डॉक्टर्स डे पर विशेष….. चिकित्सा के अलावा समाजसेवा में भी अग्रणी हैं शहर के कई डॉक्टर्स

धन की इतनी चाह नहीं…

उज्जैन। डॉक्टर्स के प्रति आभार व्यक्त करने, उनकी सेवा को सम्मानित करने और चिकित्सा जगत में उनके द्वारा दिए गए योगदान को नमन करने का दिन है डॉक्टर्स डे। पं. बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री और चिकित्सा जगत में उल्लेखनीय योगदान देने वाले डॉ. विधानचंद्र रॉय की स्मृति में भारत सरकार ने पहला डॉक्टर्स डे 1991 में मनाया। डॉ. रॉय का जन्म 1 जुलाई 1982 और निधन 1 जुलाई 1962 में हुआ। अक्षर विश्व के सिटी एडिटर नरेंद्रसिंह अकेला ने शहर के उन डॉक्टर्स से चर्चा की है जो इस पेशे के साथ-साथ समाजसेवा में भी सक्रिय हैं।
बड़ा दु:ख होता है, हमारे बच्चे कम उम्र में जा रहे हैं

डॉ. अनुराधा दुबे, कार्डियक सर्जरी में बड़ा नाम। 1996 से लगातार सेवा में हैं। आरडी गार्डी और अवंती में इसी चिकित्सा की यूनिट स्थापित करने में महत्वपूर्ण योगदान। छत्तीसगढ़, कर्नाटक और आस्ट्रेलिया में सेवाएं देने के बाद बाबा महाकाल की नगरी रास आई। उनका कहना है कि कम उम्र के बच्चों का इस संसार से विदा होना अच्छा नहीं लगता। अफसोस होता है। हम दिल की बात करते हैं लेकिन दिल धडक़ता रहे, इस पर ध्यान नहीं देते। हमारी लाइफ स्टाइल बदल गई है। इसे बदलना होगा। पहले 50-60 साल के व्यक्ति को अटैक आता था। अब कोई उम्र नहीं रही। हम लोगों की सेवा के लिए तत्पर हैं।
किसी ने दे दिए तो ठीक नहीं दिए तो भी ठीक

डॉ.जीएस राठौड़ 1980 से लोगों की सेवा कर रहे हैं। पहले दस रुपए में दवा देते थे। गरीबों के डॉक्टर के नाम से लोकप्रिय हुए। फाजलपुरा में क्लीनिक संचालित करते हैं। एक ओर जहां डॉक्टर की फीस 300 से 500 रुपए है, वहीं डॉ. राठौड़ मात्र 50 रुपए में मरीज की सेवा करते हैं। यह भी जरूरी नहीं। यदि कोई गरीब आ गया और बोला- सर फीस नहीं है फिर भी इलाज करते हैं। इंजेक्शन लगाने वाले ही 30 से 50 रुपए वसूल लेते हैं, लेकिन डॉ. राठौड़ मुफ्त में ही लगा देते हैं। वे कहते हैं कि समाज में डॉक्टर का दर्जा भगवान के तुल्य है। हमें इसका मान रखना चाहिए।
गरीबों की सेवा से दुआएं और सुख मिलता है

जिला चिकित्सालय में जब तक रहे, मरीजों के प्रिय रहे। शायद पहले डॉ. हैं सीएम पुराणिक कि जब सेवानिवृत्त हुए तो वार्ड में मरीज रो रहे थे। इंदौर से आए और उज्जैन के होकर रह गए।1980 में सेवा में आए। इंदौर एमवाय में सेवाएं दीं। उज्जैन सिविल अस्पताल में ह्रदय रोग विशेषज्ञ के रूप में 1989 से 2019 तक रहे। धन की कभी चाह नहीं रही। कई ऐसे मरीज सामने आए जिनके पास जाने को किराया और पेट भरने को पैसे नहीं थे। उनकी आर्थिक मदद की। कई को तो बाजार से दवाई भी दिलवाई। कहते हैं कि धन नहीं इनकी दुआएं काम आएंगी। बताते हैं कि जब ओपीडी में बैठते थे तब मरीज नब्ज बाद में दिखाता था, पहले पैर छूता था। इसलिए वे कहते हैं, मुझे उज्जैन ने बहुत प्यार और सम्मान दिया।
समाज सेवा की मिसाल अनुशासन सर्वोपरि

स माज सेवा की बात आती है तो नि:संदेह सीनियर डॉक्टर्स में पहला नाम आता है डॉ. विजय महाडिक का। इनके बारे में कहा जाता है कि अनुशासन के पक्के और कम बोलने वालों में शुमार। आंखें ही बात करती हैं। आरडी गार्डी की दशा और दशा बदलने में आपका बड़ा योगदान है। अवंती की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका। आज भी अपने क्लीनिक में बैठते हैं और बीस रुपए में दवाएं देते हैं। बीस रुपए भी अभी हुए हैं। समाजसेवा में अग्रणी हैं। ईमानदारी से काम करना और सेवा करना। यही मंत्र नए डॉक्टर्स को देते हैं।
शहर के हर वर्ग में
लोकप्रिय, समाजसेवी भी
हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. विजय गर्ग मुस्कुराता हुआ चेहरा। कभी पैदल तो कभी साइकिल चलाते हुए नजर आ जाएंगे। एक ही धुन सवार है कि लोग बीमार न पड़ें। समय-समय पर राय देते हैं। समझाते हैं कि जीवन कैसे जीना है। तय कर रखा है कि कुछ मरीजों की नि:शुल्क सेवा करना है। वे कहते हैं कि दिनचर्या बदलेगी तो स्वास्थ्य सुख मिलेगा। दिल को बचाना है तो जनता को सीपीआर की टे्रनिंग देना होगी। खानपान की तरफ देना होगा। युवाओं में दिल की बीमारी पनप रही है। इसे रोक सकते हैं। खुश रहें, नशे से दूर रहें, परिवार के साथ रहें। आपका दिल आपके साथ रहेगा। सावधानी जरूर बरतें।
अपने शहर को कुछ नया करके दिखाना है

डॉ. ऋषभ जैन, नेत्र रोग विशेषज्ञ हैं। 1992 से सेवाएं दे रहे हैं। अब तक करीब 10 हजार ऑपरेशन कर चुके हैं। इनमें शिविरों के अलावा क्लबों, संस्थाओं और नि:शुल्क भी शामिल हैं। शुरू से यही लक्ष्य रखा कि इस क्षेत्र में कुछ नया करना है। आंखों की रोशनी किस तरह लौटाई जाए। इस पर गहन अध्ययन किया और सफल भी हुए। लोगों को रंग दिखना बंद हो जाता है। इस दिशा में काम किया और आज भी लोगों की मदद कर रहे हैं। नियम है- सबसे पहले जैन मंदिर जाएंगे उसके बाद ही काम शुरू करेंगे। धर्म में गहरी आस्था है। यही आस्था गरीबों की मदद में सहयोग करती है।
आज इनका स्मरण करना भी जरूरी है
अतीत के पन्ने पलट कर देखें तो अपने शहर में कई डॉक्टर ऐसे रहे हैं जिनका सम्मान था। डॉ. जोध सिंह, नई सडक़ पर क्लीनिक हुआ करता था। इनके यहां मरीजों की भीड़ लगी रहती थी। डॉ. हमीद, नई सडक़ पर क्लीनिक संचालित करते थे। आज उनके दो बेटे डॉक्टर हैं। डॉ. व्हीके दुबे, डॉ. अली हुसैन, डॉ. गुरबक्श सिंह, डॉ. एसएन भौंरास्कर, डॉ.नरेंद्र कपूर, डॉ. राकेश अग्रवाल, डॉ. केएस नागर। इनकी सेवाओं को लोग याद रखते हैं। वैद्य अंबाशंकर जोशी बनियान से मोतीझरा देख कर दवाई देते थे। सांदीपनि के वंशज गोपीनाथ व्यास, गुलजारीलाल जैन, डॉ. पिंडा वाला की सेवाएं याद की जाती हैं।










