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वीकेंड : महेश्वर में मां नर्मदा के आंचल वाले सुंदर घाट बुला रहे हैं

आशीष गुप्ता उज्जैन। बारिश के इस मौसम में खरगोन की महेश्वर तहसील कर रूप-रंग निखर गया है। मां नर्मदा घाटों के पास से हरहरा कर बह रही है। नदी के उस पार दूर तक फैली हरियाली लोगों को मोहित कर रही है। अगर आप भी घाटों, मंदिरों और वन्य जीवन को पसंद करते हैं तो मानसूनी सीजन में एक बार महेश्वर देखने जरूर आइए।

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उज्जैन से कैसे पहुंचे- महेश्वर की दूरी उज्जैन से करीब 154 किलोमीटर है। उज्जैन से इंदौर, फिर एबी रोड से धामनोद होते हुए यहां पहुंच सकते हैं। सीधी बससेवा नहीं है, ऐसे में पहले इंदौर और फिर महेश्वर जा सकते हंै। निजी वाहन से सुबह जल्दी निकलकर देर रात तक लौट सकते हैं।

क्या देखें- महेश्वर उज्जैन की ही तरह मंदिरों और घाटों का शहर है। मां अहिल्या बाई होलकर ने यहीं से राजकाज चलाया था। इसलिए शहर का माहौल आध्यात्मिक हैं।

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किला- मां अहिल्या बाई ने यहां किला बनवाया था। इसके पास कई मंदिर और पीछे की तरफ मां नर्मदा पर सुंदर घाट बने हुए हैं।

भगवान काशी विश्वनाथ मंदिर- नर्मदा किनारे यह अति प्राचीन मंदिर स्थित है।

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 राजराजेश्वर मंदिर- किला परिसर में ही राजराजेश्वर मंदिर है। इसकी खासियत हजारों सालों से जल रही दीपक की ज्योत है।

भगवान सहस्त्र बाहु मंदिर- रावण को अपनी कांख में बंधक बनाने वाले भगवान सहस्त्रबाहु का मंदिर भी देखने लायक है। महेश्वर से करीब 1 किलोमीटर दूर नर्मदा में सहस्त्रधारा नामक स्थान है। यहां मां नर्मदा एक हजार धाराओं में बंटती है।

यह भी ख्यात- दत्तात्रेय मंदिर, अहिल्येश्वर मंदिर, बाणेश्वर महादेव मंदिर, जलेश्वर महादेव मंदिर, कोटेश्वर महादेव मंदिर, कृष्णेश्वर/कृष्णेश्वर महादेव मंदिर, गुप्तेश्वर महादेव मंदिर, वि_लेश्वर मंदिर छत्री एवं अहिल्याबाई होलकर की समाधि, पांडुरंग मंदिर, नर्मदा माता मंदिर, एकमुखी दत्त मंदिर, कालिका माता मंदिर, हनुमान मंदिर।

महेश्वरी साडिय़ां- मंदिरों के साथ महेश्वर की पहचान यहां की बुनकर कला से भी है। यहां महेश्वरी साड़ी बनती है। सिल्क और सूत से बनी इन साडिय़ों का बनना देखा जा सकता है।

खान-पान- महेश्वर में मालवा-निमाड़ के सारे व्यंजन मिलते हैं। निमाड़ का पार्ट होने से यहां तीखे खाने का चलन है। हालांकि रेस्टोरेंट स्वादानुसार भोजन तैयार कर देते हैं। यहां का दाल-पानिया, मिर्चीबड़े , नींबू पानी और गन्ने का रस प्रसिद्ध है।

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