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कोरियन ग्लास स्किन ट्रेंड अपनाने से पहले जानें जरूरी बातें

आजकल सोशल मीडिया पर कोरियन ‘ग्लास स्किन’ (Glass Skin) का क्रेज सिर चढ़कर बोल रहा है। कांच जैसी साफ, चमकदार और बिना पोर्स (रोमकूप) वाली त्वचा पाने के लिए भारतीय युवा और महिलाएं कोरियन ब्यूटी (K-Beauty) प्रोडक्ट्स पर पानी की तरह पैसा बहा रहे हैं।

 

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त्वचा को हाइड्रेट यानी नमी से भरपूर रखना एक अच्छी सोच है, लेकिन दूसरों की देखा-देखी आंख बंद करके इस कोरियन रूटीन को अपनाना त्वचा को भारी नुकसान पहुंचा सकता है। स्वास्थ्य और सौंदर्य विशेषज्ञों का मानना है कि जो स्किन केयर रूटीन साउथ कोरिया के लोगों के लिए बेहतरीन है, जरूरी नहीं कि वह भारतीयों की त्वचा पर भी वैसा ही असर करे। इसके विपरीत, कई मामलों में इसके गंभीर साइड इफेक्ट्स जैसे—हाइपरपिग्मेंटेशन (झाइयां), त्वचा का जलना और एलर्जी जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं।

विशेषज्ञों की चेतावनी: भारत की जलवायु और जेनेटिक्स (आनुवंशिकी) दक्षिण कोरिया से पूरी तरह अलग हैं। बिना सोचे-समझे कोरियन प्रोडक्ट्स का अत्यधिक इस्तेमाल भारतीय त्वचा के प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ रहा है।

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भारतीय (Indian) बनाम कोरियन (Korean) स्किन: मुख्य अंतर

ग्लास स्किन न मिल पाने की सबसे बड़ी वजह हमारी शारीरिक बनावट और हमारे देश का मौसम है। नीचे दी गई तालिका से समझें कि दोनों तरह की स्किन में क्या बुनियादी अंतर होता है:

तुलना का आधार भारतीय त्वचा (Indian Skin) कोरियन त्वचा (Korean Skin)
मौसम और जलवायु भारत का मौसम ज्यादातर गर्म और अत्यधिक उमस (Humid) भरा रहता है। दक्षिण कोरिया की जलवायु मुख्य रूप से ठंडी और शुष्क होती है।
मेलेनिन की मात्रा मेलेनिन पिगमेंट ज्यादा होता है (स्किन टोन लाइट से डार्क ब्राउन होती है)। मेलेनिन की मात्रा काफी कम होती है (स्किन टोन बहुत फेयर होती है)।
धूप का असर धूप में ज्यादा देर रहने पर त्वचा जलती नहीं, बल्कि टैन (Tan) हो जाती है। धूप के संपर्क में आने पर त्वचा झुलस या जल (Sunburn) जाती है।
सीबम और पोर्स गर्मी के कारण सीबम (तेल) का प्रोडक्शन ज्यादा होता है, जिससे पूरी तरह ‘पोरलेस’ लुक पाना असंभव है। ठंडे मौसम के कारण ऑयल प्रोडक्शन कम होता है, जिससे पोर्स छोटे दिखते हैं।
त्वचा की बनावट भारतीय त्वचा तुलनात्मक रूप से थोड़ी मोटी और सख्त होती है। कोरियन त्वचा स्वभाव से पतली और बेहद नाजुक होती है।

त्वचा ही नहीं, मानसिक सेहत पर भी पड़ रहा है बुरा असर

यह ब्यूटी ट्रेंड सिर्फ चेहरे की बाहरी परत को ही नुकसान नहीं पहुंचा रहा, बल्कि महिलाओं और टीनएजर्स की मानसिक सेहत को भी बीमार कर रहा है।

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  • हीन भावना का शिकार: सोशल मीडिया पर फिल्टर और एडिटेड ‘परफेक्ट’ चेहरों को देखकर युवा महिलाएं हीन भावना से ग्रसित हो रही हैं। वे अपने चेहरे के सामान्य दाग-धब्बों को भी बहुत बड़ी कमी समझने लगती हैं।
  • बॉडी डिस्मॉर्फिया (Body Dysmorphia): चिकित्सा विज्ञान की भाषा में इस मानसिक स्थिति को ‘बॉडी डिस्मॉर्फिया’ कहा जाता है। इसमें व्यक्ति अपने लुक और त्वचा को लेकर हर वक्त अत्यधिक तनाव और चिंता में रहता है, जिससे उसकी रोजमर्रा की जिंदगी और आत्मविश्वास बुरी तरह प्रभावित होता है।

क्या कहती है हालिया रिसर्च?

ब्यूटी स्टैंडर्ड्स के इस मनोवैज्ञानिक दबाव को लेकर हाल ही में एक चौंकाने वाला अध्ययन सामने आया है:

  • अध्ययन: ‘इंटरनेशनल जर्नल ऑफ Indian साइकोलॉजी’ में प्रकाशित एक शोध रिपोर्ट।
  • विश्लेषण: इस स्टडी में दिल्ली-एनसीआर की 13 से 16 साल की स्कूली लड़कियों के व्यवहार और मानसिक स्थिति का डेटा जांचा गया।
  • निष्कर्ष: निष्कर्ष में यह बात सामने आई कि लगातार इंटरनेशनल ब्यूटी स्टैंडर्ड्स और सोशल मीडिया के प्रभाव के कारण इन कम उम्र की बच्चियों के मन में अपने शरीर और स्किन को लेकर बेहद नकारात्मक छवि (Negative Body Image) पैदा हो रही है, जो उनके मानसिक विकास के लिए बेहद चिंताजनक है।

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