रामघाट पर पानी को साफ रखने वाले फाउंटेन बंद, वीआईपी के आने पर होते हैं चालू

फव्वारे चालू कर दें तो नदी का पानी रहेगा साफ, महिलाएं साबुन लगाकर धो रहीं कपड़े

अक्षरविश्व न्यूज उज्जैन। हर 12 साल में जिस मोक्षदायिनी शिप्रा के किनारे सिंहस्थ महापर्व लगता है, वह वर्तमान में मैली होकर अपनी दुर्दशा पर व्यथित है। ऑक्सीजन की कमी से रोज तड़प-तड़पकर मछलियां दम तोड़ रही हैं। इससे इतनी बदबू आ रही है कि घाट पर खड़ा होना तक मुश्किल है। नदी का पानी साफ रहे, इसके लिए दत्तअखाड़ा घाट पर फ्लोटिंग फाउंटेन लगाए गए थे जो भी काफी समय से बंद हैं, केवल वीआईपी के आगमन पर ही इन्हें चालू किया जाता है।
दरअसल, देशभर से भगवान महाकाल के दर्शन के रोज हजारों श्रद्धालु आते हैं जो रामघाट पर स्नान करने के लिए भी पहुंचते हैं लेकिन नदी का पानी इन दिनों बेहद प्रदूषित है। स्नान तो दूर पानी आचमन करने लायक भी नहीं है। बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं को इसकी जानकारी नहीं होती इसलिए वह इसी को पवित्र समझकर डुबकी लगाते हैं। नदी का पानी साफ रहे, इसके लिए दत्तअखाड़ा घाट पर ४ फ्लोटिंग फाउंटेन लगाए गए थे जो लंबे समय से बंद हैं। पहले इन्हें रोज चलाया जाता था लेकिन अब केवल वीआईपी के आगमन पर ही चालू किया जाता है जिससे यह खराब हो रहे हैं। यदि इन्हें शुरू कर दिया जाए तो पानी को साफ रखने में मदद मिलेगी।
शिप्रा को कर रहे और मैली…
वैसे तो घाट पर कपड़े धोने की मनाही है लेकिन यह नियम केवल कागजों में बने हैं। हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। घाट पर बेखौफ साबुन लगाकर कपड़े धोए जा रहे हैं। शनिवार को दत्तअखाड़ा घाट पर दो महिलाएं साबुन लगाकर नदी में ही कपड़े धोती रहीं लेकिन उसे रोकने की कोशिश किसी ने नहीं की।
फव्वारे बंद, कपड़े धोने, पूजन सामग्री प्रवाहित और नालों के मिलने से नदी का पानी लगातार प्रदूषित हो रहा है। जिससे पानी में ऑक्सीजन की कमी हो रही है। ऐसे में पिछले कई दिनों से मछलियां दम तोड़ रही हैं जिससे आने वाली बदबू से श्रद्धालुओं का घाट पर बैठना भी मुश्किल हो रहा है। इस दिशा में भी कोई पहल नहीं की गई।
बढऩे लगे पान की गुमटी और खाने पीने के ठेले
पहले रामघाट पर ही चाय-नाश्ते की दुकानें लगती थीं, जबकि यह प्रतिबंधित हैं। इन्हें कई बार हटाया भी जा चुका है लेकिन एक-दो दिन बाद दुकानें फिर लगने लगती हैं। इसी तरह अब दत्तअखाड़ा घाट पर भी पान-मसाला की गुमटी और खाने-पीने की चीजों के ठेले लगाना शुरू हो गए हैं जो धीरे-धीरे बढ़ते जा रहे हैं।









