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कट्टरपंथियों के दबाव में झुका पाकिस्तान, 9 मुस्लिम इलाकों के नाम बदलने का फैसला टला

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की मरियम नवाज सरकार ने लाहौर की सड़कों, चौकों और इलाकों के पुराने नाम बहाल करने का फैसला फिलहाल टाल दिया है। प्रांतीय सरकार जिन नामों को दोबारा लागू करना चाहती थी, उनमें कई पुराने ऐतिहासिक दौर के नाम शामिल थे।

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सरकार ने यह कदम कट्टरपंथी समूहों और सोशल मीडिया पर बढ़ते भारी विरोध के बाद उठाया है। कुछ लोगों ने इसे पुरानी पहचान वापस लाने की कोशिश बताते हुए मुद्दा बना दिया और इसे पूरी तरह से धार्मिक रंग दे दिया। इस मामले पर स्थानीय प्रशासन के आला अधिकारियों का कहना है कि इस संवेदनशील विषय पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है।

इस पूरी योजना का प्रस्ताव पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और मुख्यमंत्री मरियम नवाज की एक हाई-प्रोफाइल बैठक में मंजूर हुआ था। लाहौर हेरिटेज एरियाज रिवाइवल (LHAR) की इस बैठक की अध्यक्षता खुद नवाज शरीफ ने की थी, जिसमें मरियम नवाज भी शामिल थीं। इसी बैठक में विभाजन से पहले के कई पुराने नाम बहाल करने का प्रस्ताव पास किया गया था। यह पूरी योजना शहर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को फिर से सामने लाने के लिए बनाई गई थी, जिसे बाद में कैबिनेट से भी मंजूरी मिल गई थी।

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इस पर नवाज शरीफ का कहना था कि हमें दुनिया के दूसरे देशों से सीख लेनी चाहिए जो अपने ऐतिहासिक नामों से छेड़छाड़ नहीं करते। वहीं मरियम नवाज का मानना था कि इस शहर का इतिहास ही इसकी असली पहचान है और पुरानी इमारतें इसका जीता-जागता सबूत हैं। यह पूरा प्रोजेक्ट लाहौर अथॉरिटी फॉर हेरिटेज रिवाइवल (LAHR) के तहत चलाया जा रहा था, जो कि कई अरब रुपयों का प्रोजेक्ट है।

लेकिन जैसे ही यह खबर बाहर आई, सोशल मीडिया व्लॉगर्स और कुछ कट्टरपंथियों ने मुख्यमंत्री मरियम नवाज का खुलकर विरोध शुरू कर दिया। सरकार को डर था कि इस मुद्दे पर देश में बड़ा राजनीतिक और सामाजिक विवाद खड़ा हो सकता है, इसी वजह से प्रशासन ने फिलहाल कदम पीछे खींच लिए। विरोध बढ़ने के बाद इतिहासकारों, शहरी योजनाकारों और आर्किटेक्ट्स की एक विशेष बैठक भी बुलाई गई, जिसमें ज्यादातर विशेषज्ञों ने माना कि इस ऐतिहासिक पहचान को आने वाली पीढ़ियों के लिए बचाना बेहद जरूरी है।

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इतिहासकारों का कहना है कि विभाजन के बाद कई इलाकों के नाम बदल दिए गए थे, लेकिन इसके बावजूद आज भी लोगों की यादों और रोजमर्रा की बातचीत में पुराने नाम इस्तेमाल होते हैं। जानकारों के मुताबिक, साल 1947 के बाद यहाँ वैसा वैचारिक बदलाव नहीं हुआ जो दूसरे बड़े शहरों में देखा गया था। बँटवारे के बाद यहाँ आने वाले ज्यादातर लोग कामकाजी तबके से थे, जिन्होंने शहर की पुरानी सामाजिक पहचान को अपना लिया, यही वजह है कि पुराना इतिहास आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है।

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