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मदर्स डे : जन्म नहीं दिया, पर जीवन को संवार रही हैं मातृछाया में मां

रोते चेहरे पर थपकी बनकर उतरती है मां

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अनाथ नवजात बच्चें के लिए धडक़ता है इन मांओं का दिल केयर टेकर नहीं,ममता की जीवित प्रतिमाएं हैं यहां की महिलाएं

पवन कुमार पाठक|उज्जैन। मां सिर्फ जन्म देने वाली नहीं होती, मां वह भी होती है जो किसी अनजान बच्चे के आंसू देखकर खुद रो पड़ती है। मां वह है जो रात भर जागकर मासूम को सीने से लगाए रहे। सेवाभारती उज्जैन के प्रकल्प मातृछाया में ऐसी ही कई मांएं सांस ले रही हैं, जिनका यह रहने वाले बच्चों से खून का रिश्ता तो नहीं है लेकिन ममता के रिश्ते ने उन्हें कसकर बांध रखा है।

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मदर्स डे पर अक्षरविश्व रिपोर्टर पवनकुमार पाठक ने मातृछाया में तीन घंटे बिताकर मांओं का दिल टटोला। मदर्स डे पर आज जब लोग अपनी मां के साथ तस्वीर साझा कर रहे हैं, तब मातृछाया चुपचाप मानवता का सबसे खूबसूरत चेहरा गढ़ रही है। यहां रिश्ते खून से नहीं करुणा और ममता से जन्म ले रहे हैं।

मदर्स डे के मौके पर भी मातृछाया का माहौल भावना से भरा हुआ था। मक्सीरोड पर स्थित मातृछाया भवन में यशोदा मांएं कभी बच्चों को दुलारती दिखीं तो कभी आंखों में अपनी नमी छिपाती दिखीं। इन यशोदाओं को पहले यह काम नौकरी लगता था, लेकिन धीरे-धीरे यह ममता में बदल गया।

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कब हुई थी स्थापना

२००४ में आरएसएस के अनुषांगिक संगठन सेवाभारती ने मातृछाया प्रकल्प की स्थापना की थी। स्थापना इसलिए करनी पड़ी कि कई लोग छोटे बच्चों को बेसहारा छोड़ देते थे। यह बच्चे असामाजिक तत्वों के हाथ में पड़ जाते थे या जानवरों के शिकार हो जाते थे। इन बच्चों को बेहतर जिंदगी जीने के लिए प्रकल्प शुरू किया गया।

छह दीदियां, मां के समान देती हैं प्रेम
मातृछाया में छह दीदियां हैं, जो बच्चों का ख्याल रखती हैं। इनमें से देवकला और पुष्पा अवचिते मातृछाया खुलने के साथ से जुड़ी हुई हैं। संगीता पुष्प को ११ साल, चंदा दीदी को ८, सुधा दीदी को २ और लता मालवीय १ साल से यशोदा की भूमिका निभा रही हैं। बच्चों की मेडिकल केयरिंग के लिए ऋतु अग्रवाल भी तैनात हैं, वह छह साल से कार्यरत हैं।

भवन के बाहर पालना लगाया

प्रकल्प भवन के बाहर पालना लगाया गया और गुजारिश की गई बच्चों को यहां छोड़ सकते हैं। अभी संस्था के पास पांच बच्चे हैं। इनमें २ बालक और ३ बालिकाएं हैं। छह साल के होने तक इनकी परवरिश मातृछाया में होगी। इससे अधिक होने पर इन्हें सरकारी बालगृह में शिफ्ट किया जाएगा। हालांकि यहां से बच्चे गोद भी लिए जा सकते हैं। उसके लिए ङ्क्षहदू एडॉप्शन एक्ट के तहत आवेदन करना होता है।

बच्चों के साथ बच्च बनना पड़ता है

पुष्पा अवचिते कहती हैं कि बच्चों के साथ बच्चा बनना पड़ता है। पहली बार बच्चा जब आता है तो बहुत रोता है। उसे संभालने के लिए हम भी बच्चे बन जाते हैं। उनको प्रेम करते हैं, फीडिंग कराते हैं, टीवी दिखाते हैं और एक्टिविटी करते हैं। थोड़े दिन में वह फैमिली का सदस्य बन जाता है। संगीता पुष्प कहती हैं कि कई बार पुराने बच्चे नए बच्चे को एडॉप्ट नहीं करते। ऐसे में नए बच्चे को अकेलेपन का अहसास नहीं हो, उसकी अलग से केयरिंग करते हैं। हालांकि समय के साथ दोस्ती हो जाती है और फिर सब एक हो जाते हैं। बच्चे इतने घुलमिल जाते हैं कि वह दीदी, मम्मी, दादी या मौसी जैसे संबोधन से पुकारने लगते हैं।

और जब लाइट वाले जूते मंगाने पड़े

व्यवस्थापक मनीष बैरागी कहते हैं कि एक बार परिवार के साथ आया एक बच्चा लाइट वाले जूते पहनकर आ गया तो सभी बच्चों ने लाइटवाले जूतों की मांग कर दी। फिर क्या था सबके लिए लाइट वाले जूते खरीदे गए। इन जूतों को पहनने के बाद बच्चों के चेहरों पर जो खुशी दिखी, वह अद्भुत थी। बहरहाल मातृछाया की मांएं बेसहारा नौनिहालों को नया जीवन दे रही हैं। वह बच्चों को रिश्तों की नई गर्माहट दे रही है। सेवाभारती मानवता की नई मिसाल कायम कर रहा है।

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