Advertisement

भारत ने रचा इतिहास! पहली बार सैटेलाइट से उतरा कॉमर्शियल विमान

भारतीय विमानन क्षेत्र (Aviation Sector) ने सुरक्षा और तकनीक के मामले में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर हासिल कर लिया है। अब देश में खराब विजिबिलिटी, घने कोहरे या भारी बारिश के बीच भी हवाई जहाजों की लैंडिंग बेहद सुरक्षित तरीके से हो सकेगी। भारत में पहली बार किसी बड़े कॉमर्शियल जेट को जमीन (Airfield) से कोई रेडियो सिग्नल भेजे बिना, सीधे सैटेलाइट सिग्नल्स की मदद से रनवे पर सुरक्षित उतारने का सफल ट्रायल पूरा कर लिया गया है।

 

Advertisement

विमानन नियामक DGCA की देखरेख में 27 जून को इंडिगो एयरलाइंस के एयरबस A320 विमान ने भारत के स्वदेशी ‘गगन’ (GAGAN) नेविगेशन सिस्टम का इस्तेमाल कर यह कामयाबी हासिल की। हालांकि, इंडिगो ने साल 2022 में छोटे ATR विमानों पर इसका टेस्ट किया था, लेकिन किसी बड़े कमर्शियल जेट के साथ देश का यह पहला सफल ट्रायल है।

आसान भाषा में समझें: पहले और अब में अंतर

हवाई जहाजों के लिए यह बदलाव बिल्कुल वैसा ही है जैसा इंसानों के लिए सड़कों पर सफर करना:

Advertisement
  • पहले (पारंपरिक तरीका): यह कुछ ऐसा था जैसे अनजान रास्ते पर आगे बढ़ने के लिए आपको हर चौराहे पर रुककर किसी व्यक्ति से रास्ता पूछना पड़े। विमानों को भी रनवे तक पहुँचने के लिए पूरी तरह एयरपोर्ट के ग्राउंड उपकरणों पर निर्भर रहना पड़ता था।
  • अब (सैटेलाइट तरीका): यह आपके फोन में चालू लाइव GPS जैसा है, जो सीधे सैटेलाइट से जुड़कर आपको पल-पल की सटीक लोकेशन और रास्ता बताता रहता है। ‘गगन’ सिस्टम अब हवाई जहाज को सीधे आसमान से गाइड कर रनवे तक पहुँचाएगा।

इस नई तकनीक से क्या बड़े फायदे होंगे?

सैटेलाइट आधारित लैंडिंग सिस्टम (SLS) के लागू होने से एविएशन सेक्टर को तीन बड़े फायदे मिलेंगे:

  1. खराब मौसम में सुरक्षा: अत्यधिक कोहरा, भारी बारिश या विजिबिलिटी कम होने पर भी पायलटों के लिए सटीक लैंडिंग करना आसान और सुरक्षित होगा।
  2. कम बजट वाले एयरपोर्ट्स का अपग्रेडेशन: जिन छोटे या नए हवाई अड्डों पर महंगे ग्राउंड रेडियो उपकरण (जैसे ILS) नहीं लगे हैं, वहाँ भी बिना अतिरिक्त खर्च के आधुनिक नेविगेशन और सुरक्षित लैंडिंग की सुविधा मिल सकेगी।
  3. सटीक लोकेशन और बैकअप: पायलट को विमान की लाइव पोजीशन की बिल्कुल सटीक जानकारी मिलेगी। यदि मुख्य ग्राउंड सिस्टम कभी फेल या मेंटेनेंस पर होता है, तो यह सैटेलाइट सिस्टम एक बेहतरीन बैकअप का काम करेगा।

5 सवाल-जवाब: जानिए क्या है भारत का ‘गगन’ सिस्टम?

सवाल 1: क्या है स्वदेशी गगन सिस्टम?

जवाब: गगन का पूरा नाम ‘जीपीएस एडेड जियो ऑगमेंटेड नेविगेशन’ (GAGAN) है। यह भारत का अपना सैटेलाइट-बेस्ड ऑगमेंटेशन सिस्टम (SBAS) है, जिसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और भारतीय विमानन प्राधिकरण (AAI) ने मिलकर संयुक्त रूप से तैयार किया है।

Advertisement

यह अमेरिका के GPS या भारत के ‘नाविक’ की तरह कोई स्वतंत्र नेविगेशन प्रणाली नहीं है। बल्कि, यह अंतरिक्ष में पहले से मौजूद GPS सिग्नल्स में वायुमंडल के कारण आने वाली कमियों और त्रुटियों को सुधारता है और उन्हें विमानों के लिए अत्यधिक सटीक व 100% भरोसेमंद बनाता है।

सवाल 2: सैटेलाइट लैंडिंग पारंपरिक सिस्टम से कैसे अलग है?

जवाब: आमतौर पर बड़े हवाई अड्डों पर विमानों को उतारने के लिए इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम (ILS) का उपयोग होता है, जिसमें रनवे के पास करोड़ों रुपये के ग्राउंड-बेस्ड उपकरण और रेडियो बीम लगाने पड़ते हैं। इसके विपरीत, सैटेलाइट-बेस्ड लैंडिंग सिस्टम (SLS) में जमीन पर किसी भारी-भरकम इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत नहीं होती; आसमान में चक्कर काट रहे सैटेलाइट्स सीधे प्लेन को रास्ता दिखाते हैं।

सवाल 3: यह तकनीक छोटे एयरपोर्ट्स के लिए गेम चेंजर क्यों है?

जवाब: भारत के कई छोटे और रीजनल शहरों के एयरपोर्ट्स पर भारी-भरकम इंस्टॉलेशन कॉस्ट और मासिक रखरखाव के खर्च के कारण ILS सिस्टम नहीं लग पाता था। विमान निर्माता कंपनी ‘एयरबस’ के अनुसार, गगन तकनीक आने से अब इन छोटे हवाई अड्डों पर भी खराब मौसम में बिना किसी महंगे ग्राउंड इक्विपमेंट के विमानों की सीधी और स्थिर अप्रोच (Landing Approach) सुनिश्चित की जा सकेगी।

सवाल 4: स्मार्टफोन वाला GPS प्लेन उतारने के काम क्यों नहीं आ सकता?

जवाब: हमारे मोबाइल का GPS कुछ मीटर तक की ही सटीकता देता है, जो सड़क पर चलने के लिए तो ठीक है लेकिन बादलों के बीच उड़ रहे तेज रफ्तार कमर्शियल प्लेन को रनवे की पतली पट्टी पर उतारने के लिए नाकाफी है। इसके अलावा, अंतरिक्ष से आते वक्त GPS सिग्नल्स वायुमंडल की ऊपरी परत (आयनोस्फीयर) के कारण गड़बड़ा जाते हैं। भारत के ऊपर यह गड़बड़ी और ज्यादा होती है क्योंकि हमारा देश ‘इक्वेटोरियल आयनाइजेशन एनोमली’ क्षेत्र के ठीक नीचे आता है। विमानों को सुरक्षित लैंडिंग के लिए सेंटीमीटर स्तर की सटीकता और 100% शुद्ध डेटा की गारंटी चाहिए होती है, जो गगन प्रदान करता है।

सवाल 5: इस साल के अंत तक कितने एयरपोर्ट्स को यह सुविधा मिलेगी?

जवाब: इंडिगो एयरलाइंस अब इस तकनीक को अपने पूरे विमान बेड़े में तेजी से शामिल कर रही है। भारतीय विमानन प्राधिकरण (AAI) देश के अलग-अलग एयरपोर्ट्स पर 23 सैटेलाइट गाइडेड अप्रोच प्रोसीजर पहले ही जारी कर चुका है और इस साल के अंत तक यह संख्या 40 से अधिक एयरपोर्ट्स तक पहुँचने की उम्मीद है। इसरो के अनुसार, इसका उद्देश्य विमानन सुरक्षा बढ़ाने के साथ-साथ रूट्स को छोटा कर हवाई जहाजों के ईंधन (Fuel) की बचत करना भी है।

Related Articles

📢 पूरी खबर पढ़ने के लिए

बेहतर अनुभव के लिए ऐप का उपयोग करें

ऐप में पढ़ें
ऐप खोलें
ब्राउज़र में जारी रखें