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‘चांद मेरा दिल’ रिव्यू: रिश्तों के दर्द और टूटन की भावुक कहानी

प्यार सिर्फ मिलने और बिछड़ने की कहानी नहीं होता — कभी-कभी यह अपने ही अंदर के तूफानों से लड़ने का नाम होता है। विवेक सोनी की ‘चांद मेरा दिल’ इसी सच को बिना किसी लाग-लपेट के पर्दे पर उतारती है। यह फिल्म उस कड़वी हकीकत को मानने की हिम्मत रखती है कि 21 साल की उम्र में जो प्यार दुनिया की सबसे खूबसूरत चीज लगता है, वही 25 तक आते-आते जिंदगी की जिम्मेदारियों और पुराने जख्मों के बोझ तले दरकने लगता है।

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कहानी

फिल्म आरव और चांदनी के इर्द-गिर्द घूमती है। कहानी कॉलेज कैंपस की बेफिक्र जिंदगी से शुरू होती है जहां दोनों के बीच प्यार इतनी तेजी से परवान चढ़ता है कि लगता है यही सब कुछ है — देर रात की बातें, दुनिया से लड़ने का जज्बा और यह यकीन कि बस साथ रहना ही काफी है।

लेकिन असली कहानी तब शुरू होती है जब कॉलेज की रंगीन दुनिया पीछे छूट जाती है। करियर का दबाव, परिवार की उम्मीदें और समाज का बोझ आरव को अंदर से तोड़ने लगता है और यह टूटन धीरे-धीरे उसके बर्ताव में झलकने लगती है। दूसरी तरफ चांदनी कोई आम लड़की नहीं — उसके बचपन के अनसुलझे जख्म और एक घरेलू ट्रॉमा ने रिश्तों को लेकर उसकी पूरी सोच को गहराई से प्रभावित किया है। जो रिश्ता प्यार से शुरू हुआ था वह धीरे-धीरे एक थका देने वाले, उलझे हुए दर्दनाक सफर में बदल जाता है।

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एक्टिंग

लक्ष्य ने आरव के ग्रे-शेड किरदार को जिस संजीदगी से निभाया है वह उन्हें इस पीढ़ी के सबसे दमदार कलाकारों में खड़ा कर देता है। कई सीन में वे एक लफ्ज नहीं बोलते लेकिन उनकी आंखें करियर की निराशा, खोने का डर और दबा हुआ गुस्सा इतनी शिद्दत से बयां करती हैं कि नजरें हटाना मुश्किल हो जाता है।

लेकिन फिल्म का सबसे बड़ा सरप्राइज हैं अनन्या पांडे। चांदनी के रूप में उन्होंने अपने करियर की सबसे परिपक्व और संवेदनशील परफॉर्मेंस दी है। अपनी ग्लैमरस इमेज को पूरी तरह पीछे छोड़ते हुए उन्होंने डिप्रेशन से जूझती एक औरत के टूटने को बेहद सच्चाई से जिया है। क्लाइमैक्स में जब उनका सब्र टूटता है तो उनके आंसुओं में कोई नाटक नहीं — बस एक खामोश चीख है जो सीधे दिल में उतर जाती है। दोनों के बीच की ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री इतनी स्वाभाविक है कि लगता ही नहीं कि दो स्टार एक्टिंग कर रहे हैं।

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सिनेमैटोग्राफी

कैमरे का काम फिल्म की आत्मा को और गहरा करता है। दिल्ली और मुंबई की असली लोकेशन और बंद कमरों की रोशनी किरदारों के अकेलेपन और बढ़ती मानसिक दूरी को खूबसूरती से उभारती है। शुरुआत में रंग चमकीले और गर्म हैं लेकिन जैसे-जैसे रिश्ता बिखरता है विजुअल्स ठंडे और अंधेरे होते जाते हैं। यह तकनीकी बारीकी फिल्म को एक अलग स्तर पर ले जाती है।

म्यूजिक

फिल्म का संगीत महज मनोरंजन नहीं बल्कि एक अदृश्य धागे की तरह पूरी कहानी को एक साथ बांधे रखता है। टाइटल ट्रैक की आवाज क्लाइमैक्स के सबसे तीव्र पलों में थिएटर में एक ऐसा माहौल बना देती है कि आंखें नम हुए बिना नहीं रहतीं। बैकग्राउंड स्कोर भी किरदारों की अंदरूनी उथल-पुथल को बिना शोर मचाए महसूस कराता है।

कमियां

फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी है इसका लगातार भारीपन। पूरी फिल्म में राहत के पल बेहद कम हैं जिससे यह आम दर्शकों के लिए थका देने वाली हो सकती है। दूसरे हाफ में रफ्तार धीमी पड़ जाती है और कुछ सीन बेवजह खिंचे हुए लगते हैं। 10-15 मिनट की कटौती फिल्म को और पैना बना सकती थी। जो लोग हल्की-फुल्की मसाला फिल्में देखने के आदी हैं उनके लिए यह फिल्म नहीं है।

फैसला

‘चांद मेरा दिल’ कोई रूटीन बॉलीवुड लव स्टोरी नहीं है। यह असल इंसानी रिश्तों की तरह ही उलझी हुई, दर्दनाक और खूबसूरत है। यह फिल्म उस सच को स्वीकार करती है कि कभी-कभी वक्त और हालात लोगों को इतना बदल देते हैं कि गहरा प्यार भी उन्हें एक साथ नहीं रोक पाता। थिएटर से बाहर निकलने के कई दिनों बाद भी यह फिल्म दिल और दिमाग में घर किए रहती है।

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