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मूवी रिव्यू: गवर्नर- द साइलेंट सेवियर

सच्चे किरदारों और बीते हुए दौर की घटनाओं पर आधारित फिल्में बनाना निर्देशकों को हमेशा से आकर्षित करता रहा है, मगर हाल के समय में यह ट्रेंड दर्शकों और सोशल मीडिया पर लगातार सवालों के घेरे में रहा है। ‘द कश्मीर फाइल्स’, ‘द केरल स्टोरी’, ‘द केरल स्टोरी 2’, ‘द बंगाल फाइल्स’ और ‘धुरंधर 2: द रिवेंज’ जैसी सच्ची घटनाओं पर बनी फिल्मों पर तथ्यों के साथ छेड़छाड़ करने के आरोप लगते रहे हैं, और कुछ मामले तो अदालत तक भी पहुंचे। अब 12 जून, शुक्रवार को ‘द केरल स्टोरी’ के निर्माता विपुल शाह अपने प्रोडक्शन हाउस के बैनर पर निर्देशक चिन्मय मंडलेकर की नई फिल्म ‘गवर्नर’ लेकर आए हैं। यह फिल्म दर्शकों को 1990 के दशक में ले जाती है, जब भारत एक बड़े आर्थिक संकट से गुजर रहा था और देश के दिवालिया होने की आशंका मंडरा रही थी। उस मुश्किल दौर में देश को बचाने के लिए कई कठिन आर्थिक और राजनीतिक फैसले लिए गए थे। निर्देशक चिन्मय मंडलेकर इतिहास के इस अंधेरे अध्याय को पर्दे पर लाने का बड़ा कदम तो उठाते हैं, मगर इस संवेदनशील मुद्दे पर गहरी रिसर्च, निष्पक्षता और संतुलित नजरिया दिखाने में पीछे रह जाते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि फिल्म उस दौर की गंभीरता और असर को अपने तरीके से दिखाने की कोशिश तो करती है, पर वह उस गहराई तक पहुंच नहीं पाती।

 

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‘गवर्नर’ की कहानी

यह कहानी भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर एस. वेंकटरमणन की जिंदगी से प्रेरित है। फिल्म की शुरुआत साल 2022 में श्रीलंका में आए गंभीर आर्थिक संकट से होती है। इसी प्रसंग के सहारे वरिष्ठ पत्रकार अदिति (अदा शर्मा) अपने बेटे को 1990 के दशक की याद दिलाती हैं, जब भारत भी आर्थिक मुश्किलों और राजनीतिक अस्थिरता का सामना कर रहा था। उस वक्त चंद्रशेखर के नेतृत्व में गठबंधन सरकार चल रही थी। इन्हीं हालात में ए. रमणन (मनोज बाजपेयी) को अचानक नेशनल बैंक ऑफ इंडिया का गवर्नर बना दिया जाता है। डिप्टी गवर्नर सीआर (नौशाद मोहम्मद कुंजू) समेत कुछ अधिकारी उनकी इस नियुक्ति पर शंका जताते हैं, उनका मानना है कि अर्थशास्त्र की मजबूत समझ के बिना सिर्फ सिफारिश के सहारे इतनी बड़ी जिम्मेदारी संभालना मुश्किल साबित हो सकता है।

गवर्नर का पद संभालते ही रमणन के सामने खाड़ी युद्ध के कारण पैदा हुआ आर्थिक संकट आ खड़ा होता है। महंगाई अपने चरम पर है, पेट्रोल-डीजल के दाम आसमान छू रहे हैं, हर तरफ विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं और आम जनता बुनियादी जरूरतों के लिए तरस रही है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि एक युवक को कर्ज न मिलने पर खुद को आग लगाते दिखाया जाता है। देश का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खत्म हो चुका है, सरकार चलाने और कर्ज चुकाने के लिए सिर्फ 1.2 अरब डॉलर ही बचे हैं। ऐसे नाजुक समय में रमणन देश के सोने के भंडार को गिरवी रखने जैसा बड़ा और विवादित फैसला लेकर भारत को दिवालिया होने से बचाने की कोशिश करते हैं – यही फिल्म का मूल विषय है।

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‘गवर्नर’ मूवी रिव्यू

‘द कश्मीर फाइल्स’ में फारूक मलिक ‘बिट्टा’ का किरदार निभाने वाले चिन्मय मंडलेकर इस बार निर्देशक की भूमिका में हैं। पिछले साल मनोज बाजपेयी के साथ ‘इंस्पेक्टर झेंडे’ से उन्होंने डायरेक्शन की शुरुआत की थी। ‘गवर्नर’ की शुरुआत प्रदर्शन, नारेबाजी और आत्मदाह की कोशिश करने वाले एक युवक के भावनात्मक और असरदार दृश्यों से होती है, लेकिन इसके बाद फिल्म का पहला हाफ अपनी पकड़ ढीली कर देता है। कहानी मुख्य रूप से गवर्नर रमणन (मनोज बाजपेयी) और डिप्टी गवर्नर सीआर (नौशाद मोहम्मद कुंजू) के इर्द-गिर्द ही घूमती रहती है।

फिल्म में रमणन के बड़े फैसलों को लगभग एकतरफा कोशिश के रूप में दिखाया गया है, जैसे सारे अहम फैसले वह अकेले ही ले रहे हों। इस वजह से स्क्रीनप्ले सीधी-सपाट और एक ही दिशा में चलने वाली लगती है। फिल्म 1990 के आर्थिक संकट की गंभीरता को छूती है, मगर उसकी तह तक नहीं जा पाती, जिससे उस दौर की घुटन, बेचैनी और मजबूरी का अहसास दर्शकों तक पूरी तरह नहीं पहुंचता।

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फिल्म में चंद्रशेखर सरकार की कमियों का जिक्र तो होता है, लेकिन उस दौर के बड़े राजनीतिक समीकरणों को नजरअंदाज कर दिया गया है। कहानी में मजबूत टकराव की कमी महसूस होती है और कई जरूरी सवाल अनुत्तरित रह जाते हैं। फिल्म में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की एक छोटी झलक भी दिखाई गई है, लेकिन कहानी में उनकी मौजूदगी का मकसद साफ नहीं हो पाता। इसी तरह मनमोहन सिंह से जुड़े दृश्य भी कुछ अटपटे लगते हैं – जो खुद आर्थिक उदारीकरण के जनक माने जाते हैं, फिल्म में रमणन का किरदार उन्हें आर्थिक नीतियां समझाता दिखता है।

हालांकि, इंटरवल के बाद का दूसरा हाफ फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी साबित होता है। यहां से कहानी रफ्तार पकड़ती है और रोमांच के साथ मनोरंजन भी देती है। देश का सोना विदेश भेजे जाने वाला क्लाइमैक्स खासा प्रभावशाली और दिलचस्प बन पड़ा है। ‘कुर्सी पर दीमक लगेगी तो दूसरी ले आएंगे, मगर देश में दीमक लग जाए तो दूसरा देश कहां से लाएंगे?’ जैसे डायलॉग फिल्म में जरूरी तीखापन और गहरा असर छोड़ते हैं। संगीत भी विषय और माहौल के मुताबिक ही रखा गया है।

अभिनय की बात करें तो चार बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीत चुके मनोज बाजपेयी, गवर्नर रमणन के किरदार में फिल्म की सबसे बड़ी ताकत साबित होते हैं। उनकी बॉडी लैंग्वेज, संवाद अदायगी और चुटीलेपन ने इस किरदार को दिलचस्प और याद रहने लायक बना दिया है। लंबे समय बाद पर्दे पर लौटी ‘रोजा’ फेम मधु शाह को देखना भी सुकून देता है। पत्रकार के किरदार में अदा शर्मा अपनी भूमिका में पूरी तरह फिट लगती हैं। सीआर के किरदार में नौशाद मोहम्मद कुंजू ने अपने हिस्से के साथ इंसाफ किया है, जबकि राजीव गौर सिंह जैसे सह-कलाकार भी अच्छा सहयोग देते दिखे हैं।

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