महाकाल को छोडक़र जाने को तैयार नहीं कुत्ते गाड़ी रोज आती है, ले जाती है फिर आ जाते हैं

चारों तरफ से खुला होने के कारण हो रही परेशानी

मंदिर प्रबंधन ने पांच कर्मचारियों की टीम बनाई, मंदिर बंद होने के बाद अंदर आकर बैठ जाते हैं
अक्षरविश्व न्यूज उज्जैन। महाकाल मंदिर के अंदर आकर धमाचौकड़ी मचाने वाले कुत्ते यहां से जाने को तैयार नहीं है। रास्ता पहचानते हैं। नगर निगम की टीम बाहर छोड़ आती है, फिर आ जाते हैं। इनसे निपटने के लिए अब पांच कर्मचारियों की टीम बनाई गई है। कुत्तों के आतंक से श्रद्धालुओं में दहशत है और देशभर में बदनामी भी हो रही है। देश के किसी भी धार्मिक स्थल पर कुत्तों का ऐसा आतंक नहीं है। मंदिर प्रशासन भी कुत्तों की वजह से चिंता में है।
भस्मार्ती के लिए माता-पिता के साथ कतार में लगे देहरादून के बच्चे को कुत्ते ने काट लिया। यह खबर उज्जैन शहर के लिए सामान्य थी। कारण यह है कि यहां ऐसी घटनाएं आम हो गई हैं। कोई ऐसा दिन नहीं जाता कि जब कुत्तों का हमला न हुआ हो। महाकाल मंदिर में कुत्ते के काटने की घटना नेशनल न्यूज बनी क्योंकि मामला मंदिर का था।
सवाल खड़े किए गए कि कुत्तें मंदिर में आए कैसे? एक साल में यह चौथी घटना थी। मंदिर प्रशासन कुत्तों से निपटने में असक्षम क्यों हैं? कतार में लगे श्रद्धालुओं ने भी नाराजगी जताई। जिस बच्चे को काटा उसके माता-पिता का आक्रोश फूट पड़ा। उनका कहना था कि इस घटना ने उनका टूर बिगाड़ दिया। उन्हें डर सता रहा था कि जंगली कुत्ते के काटने से कोई अनहोनी न हो जाए। मन में तमाम प्रकार की आशंकाएं लेकर वे अपने गंतव्य की ओर रवाना हो गए।
आसपास की होटलों से भरता है पेट
कुतों के आक्रामक होने का प्रमुख कारण यह भी बताया जा रहा है कि महाकाल लोक चारों तरफ से खुला हुआ है। बेगमबाग की तरफ से भी एक रास्ता है। यहां पर होटलें हैं। इन्हीं होटलों से उन्हें उनकी मनपसंद चीजें मिल जाती हैं जो तामसी बनाती हैं। बेगमबाग की तरफ से आने वाले और कतिया बाखल की तरफ से आने वाले कुत्ते भी ज्यादा आक्रामक होते हैं। उधर जयसिंहपुरा की तरफ से भी कुत्तों का प्रवेश होता है। वे भी कम आक्रामक नहीं होते। बड़े गणेश के सामने से भी कुत्ते अंदर की ओर प्रवेश करते हैं। इसके अलावा और भी रास्ते हैं जो उनके लिए आसान रहते हैं। चार-पांच इलाकों के यह कुत्ते अपने इलाकों को लेकर लड़ते हैं और श्रद्धालु उनका शिकार हो जाते हैं। यह तो भस्मार्ती का मामला था जो उजागर हुआ और सुर्खियों में रहा। अन्यथा मंदिर और महाकाल लोक परिसर में कुत्तों के लपकने की कई घटनाएं हो चुकी हैं जो प्रकाश में नहीं आई हैं।
कुत्तों का स्थायी हल नगर निगम के पास: जानकारों का कहना है कि महाकाल मंदिर में आतंक मचाने वाले कुत्तों का स्थायी हल नगर निगम के पास ही है। अभी कुत्ते पकड़ कर पांच-सात किलो मीटर दूर जाकर छोड़ दिया जाता है। अब इसकी दूरी बढ़ाना पड़ेगी। यदि दूरी बढ़ा दी गई तो कुत्ते इतनी दूर से लौट कर नहीं आएंगे। श्रद्धालुओं की नजर में यदि उज्जैन की छवि को बनाए रखना है तो नगर निगम को सक्रिय होना पड़ेगा। वरना कुत्ते आतंक मचाते रहेंगे।
नगर निगम की गाड़ी आती है
महाकाल मंदिर प्रबंध समिति के सहायक प्रशासक मूलचंद जूनवाल का कहना है कि कुत्तों के काटने की घटनाएं चिंता का विषय है। ऐसी घटनाओं से मंदिर की बदनामी होती है। नगर निगम की ओर से कुत्ता पकडऩे वाली गाड़ी आती है। कुत्तों को ले जाती है। वे फिर आ जाते हैं। मंदिर समिति भी चिंतित है। मंदिर चारों तरफ से खुला है। वे किसी भी रास्ते से अंदर आ जाते हैं। लगातार हो रही घटनाओं को देखते हुए पांच कर्मचारियों की टीम बनाई गई है। कोशिश यही रहेगी कि मंदिर के अंदर कुत्तों का प्रवेश न हो।
रात में आकर छुप जाते हैं
सहायक प्रशासक का कहना है कि रात में मंदिर बंद हो जाता है। रात कुत्तों की रहती है। वे इधर के रास्तों से आकर छुप जाते हैं। जब सुबह श्रद्धालुओं का आगमन होता है तब वे भी अपने दड़बे से बाहर निकल आते हैं। दो दिन पहले हुई घटना में भी यही हुआ। दोनों कुत्ते रात में आकर छुप गए थे। दोनों लडऩे लगे और बालक पर लपक गए। मंदिर समिति के कमचारियों से भी कहा गया है कि वे कुत्तों पर नजर रखें।









