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अधिक मास में चल रही तीन प्रमुख तीर्थयात्राएं, पहले जानिए नौ नारायण मंदिरों के बारे में

उज्जयिनी नगरी में मुख्यत: पुरुषोत्तम (अधिक) मास में भगवान विष्णु के स्वरूप नारायण के नौ मन्दिरों की पूजा-अर्चना की परिपाटी कुछ दशकों से चल पड़ी है। पुराणों में इसका उल्लेख नहीं है। वैसे अवन्तिका में भगवान् विष्णु के दस स्वरूपों की अवस्थिति महादेव जी ने देवी पार्वती को बताई जिनके नाम हैं- वासुदेव, अनन्त, बलराम, जनार्दन, नारायण, ऋषिकेश, वाराह, धरणीधर, वामनरूपधारी और वामन एवं लक्ष्मी अधिष्ठित शेषशायी।

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यों अवन्तिका को पञ्चदेवोपासना की नगरी माना जाता है किन्तु यहाँ तो सभी देवी-देवताओं का वास है। यह नगरी सर्वदेवमयी है। यह हरिहर भूमि है। यहाँ भगवान् महाकालेश्वर पृथ्वी के केन्द्र में दक्षिणाभिमुख ज्योतिर्लिंग स्वरूप में विराजमान हैं। यहाँ भगवान् विष्णु गोविन्दस्वामी नाम से निवास करते हैं— महाकालेति विख्यात: सर्वकामप्रद: शिव:।.. आस्ते तत्रैव भगवान्देवदेवो जनार्दन:। गोविन्दस्वामिनामासौ भुक्तिमुक्तिप्रदौ हरि:। (ब्रह्मपुराण/43-66)

इसलिए कदाचित् महाकालवन या महाकालश्मशान (स्वयं महादेव के अनुसार) एवं उज्जयिनी दोनों क्षेत्र क्रमश: शैवों तथा वैष्णवों दोनों के लिए पवित्र माने गए हैं। अत: उज्जयिनी शिवनगरी तो है ही, पवित्र पुरुषोत्तम धाम भी है। उज्जयिनी में विष्णु के चार क्षेत्र– शङ्खी, विश्वरूप, माधव और चक्री तो थे ही, पाँचवाँ क्षेत्र अङ्कपाद/अङ्कपात हुआ (स्कन्दपुराण) जहाँ कृष्ण और बलराम ने महर्षि सान्दीपनि आश्रम में विद्यार्जन किया।

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नौ नारायण मन्दिरों के नामों, क्रम तथा संख्या में मतान्तर है। मार्ग की सुविधानुसार यात्रा क्रम निर्धारित कर लिया जाता है। ये मन्दिर हैं- 1. अनन्तनारायण मन्दिर (अनन्तपेठ) दानीगेट क्रम में प्रथम, 2. बद्रीनारायण मन्दिर शेणवी मार्ग तिराहा, 3. सत्यनारायण मन्दिर ढाबा रोड, 4. शेषनारायण मन्दिर क्षीरसागर का उत्तरी भाग, 5. पद्मनारायण मन्दिर क्षीरसागर दक्षिणी भाग, 6. सूर्यनारायण मन्दिर श्री लक्ष्मी-जर्नादन मन्दिर परिसर, भावे चा बाड़ा, सतीगेट, 7. भगवान् आदिनारायण मन्दिर सेंट्रल कोतवाली के सामने, 8. भगवान् चतुर्भुजनारायण मन्दिर ढाबा रोड, घाटी चढ़कर, 9. भगवान् लक्ष्मीनारायण मन्दिर जो चार बताए जाते हैं- (अ) सराफा, (ब) शिप्रा नदी, (स) गुदरी, (द) मालीपुरा तथा 10 भगवान् पुरुषोत्तम नारायण मन्दिर (पुरुषोत्तम सागर/सोलह सागर के पास)।

अधिक मास में कौन से कार्य करें और कौन से ना करें

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ये कार्य करें

ऊॅं नमो भगवते वासुदेवाय अथवा गुरु मन्त्र का जाप

पुरुष सूक्त/एकादशी माहात्म्य

श्रीमद्भागवत कथा का वाचन या श्रवण

दीपदान व भागवत ग्रन्थ का दान

दान, पुण्य करें तथा व्रत उपवास रखें ।

ये कार्य ना करें

कोई शुभ कार्य या कोई वैदिक कार्य

विवाह, मुण्डन, यज्ञोपवीत नया वाहन, आभूषण क्रय

देवी-देवताओं की मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा, कुओं की खुदाई आदि।

अधिक मास में महाकालवन में प्रतिष्ठित भगवान् शिव के 84 स्वरूप सिद्धलिंगो की भी यात्रा की जाती है? जिन्हें बोलचाल की भाषा में चौरासी महादेव यात्रा कहा जाता है। यह यात्रा मुख्यत: शिवप्रिय श्रावण मास में शिवभक्तों द्वारा व्यापक स्तर पर की जाती है। अधिक मास में ही उज्जैन में पुराणोक्त सप्तसागरों रुद्र सागर, पुष्कर सागर, क्षीरसागर, गोवर्धन सागर, पुरुषोत्तम सागर, विष्णु सागर तथा रत्नाकर सागर की यात्रा भी की जाती है।
रमेश दीक्षित
( लेखक दैनिक अक्षरविश्व के स्तम्भकार हैं )

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