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60 साल में विशेष संयोग में कल से शुरू होगा पितृपक्ष, सिद्धवट, गयाकोठा पर तैयारी पूरी

उज्जैन। पितरों के मोक्ष और शांति का प्रतीक पितृपक्ष शनिवार (पूर्णिमा) से शुरू हो रहा है। 10 अक्टूबर तक चलने वाले पितृपक्ष के 60 साल में इस बार विशेष संयोग भी बन रहे हैं। पूरे पक्ष के दौरान बुधादित्य योग, केंद्र त्रिकोण और राजयोग के शुभ संयोग रहेंगे। ज्योतिषी अमर डिब्बेवाला का दावा है कि ऐसा संयोग 1966 में बना था। अब इसकी पुनरावृत्ति हो रही है।

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इसमें सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु और शनि की स्थिति विशेष फलदायी बताई जा रही है। सिद्धवट और गयाकोठा पर पर्व के दौरान बड़ी संख्या में लोग उमड़ेंगे, ऐसे में दोनों जगह सफाई से लेकर अन्य तैयारियां शुक्रवार को की जाती रही। पितृपक्ष की इस बार की खासियत यह भी है कि यह शनिवार से शुरू हो रहा है और शनिवार को (10 अक्टूबर) पूर्णता भी होगी।

एक तिथि क्षय पर श्राद्ध पूरे 16
पंचांगीय गणना के अनुसार पंचमी और अष्टमी तिथि इस बार क्षय रहेंगी। हालांकि श्राद्ध की संख्या पूरी 16 रहेगी। शास्त्र सम्मत विधान के मुताबिक तिथि और समय के अंतर को देखते हुए एक ही दिन में दो तिथियों का श्राद्ध किया जा सकता है। इसके तहत तर्पण और श्राद्ध के कार्यक्रम किए जा सकते हैं।

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सर्वपितृ अमावस्या पर गजछाया योग: सर्वपितृ अमावस्या शनिवार (10 अक्टूबर) को होगी। इस दिन दुर्लभ गजछाया योग भी रहेगा। सूर्य का कन्या राशि में गोचर भी पितृकर्म के लिए अत्यंत शुभ है। इस दिन तर्पण, पिंडदान,पार्वण श्राद्ध, एकोदिष्ट श्राद्ध और महातीर्थ कराने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

पितृ पक्ष पर विशेष: पहला दिन पूर्णिमा का, एकोदिष्ट श्राद्ध करें

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म हालय हिंदू धर्म में श्राद्ध का महत्व खास होता है। लोग इन दिनों अपने पितरों को भोज के लिए बुलाते है। उनकी आत्मा की शांति के लिए तर्पण करते हैं। भाद्रपद के शुक्ल पक्ष को पूर्णिमा तिथि पर पहला श्राद्ध होता है और इसी दिन से पितृपक्ष की शुरुआत होती है। चूंकि एक पक्ष में अधिकतम तिथि 15 ही होती हैं, ऐसे में पूर्णिमा से मिलकर सोलह तिथियां बनती हैं। इसलिए पितृ पक्ष को सोलह श्राद्ध भी कहते हैं। श्राद्ध पर्व में पूर्णिमा का खास महत्व है।

ऐसे जातक, जिनकी मृत्यु पूर्णिमा पर हुई है, परिजन उन्हें पूर्णिमा तिथि पर आमंत्रित करते हैं। अर्थात उन्हें श्राद्ध में मिलाते हैं। पुराण के अनुसार प्राणी की मृत्यु के बाद पहले वर्ष, तीसरे वर्ष या पांचवें वर्ष के बाद कभी भी उन्हें श्राद्ध के रूप में आमंत्रित किया जा सकता है। क्योंकि वे पितरों की श्रेणी में प्रवेश कर जाते हैं। गरुड़ और मार्कण्डेय पुराण में भी मृत्यु-तिथि के आधार पर श्राद्ध व्यवस्था का उल्लेख है। इस तिथि पर एकोदिष्ट श्राद्ध करने का उल्लेख है।
पंडित श्याम पंचोली, सिद्धवट

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