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परवरिश की ये 20 गलतियां, क्या आप भी अनजाने में कर रहे हैं?

आज के आधुनिक दौर में हर माता-पिता अपने बच्चे को दुनिया की हर खुशी और एक बेहतरीन लाइफस्टाइल देना चाहते हैं। लेकिन क्या इस ‘बेस्ट’ के चक्कर में हम अनजाने में कुछ ऐसी गंभीर गलतियां कर रहे हैं जो उनके भविष्य को नुकसान पहुंचा रही हैं? आधुनिक मनोविज्ञान और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं की रिसर्च के अनुसार, परवरिश से जुड़े कुछ ऐसे कड़वे सच हैं जिन्हें स्वीकार करने से ज्यादातर पेरेंट्स कतराते हैं। अपनी कमियों को न मानना बच्चों के मानसिक विकास पर बेहद गहरा और नकारात्मक असर डालता है।

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पैरेंटिंग को बेहतर बनाने के लिए वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक पहलुओं को समझना आज के समय की सबसे बड़ी मांग बन चुका है। अपनी गलतियों को समय पर स्वीकार करना ही एक अच्छे और समझदार पेरेंट बनने की पहली सीढ़ी माना जाता है। इसी संदर्भ में  पैरेंटिंग के 20 कड़वे सच और उनसे जुड़े वैज्ञानिक पहलुओं को जानना आज के अभिभावकों के लिए बेहद ज़रूरी हो चुका है। आइए, आधुनिक साइकोलॉजी और रिसर्च के संदर्भों के साथ परवरिश के इन जरूरी सत्यों को विस्तार से समझते हैं।

बच्चे आपकी आदतों को देखकर सीखते हैं, आपकी नसीहतों से नहीं:

प्रसिद्ध साइकोलॉजिस्ट अल्बर्ट बंडूरा की ‘सोशल लर्निंग थ्योरी’ साफ कहती है कि बच्चे हमेशा ‘ऑब्जर्वेशनल लर्निंग’ यानी देखकर सीखते हैं। अगर आप खुद दिनभर मोबाइल फोन में व्यस्त रहते हैं, तो बच्चे से किताबों में दिल लगाने की उम्मीद करना पूरी तरह बेमानी है। इसके साथ ही, यूनिवर्सिटी ऑफ पिट्सबर्ग की एक रिसर्च बताती है कि बच्चों पर चीखना-चिल्लाना आपके डर और कमजोरी को दिखाता है, आपके कंट्रोल को नहीं। बच्चों पर चिल्लाने का मानसिक असर उतना ही खतरनाक होता है जितना शारीरिक पिटाई का।

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अक्सर माता-पिता बच्चों के सामने अपनी गलती मानने से बचते हैं, लेकिन मनोविज्ञान के अनुसार ऐसा करने से बच्चों का आपके प्रति सम्मान और भरोसा दोनों कम हो जाते हैं। इसके अलावा, जर्नल ऑफ चाइल्ड साइकोलॉजी के मुताबिक, घर में माता-पिता के बीच होने वाले आपसी झगड़े बच्चों के न्यूरोलॉजिकल विकास को बुरी तरह प्रभावित करते हैं। पीडियाट्रिशियन डोनाल्ड विनीकॉट कहते हैं कि बच्चों के बेहतर विकास के लिए परफेक्ट पेरेंट बनने की जरूरत नहीं है, बल्कि एक ‘गुड इनफ पेरेंट’ (ठीक-ठाक माता-पिता) होना ही काफी है।

अति-सुरक्षा और हेलिकॉप्टर पैरेंटिंग बच्चों को बनाती है मानसिक रूप से कमजोर:

अमेरिकन जर्नल ऑफ प्ले की एक रिसर्च के मुताबिक, जो माता-पिता अपने बच्चों को छोटे-मोटे रिस्क या फैसले नहीं लेने देते, वे बच्चे बड़े होकर गंभीर एंग्जायटी (चिंता) और डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं। हर वक्त बच्चे की हर गतिविधि और फैसले पर नजर रखना (हेलिकॉप्टर पैरेंटिंग) उन्हें कभी आत्मनिर्भर नहीं बनने देता। बच्चों को जीवन में रिजेक्शन और असफलता का स्वाद चखने देना बेहद जरूरी है, क्योंकि यही अनुभव उनमें विपरीत परिस्थितियों को झेलने की क्षमता (रेजिलिएंस) विकसित करता है।

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ब्रिटिश साइकोलॉजिकल सोसाइटी के अनुसार, हर वक्त बच्चों को किसी न किसी काम में बिजी रखना भी गलत है; थोड़ा बोर होने से बच्चों के सोचने की शक्ति और रचनात्मकता (Creativity) बढ़ती है। परवरिश का अंतिम सच यही है कि एक दिन बच्चों को अपनी जिंदगी जीने के लिए बाहर जाना ही होगा, उन्हें जरूरत से ज्यादा बांधकर रखने की कोशिश उन्हें बागी और विद्रोही बना देती है। इसलिए उन्हें पिंजरा देने की बजाय, खुद के पंखों पर उड़ना सिखाएं।

अभिभावकों की कुछ मुख्य गलतियां और उनके मानसिक प्रभाव:

पेरेंट्स का व्यवहार बच्चों पर होने वाला मानसिक असर
अधूरी इच्छाएं थोपना बच्चों के आत्मसम्मान और उनकी व्यक्तिगत रुचि को कुचल देता है।
दूसरों से तुलना करना स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के अनुसार, बच्चों में गहरी हीन भावना पैदा होती है।
सिर्फ नंबरों पर जोर बच्चों का इमोशनल इंटेलिजेंस (EQ) और व्यावहारिक ज्ञान शून्य हो जाता है।
बुढ़ापे का इंश्योरेंस समझना बच्चों के कोमल मन पर भविष्य का एक अनचाहा मानसिक बोझ डाल देता है।

अनुशासन, भावनात्मक जुड़ाव और खुद की आदतों में सुधार है असली समाधान:

साइकोलॉजिस्ट कैरोल ड्वेक के अनुसार, बच्चों की तारीफ करते समय केवल “तुम बहुत बुद्धिमान हो” कहने के बजाय उनके “प्रयास और कड़ी मेहनत” की सराहना करनी चाहिए। इसके साथ ही, बच्चों की हर जिद पर सिर्फ ‘हाँ’ कहना प्यार नहीं है; बिना सीमाओं (Boundaries) के पाले गए बच्चे समाज में कभी सही ढंग से एडजस्ट नहीं कर पाते। जब घर में सजा का डर जरूरत से ज्यादा होता है, तो बच्चे खुद को बचाने के लिए अक्सर झूठ का सहारा लेने लगते हैं।

बच्चों को महंगे गैजेट्स या खिलौने नहीं, बल्कि आपका क्वालिटी टाइम और मौजूदगी चाहिए। इसके अलावा, भूख न होने पर भी जबरदस्ती खाना खिलाने से बच्चों का अपनी शारीरिक तृप्ति से कनेक्शन टूट जाता है, जिससे आगे चलकर ईटिंग डिसऑर्डर की समस्या हो सकती है। भाई-बहनों के बीच किसी एक को ज्यादा तवज्जो देना भी जीवनभर की कड़वाहट की वजह बनता है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि पैरेंटिंग कोई ‘स्प्रिंट रेस’ नहीं बल्कि एक ‘मैराथन’ है, जहां कंट्रोल करने के बजाय मजबूत कनेक्शन बनाना सबसे जरूरी है।

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