में श्री कपिलेश्वर महादेव मंदिर, दक्षिण में श्री चिंतामनेश्वर महादेव मंदिर है।
इतिहास- ओम की आकृति से शहर का नक्शा बनाते हैं पांच शिव मंदिर। राजा सारंगदेव ने यह मंदिर बनवाये थे। एबी रोड पर नीलकंठेश्वर महादेव मंदिर भी है। यहां पांचों मंदिर (ऊँ) आकार में स्थित है। सारंगपुर नगर कभी शैव संप्रदाय के लोगों से भरा पूरा शिव उपासना का केन्द्र बिंदु रहा है। कुम्हारिया का महाभारत कालीन शिवमंदिर नगर से 10 किमी दूर कुम्हारिया गांव में स्थित है।
पूजा-अर्चना-शिवरात्रि पर नगर के कपिलेश्वर महादेव, नीलकंठेश्वर महादेव, वटकेश्वर महादेव, ओंकारेश्वर महादेव, पूर्णस्वरमहादेव, सिद्धेश्वर महादेव ओर मनकामनेश्वर महादेव के मंदिरों में भी श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
कैसे पहुंचे- उज्जैन से ९५ किलोमीटर दूर यहां बस, ट्रेन और निजी वाहन से भी पहुंच सकते हैं।
नागदा : जन्मेजय के यज्ञ से नागों को मिली थी मुक्ति

मुक्तेश्वर महादेव | चेतन नामदेव
मंदिर का इतिहास- चंबल नदी के तट पर जूना नागदा के समीप स्थित प्राचीन मुक्तेश्वर महादेव मंदिर है। इसकी स्थापना लगभग 5500 वर्ष पूर्व हुई थी। द्वापर काल के प्रतापी राजा जन्मेजय ने एक विराट यज्ञ किया था।
प्रसिद्धि- पौराणिक कथाओं के अनुसार, जन्मेजय के पिता परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के डसने से हो गई थी। जन्मेजय ने चंबल नदी के किनारे अग्निकुंड में नागों का दहन किया था। इसलिए इसका नाम नागदा पड़ा। मान्यता है कि जिस स्थान पर यज्ञ हुआ, वहीं भगवान शिव के मुक्तेश्वर स्वरूप की स्थापना की गई।
पूजा-अर्चना-मुक्तेश्वर महादेव धाम में विशेष अभिषेक, रुद्राभिषेक, जलाभिषेक और रात्रि जागरण होता है।
कैसे पहुंचे- उज्जैन से नागदा की दूरी ५८ किलोमीटर है। यहां बस, ट्रेन
सेवा उपलब्ध है। अपने निजी वाहन से भी जाया जा सकता है।










